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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” का अंक १६ “भाषण बनाना सुदर्शन बाबू का, और जीतना ठाकुर साहब का।” लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक डोलर-हिंडा का अंक १६

भाषण बनाना सुदर्शन बाबू का, और जीतना ठाकुर साहब का।

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लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित


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रारतन बोहरा कहा करते थे कुर्सी लाख बीमारियों की एक दवा है, लोग लाख भस्म फांके या घी पीये, उतनी तेज़ी से उन पर चर्बी नहीं चढ़ती..जितनी तेज़ी से सियासत की कुर्सी पर बैठने से चढ़ती है।

इसलिए शिक्षक संघों के नेता-गणों को कोई बीमारी नहीं होती और न दिल का रोग और न मधुमेह की बीमारी। मगर, वे इस अवसर की टोह में रहते हैं ‘अफ़सरों को रोग लगाने का, कब उन्हें अनुपम अवसर मिले..?’ जिससे वे औपचारिकता का बाना ओढ़कर, इनके स्वास्थ्य-लाभ के समाचार मालुम करने जाये और लौटते वक़्त महत्त्वपूर्ण काग़ज़ों पर उनके हस्ताक्षर करवाकर अध्यापकों में यश के पात्र बन सके। इन कामों में विष्णु प्रकाश चतुर्वेदी बड़े होश्यार थे, इनसे लोहा लेने चलें हैं...हमारे ठाकुर साहब “गिरधारी सिंह।” नामांकन स्वीकृत हो जाने से, ठाकुर साहब के मुख-मंडल से जर्दी के बादल छंट गए। फिर उन्होंने दाढ़ी के बढ़े बालों को छोटा करवाया..एलिमेंटरी दफ़्तर के चपरासी कैलाश बाबू सैन को बुलाकर। जिसका पार्ट-टाइम का धंधा ‘हज़ामत’ बनाने का, काफ़ी चमक चुका था। जिसने बड़े-बड़े ओहदेदारों की हज़ामत करके, इज़्ज़त कमाई थी। कैलाश बाबू के जाने के बाद, गिरधारी सिंह चहक उठे “भा”सा, अब तो तुम हमारे स्थायी सेक्रेटरी बन गए हैं। अब मुझे युनियन अध्यक्ष बनाने में, आप जी-जान से जुट जाओ। शायद आज़ मेरा पहला भाषण कहीं तो होगा, देखो यार अपनी डायरी में। कहिये, मुझे आज़ क्या कहना चाहिए...?”

राम रतन ने उनकी बात काटते हुए, कह दिया “कुछ भी कह डालिए, ठाकुर साहब। सुनने वाले तो, सभी अपने ही आदमी होंगे। यानी, भगोड़ाजी के भेजे हुए अध्यापक। आप जब कहेंगे तब, वे अध्यापक तालियाँ पीट देंगे। कुछ न सूझे तो, पृथ्वी राज रासो ही सुना देना..उनको।”

“तुम मूर्ख हो गए, भा”सा।” राम रतन बोहरा के व्यंग का ज़वाब देते हुए, ठाकुर साहब बोल उठे “याद रखो लीडर तब-तक ज़िंदा रहता है, जब-तक उसका नाम अख़बारों में छपता रहता है। हुज़ूर, मैं तो अभी-तक सियासत के क्षेत्र में पैदा ही नहीं हुआ। मुझे पैदा करने का काम, अब तुम्हारा है।”

“इसका मतलब यह हुआ कि, आप मुझे अपना बाप बनायेंगे ? तब मां कहाँ से लायेंगे, आप ?” राम रतन बोहरा ने, अपना व्यंग बाण छोड़ दिया।

मगर, अब-तक हमारे ठाकुर साहब सच्चे अर्थों में लीडर बन चुके थे। राम रतन बोहरा की बात सुनकर वे ज़ोर से हँसे, और बोले “समय पर, गधे को भी बाप बना लिया जाता है। रही मां की बात, उसे गधा ख़ुद तलाश कर लेगा..समझे..?”

