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मुकदमेबाजी // हास्य व्यंग्य तथा अन्य कविताएँ // अविनाश ब्यौहार

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मुकदमेबाजी

बाई द वे

आपकी किसी

वकील से

हो जाये

नोंक झोंक!

तो इस बात

से मत चौंक!!

कि वह तुम्हारे

खिलाफ मुकदमा

करेगा!

क्योंकि आदमी

कोर्ट कचहरी

से डरेगा!!

वहाँ होगी जिरह

होंगे तर्क!

उसका तो

कुछ नहीं बिगड़ेगा

पर आपका हो

जायेगा बेड़ा गर्क!!

मतलब वकील साहब

को वकील होने

पर गुमान है!

जबकि ऐसी मुकदमे बाजी

गड़रिया पुरान है!!

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व्यंगिका

जब उन्होंने

बदतरीन शासन

देखा तो

इसे बरदाश्त

नहीं कर पाये

नेकअमल!

उन्हे मिले खल!

खल से

मिला बुत्ता!

हाकिम का

कुत्ता!!

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गौमुखी बाघ

जो सरकार के

प्रति ईमानदार हैं!

वे लोगों की

नज़र में

खाकसार हैं!!

समाज में भी

खोटे सिक्के

कहलाये!

ऐसी उल्टी खोपड़ी

वालों से हम

बाजआये!!

क्योंकि हमने देखा

कि गधे को गधा

ही खुजाता है!

कार्मिक सरकारी

धन को खुर्द बुर्द

कर जाता है!!

लेकिन ऐसे लोग

धन्यवाद के

पात्र हैं!

उपदा यदि

आत्मा है तो

ये उसके

गात्र हैं!!

चुनांचे लोकज्ञ नें

माना कि बदअमली

से आम लोग

छान रहे हैं खाक!

देश में है निफाक!!

हर कर्मी

घाघ है!

गौमुखी बाघ है!!

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नवगीत

पूष को
सूर्य किरण
रही है
बुहार!

जाड़े में
हैं जम गईं
रातें!
कंबल ऊनी
शाल के
नाते!

बाग में
मंडराते
अलि की
गुहार!

है पहाड़ों
पर कोहरा
घना!
पारा लुढ़का
मौसम
अनमना!

खिल रहे
फूलों की
सूर्य को
जुहार!

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दोहे

जाड़ा ऐसा पड़ रहा, काँप रहा है गात।
दिन पहना है धूप को, अकड़ गई है रात।।

हर क्षण खुशियों में पगे, नया नया है साल।
ॠतु परिवर्तन होऐगा, उतरे जाड़ा छाल।।

झर झर झरता कोहरा, दिन को ले आगोश।
तमतमाते सूरज के, है ठंडे सब जोश।।

नऐ साल की भोर है, जैसे दुल्हन रूप।
उजले दिन भरने लगे, अंधकार के कूप।।

जाड़े में निस्तेज है, पूष माह की धूप।
चमकीले से दिवस हैं, दिनकर होता भूप।।


अविनाश ब्यौहार,

कटंगी रोड, रायल एस्टेट,

माढ़ोताल जबलपुर।

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