नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

व्यंग्य // बाबा बहुरंगी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

बाबा संबोधन बच्चों और बूढों के लिए भी प्रयुक्त होता है। कुछ बाबा वे भी हैं जिनसे बच्चे आम माँगते हैं – बाबा बाबा आम दो। साधु-संत भी बाबा ही कहलाते हैं। लेकिन कुछ साधु-संत न होकर केवल बाबाबों का रूप भर धर लेते हैं। इनकी निराली छटा देखने लायक है। वे बेशक लम्बी साधना के बाद ही साधुओं की श्रेणी में आए हैं, किन्तु इन बेचारों को अपनी पहचान बनाने के लिए लीक से हटकर अपनी रूपसज्जा करनी पड़ती है। ऐसे बाबा, ज़ाहिर है, वे अनदेखे और अचर्चित नहीं रहना चाहते।

तरह तरह के और किसिम किसिम के बाबा हैं। फेशनेबल और स्टाइलिश बाबा हैं। फक्कड़ बाबा हैं। नागा बाबा हैं। सजे-धजे बाबा हैं, भस्म-विभूत बाबा हैं। अम्बर बाबा हैं, दिगंबर बाबा हैं। लाठी बाबा है। डांडी बाबा हैं। इनका फैशन और स्टाइल अलग और अनोखा है। इनकी उपस्थिति से, जहां भी मेले-ठेले में वे जाते हैं, वहां का माहौल बहुरंगी हो जाता है। कुछ को देखकर बच्चों का मन मुग्ध हो जाता है तो कुछ को देखकर बच्चे डर भी रहे हैं।

कुम्भ-पर्व पर संगम में डुबकी मारने, देश दुनिया के हर कोने से आए भक्तों और पर्यटक आते हैं, अनेक बाबा लोग भी आते हैं। वे सहज ही आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। हर बाबा का अपना अपना ‘हेयर-स्टाइल’ है। किसी ने अपने बाल बेतरतीब छोड़ रखे हैं तो किसी ने बड़े करीने से उन्हें सजाया हुआ है। किसी ने साफे की तरह अपने बालों को बाँध रखा है तो किसी ने उनसे अपने सर पर मुकुट सजाया है। एक बाबा तो ऐसे भी हैं जिन्होंने फेल्ट-हैट सरीखी कोई टोपी लगा रखी है, जिस पर चाँद चिह्नित है। किन्हीं ने नज़र का चश्मा पहना हुआ है तो कुछ काला चश्मा लगाए हुए हैं। कुछ को चश्मे से परहेज़ है औए वे अपनी आँखें, जैसी भी हैं, दिखाने से बाज़ नहीं आते।

नागा बाबाओं का अपना ही जलवा है। वे पूरी तरह निर्वस्त्र हैं। कंपकंपी छुटा देने वाली सर्द हवाओं से लड़ते हुए इन नागा बाबाओं ने स्वयं को दिगंबर छोड़ रखा है और बदन पर कपड़ों की जगह मात्र भस्म पोती हुई है। बाबाओं में सबसे अधिक तरजीह इन्हीं बाबाओं को दी जाती है। सर्व प्रथम स्नान हेतु वे ही आगे आते हैं। लोग-लुगाइयों का श्रद्धा भाव सर्वाधिक उन्हीं पर उमड़ता है।

बाबाओं के गले में तरह तरह की मालाएं हैं। कुछ ने मोतियों का चमकदार हार पहना हुआ है तो कुछ ने रुद्राक्ष की माला धारण की हुई है। कुछ तो मुंड-माला तक पहने हैं। कुछ बाबाओं ने तुलसी के दानों से बने हार भी अपने गले में डाल रखे हैं।

अपने-अपने निराले रूप में जब बहुरंगी बाबा प्रकट होते हैं तो उनके साथ सेल्फी लेने के लिए होड़ सी लग जाती है। पत्रकार उन्हें अपने कैमरों में कैद कर लेते हैं। बाबा भी मुस्कराते हुए अपना पोज़ देते हैं। महिलाएं भी बड़ी श्रद्धा से बाबाओं के धूने पर शीश नवाने में पीछे नहीं रहतीं। विदेश से पधारी महिलाएं भी बाबाओं के इस बहुरंगी रूप को देखकर नतमस्तक हो जाती हैं। बाबाओं का बाबा होना तब मानों सफल हो जाता है।

कुम्भ नगरी में बाबाओं के बड़े मज़े हैं। उनका वैभव तो कुम्भ नगरी में आकर ही पता चलता है। उनके लिए राजमहल जैसे पंडाल निर्मित किए गए हैं। पंडालों की आतंरिक सज्जा, सज्जा-विशेषज्ञों द्वारा की गई है। ये पंडाल फाइव-स्टार होटल या राजमहलों का का लुक देते नज़र आते हैं। पंडालों को बनाने में लकड़ी तथा थर्माकोल का इस्तेमाल किया गया है। अन्दर सुन्दर चित्रों से सजे ये पंडाल रात में बिजली के प्रकाश से जगमगाते हैं। इन शिवरों में कुछ ऐसे भी शिविर हैं जो वृन्दावन के मंदिरों की याद दिलाते हैं। वहां के परिवेश में मानो राधाकृष्ण जीवंत हो उठते हैं।

अब वक्त आ गया है कि हम अपने मन में बाबाओं के सन्दर्भ में जो गलत धारणाएं हैं उन्हें त्याग दें। बाबा कोई बेचारा और बूढा, सहज और सुस्त, गरीब और गुरबा अथवा महात्मा उआ संत नहीं होता। बाबाओं के मठ हैं और हर मठ का मठाधारी, एक महंत, बाबा है। बाबाओं का यह वैभव अच्छे अच्छे रईस जादों को ईर्ष्या की आग में झोंक सकता है।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११ ००१

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.