राम रतन बोहरा पहली बार झेम्पे, अब उनको भरोसा हो गया कि ‘ठाकुर साहब सियासत के क्षेत्र में क़दम रख चुके हैं, और उन्होंने अपनी शतरंज बिछानी शुरू कर दी है।’ जाते-जाते वे कह गए “एक घंटे बाद आ जाना, मिडल स्कूल नंबर १ में। सारी व्यवस्था हो गयी है, मैं चल रहा हूँ।”

“भा”सा ठहरो यार, भाषण तैयार कौन करवाएगा..? और मैं बोलूंगा, क्या ?” ठाकुर साहब की आवाज़ राम रतन बोहरा के कान में गिरी, मगर वे उसे अनसुनी करके वहां से चल दिए।

“वाह ठाकुर साहब, काहे फ़िक्र करते हो यार..हम बैठे हैं ना। एक छोटा-मोटा भाषण तो, हम भी तैयार कर सकते हैं।” न मालुम सुदर्शन बाबू कहाँ से टपक पड़े..यहाँ ? रामा पीर जाने ‘न मालुम, किसने इनको कह डाला ? कि ठाकुर गिरधारी सिंह, शिक्षक-संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे हैं..?’ फिर उन्हें याद आया, शायद इस कैलाश बाबू सैन ने दफ़्तर में जाकर इनको कह दिया हो..? साला कैलाश ठहरा जाति का नाई..इधर की बात उधर, और उधर की बात इधर करता है कमबख़्त....?

“आओ सुदर्शन बाबू, आप बिल्कुल सही वक़्त तशरीफ़ लाये हैं..यहाँ। आप तो ठहरे साहित्यकार, कई पोथियाँ लिख चुके हैं आप। अब आप हमारा भाषण लिखकर दिखाएँ तो हम जाने, कि वास्तव में आप विष्णुजी से चार क़दम साहित्य में आगे चलते हैं।” ठाकुर साहब ने, बाबू सुदर्शन को चैलेन्ज देते हुए कहा।

इतना लच्छेदार और उम्दा भाषण लिखना एक कला है, भाई। आज़कल का ज़माना है, कटिंग-पेस्टिंग करने का। बीस पुस्तकों की हज़ामत बनाओ..तो एक पुस्तक तैयार। बड़े-बड़े लेखक और संपादक इसी नुस्खे को इस्तेमाल करके उन्होंने डॉक्टरेट कर ली है, ठाकुर साहब। आइये इधर, आप यह पर्चा लीजिये। इसमें विशन सिंह शेखावत का भाषण लिखा है, जब उन्होंने शिक्षक संघ का पहला संगठन तैयार किया था। बस आप इस भाषण में सन और छोटे-मोटे आंकड़े बदलकर तैयार कर लें, अपना भाषण। तैयार भाषण की दस-दस प्रतियां तैयार करके अपने साथ ले लेना, क्योंकि पत्रकार भाई तो भाषण बोलने के पूर्व भाषण की एक-एक प्रति मांग लेते हैं...उन्हें कहाँ फ़ुर्सत, भाषण सुनने की..?” इतना कहकर, बाबू सुदर्शन ने वह पर्चा ठाकुर साहब को थमा दिया। इस तरह भाषण का गूढ़ रहस्य उन्हें समझाकर, वे रुख़्सत हो गए।

उस दिन ठाकुर गिरधारी सिंह का भाषण कई नज़रों में बड़ा सफ़ल रहा, लोग हँसे तो ख़ूब हँसे। वंस मोर की आवाज़ गूंज़ी, तो कई बार गूंज़ी। तालियाँ बजी, तो बस बजती ही गयी। साथ में, जयकारे भी लगे। अध्यापकों का सोना तो दूर, वे जम्भाई लेना भी भूल गए।

राम रतन बोहरा ने ध्यान से ठाकुर साहब की एक-एक हरक़त, और उससे श्रोताओं पर होने वाली प्रतिक्रिया भी देखते जा रहे थे। उस दिन रात को जब ठाकुर गिरधारी सिंह का काफ़िला चुनाव कक्ष में पहुंचा, तब थके हुए गिरधारी सिंह कटे पेड़ की तरह सोफ़े पर इस तरह पड़े...कि, बेचारा सोफ़ा भी चरमरा गया। तब, राम रतन बोहरा बोले “ठाकुर साहब तुम तो ज़िला अध्यक्ष क्या, तुम तो प्रांतीय अध्यक्ष बनने लायक हो। अक्ल का दिवालियापन, शिक्षक संघ के अध्यक्ष नाम के प्राणी में ही पाया जाता है। यूं तो तुम, हर तरह का भाषण निबाह सकते हो। ऊंट-पटांग भी बकोगे, तो भी लोग तुम्हारे भाषण पर तालियां पीटेंगे।”

“क्यों ?” ठाकुर साहब बोले “मैंने तो वही भाषण दिया, जो सुदर्शन बाबू ने पर्चे में लिखकर मुझे दिया था।”

“मैंने कहलाया था, अक्ल के अंधे..उसमें संशोधन तो ढंग से करते।” राम रतन बोहरा अब भन्नाए “वह तो अच्छा हुआ, तुम्हारे भाषण की लाज़ रखी तुम्हारे प्रवचन टाइप स्टाइल ने..और कुछ लाज़ रखी, तुम्हारी फुदकती आँखों ने। न तो भय्या, हो जाता कबाड़ा। असल में लोग भाषण सुनने कम ही आते हैं, आते हैं केवल मटरगश्ती करने, आँखें सेकने व भाषण देने वालों का नाचना-मटकना देखकर अपना मनोरंजन करते हैं। इस कारण ही मैं कहता हूँ कि, जब तुमने अपने भाषण में विशन सिंह शेखावत की जगह भैरो सिंह शेखावत बोला था, तब किसी को नहीं अख़रा।” भाषण-कला में माहिर होकर, ठाकुर साहब ने सियासत के जंगाह में डिवाइड एंड रूल का प्रयोग कुशल राजनेता की तरह कर डाला...जिससे राम रतन बोहरा जैसे कुशल राजनीतिज्ञ को, उनका शागिर्द बनने को मज़बूर कर दिया। उन्होंने अपने सामने खड़े विष्णु प्रकाश चतुर्वेदी और सुरेन्द्र कौर जोशी को, आपस में लड़वा दिया। जिससे, यह हुआ...वे आपस में एक-दूसरे पर नुक्ताचीनी करते रहे, और अपनी भावी योजना अध्यापकों के सामने न ला सके। दूसरी तरफ़ ठाकुर साहब अध्यापकों को उनके हित में काम ली जाने वाली आकर्षक योजना बताते गए, इस तरह अध्यापकों का स्वत: रुंझान ठाकुर साहब की ओर बढ़ता गया।

बात हुई ऐसे, एक बार उन्होंने यह सुना कि ‘विष्णुजी और सुरेन्द्र कौर आपस में गठबंधन करने का प्रयास कर रहे हैं।’ फिर, हमारे ठाकुर साहब कहाँ कम थे..? उन्होंने राजनीति का ऐसा डंक मारा कि, शायद चाणक्य की आत्मा भी उन्हें आशीष देती हो..? एक दिन सुरेन्द्र कौर के घर जाकर सत्रह बार मिले, हर बार वे किसी न किसी काम से वहां गए। जाते तब उनके लबों पर मुस्कान बिखरी होती, और उनके लौटते वक़्त उनके लबों पर विजयी मुस्कान फ़ैली हुई साफ़ नज़र आती थी।

ठाकुर साहब के इस अभियान की सूचना, उस वक़्त विष्णुजी के पास पहुँची..जिस वक़्त उन्होंने सुरेन्द्र कौर को वोटों के गठबंधन करने के लिए घर बुलाया था। ठाकुर साहब के बार-बार मुलाक़ात करने की सनसनी खेज़ ख़बर सुनकर, विष्णु प्रकाश चतुर्वेदी तिलमिला उठे...उनके अंतर्मन में शंकाओं का तूफ़ान खड़ा हो गया। उसी वक़्त वे अपने विश्वासी समर्थकों को साथ लिए, सुरेन्द्र कौर के घर जा धमके। शंकाए दोनों के मन में थी, सो बात ही बात में..वे दोनों आपस में, वाक् युद्ध कर बैठे। यह लड़ाई इतनी बढ़ी कि, अख़बारों की सुर्ख़ी बन गयी।

अगले दिन अख़बार देखकर, ठाकुर साहब हंस पड़े और सुरेन्द्र कौर के नंबर डायल करके बोले “मेडम आप ही सोचे जो आदमी बिना जीते ही यह हरक़त कर सकता है, वह जीतकर क्या साथ देता आपका ?...न...न.. मैं आपसे यह नहीं कह सकता, आपके आदमी मुझे ही वोट दें। मैं तो ज़रूरतमंद शिक्षकों का सेवक हूँ, जब-तक ज़िंदा हूँ..तब-तक उनकी सेवा करता रहूँगा।”

कमाल की सूझ-बूझ पायी, ठाकुर साहब ने। सच्च तो यह है कि, राजनीति का केंद्र-बिंदु है उखाड़-पछाड़..इसमें जो जितना माहिर है, उतना ही सिद्ध-हस्त है। ठाकुर साहब में यह देवी-गुण, ठूंस-ठूंसकर भरा हुआ था। किन्तु मन में छिपी शक्तियां अनुकूल समय पाकर जाग उठती है, उसी प्रकार ठाकुर साहब के मन में छिपी राजनीति की ताड़का शक्ति उस वक़्त जाग उठी थी।

यहाँ-तक कि, उनकी सामयिक सूझ-बूझ देख, कभी-कभी राम रतन बोहरा भी अपना सर धुना करते थे। उनको समझ में यह बात नहीं आ रही थी, ‘गिरधारी सिंह का अभी से यह हाल है, तो ज़िलाध्यक्ष बनने के बाद उनका क्या हाल होगा..?’ भगवान न करे, तब राम रतन बोहरा की ज़रूरत तो क्या ? उनकी याद भी, शायद ठाकुर साहब को न आये..?

आख़िर ठाकुर साहब ने अपने निकटम विरोधी उम्मीदवार को तीन सौ वोटों से हराकर, चुनाव में जीत हासिल कर ली। जिस दिन चुनाव-परिणाम घोषित हुआ, उस वक़्त ठाकुर साहब के पाँव ज़मीन पर न पड़ते थे। एक रावण था, जिसने यमराज को अपने घर बंदी बनाया था। दूसरा था, भस्मासुर..जिसने शिव की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी। तीसरे रहे हमारे ठाकुर गिरधारी सिंह, जो चुनाव जीतकर स्वयं को सर्व शक्तिमान व अजय समझ बैठे। और कह बैठे राम रतन बोहरा को “भा”सा, देखा आपने ? मेरे अनुष्ठान का चमत्कार..त्रैयलोक्य विजय-मन्त्र ख़ाली नहीं जाता।” बाद में हंसकर कहने लगे असल बात बताता हूँ, भासा। सुरेन्द्र कौर से सत्रह बार, यहाँ कौन पूत बैठा है...मिलने वाला ? हम तो केवल उनके आवास की फाटक खोलकर गए थे, उनके किरायेदारों से मिलने। जिनके दादा-पड़दादा, हमारे दादा-पड़दादा के कामदार रहे थे।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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पाठकों।

जोधपुर, मंगलवार, तारीख़ 1 जनवरी 2019

कैसा लगा, यह अंक १६..? आपने फिर, यह भी पढ़ा होगा ‘हमारे ठाकुर साहब कहाँ कम थे..? उन्होंने राजनीति का ऐसा डंक मारा कि, शायद चाणक्य की आत्मा भी उन्हें आशीष देती हो..?’ राजनीति का डंक से हमारा तात्पर्य रहा है, डिवाइड एंड रूल। जिसका प्रयोग उन्होंने, अपने विरोधियों को धाराशायी करने के लिए किया। उन्होंने अपने सामने खड़े विष्णु प्रकाश चतुर्वेदी और सुरेन्द्र कौर जोशी को, आपस में लड़वा दिया। जिससे, यह हुआ...वे आपस में एक-दूसरे पर नुक्ताचीनी करते रहे, और अपनी भावी योजना अध्यापकों के सामने न ला सके। दूसरी तरफ़ ठाकुर साहब अध्यापकों को उनके हित में काम ली जाने वाली आकर्षक योजना बताते गए, इस तरह अध्यापकों का स्वत: रुंझान ठाकुर साहब की ओर बढ़ता गया। आख़िर ठाकुर साहब ने अपने निकटम विरोधी उम्मीदवार को तीन सौ वोटों से हराकर, चुनाव में जीत हासिल कर ली। ठाकुर साहब वास्तव में सुरेन्द्र कौर से मिले या नहीं, यह बात रहस्य बनी रही। ख़ुद ठाकुर गिरधारी सिंह के शब्दों में यही बात मालुम हुई कि, “भा”सा, देखा आपने ? मेरे अनुष्ठान का चमत्कार..त्रैयलोक्य विजय-मन्त्र ख़ाली नहीं जाता।” बाद में हंसकर कहने लगे असल बात बताता हूँ, भासा। सुरेन्द्र कौर से सत्रह बार, यहाँ कौन पूत बैठा है...मिलने वाला ? हम तो केवल उनके आवास की फाटक खोलकर गए थे, उनके किरायेदारों से मिलने। जिनके दादा-पड़दादा, हमारे दादा-पड़दादा के कामदार रहे थे।

अब आपके सामने पुस्तक डोलर-हिंडाका अंक १७ फड़सा पार्टी शीघ्र ही प्रस्तुत किया जा रहा है। आप बेसब्री से, इस अंक का इन्तिज़ार करें।

शुक्रिया।

आपके ख़तों की प्रतीक्षा में

दिनेश चन्द्र पुरोहित [लेखक – पुस्तक डोलर-हिंडा]

ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com

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