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व्यंग्य आलेख // दुम // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

दुम एक ऐसी चीज़ है जो अधिकतर प्राणियों में पाई जाती है। इसे पूँछ या पुच्छ भी कहते हैं। शायद इसलिए कि यह पशुओं के पीछे की ओर (पुच्छ) रहती है। बन्दर, कुत्ता, बिल्ली इत्यादि सभी पशुओं के पूंछ, या कहें, दुम होती है। किसी के छोटी होती है तो किसी के बड़ी होती है। हाथी एक बहुत बड़ा जानवर है लेकिन उसकी पूंछ उसके शरीर की अपेक्षा से बहुत छोटी होती है। लंगूर उसके मुकाबले एक छोटा जानवर है लेकिन अपेक्षा- कृत उसकी पूंछ बड़ी लम्बी होती है। जानवर की लम्बाई चौडाई से उसकी पूंछ का कोई सार्थक सम्बन्ध नहीं होता। किसी की पूंछ सीधी होती है तो किसी की सीधी नहीं होती। किसी की दुम के आखिर में बड़े बड़े बाल होते हैं तो किसी के नहीं होते। कहते हैं कि कुत्ते की दुम, जब तक वह पागल ही न हो जाए, हमेशा टेंडी ही रहती है।

आदमी के पूंछ नहीं होती। वैज्ञानिकों का कहना है कि हो सकता है कभी इंसान के भी पूंछ रही हो, किन्तु विकास-क्रम में वह विलुप्त हो गई। अनुपयोग के कारण ऐसा हो जाना संभव है। आदमी ने अपनी पूंछ का उपयोग ही नहीं किया और इसलिए वह भी उसका साथ निभा नहीं पाई।

भले ही इंसान के एक अदद पूंछ न हो लेकिन वह पूंछ के सारे काम बाकायदा करता है। उसने अपनी दुम के कार्यों को अन्यान्य इन्द्रियों को वितरित कर दिया है। कुत्ता जब खुश होता है, अपनी दुम हिलाने लगता है। आदमी खीसें निपोरता है। कुत्ता चापलूसी करते वक्त भी अपनी दुम हिलाता है। आदमी ज़बान हिलाता है। लगता है आदमी की दुम उसके मुंह और ज़बान में समा गई है। अपनी खीसें निपोर कर और ज़बान का इस्तेमाल कर वह दुम की क्षतिपूर्ति करता है।

आदमी की दुम भले ही नष्ट हो गई हो, लेकिन अपनी पूंछ के न रहने का दर्द उसे अभी तक सालता है। वह गाहे-बगाहे उसकी याद करता रहता है। अपनी वार्ता में वह दुम संबंधी गालियाँ बकता है – उल्लू की दुम कुत्ते की दुम, इत्यादि। साहित्य में साहित्यकारों ने अनेक जानवरों के ऊपर अपने आलेख और निबंध आदि, लिखे हैं। कुत्ते और गधे की तो आत्म-कथाएं तक लिखी गईं हैं, लेकिन इनकी पूंछ के बारे में अभी तक नहीं लिखा गया। मुझे ‘आशा ही नहीं पूरा विश्वास है’ कि कभी न कभी दुम के दिन भी फिरेंगे और साहित्यकार उसे भी अपनी लेखनी से सम्मान देने में कोताही नहीं बरतेंगे। वैसे यह काम बहुत-कुछ शुरू तो अब हो ही गया है। कई कविगण ‘दुम-दार दोहे’ तो रचने ही लगे हैं।

दुम बड़ी चीज़ है। जिसके दुम नहीं उसकी कोई पूछ नहीं। न जाने कितने लोग नेताओं के दुमछल्ले बने फिरते हैं। जितना बडा नेता उसके उतने ही पिछलग्गू। हर नेता अपनी दुम से जाना जाता है। किसी भी इंसान का किसी अन्य का दुम बन जाना एक बड़ी बात है। इसमें दोनों ही खुश रहते हैं। जिसके दुम नहीं होती उसकी पूछ हो जाती है और दूसरा तो साक्षात दुम बन ही जाता है।

ईश्वर ने लगभग सभी प्राणियों को एक अदद दुम बख़्शी है। बस इंसान को ही उससे महरूम रखा है। बड़ी ज्यादती है। एक नास्तिक से मेरी मुलाक़ात हुई। मैंने उनसे पूछा, आखिर आपको ईश्वर से इतना परहेज़ क्यों है ? बोले, क्यों न हो ? हम ही कहते रहते हैं कि सब सामान हैं और सबसे बराबरी का रिश्ता रखना चाहिए। लेकिन यह गैर-बराबरी तो ईश्वर ही करता है। उसने सबको दी बस हमें ही दुम नहीं दी। अब हमारे प्राण उसी में अटके हैं। ऐसे में हम आस्तिक कैसे रह सकते हैं ?

माना कि हमने दुम के अभाव की पूर्ति अन्य कई और तरीकों से कर ली है लेकिन इससे हम असली दुम से तो फिर भी वंचित ही रह गए ना ! सोते-जागते, उठते-बैठते, बस इसी बात की इक हूक-सी दिल में उठती है – काश हमारे भी एक दुम होती ! सच कहते हैं, यदि हमारे पीछे भी कोई दुम होती तो हम भी हनुमान जी से कतई पीछे न रहते।

हनुमान जी की दुम का तो कहना की क्या ? राम भक्त हनुमान जहां राम के प्रति अपनी उत्कट भक्ति के लिए जाने जाते हैं वहीं वे अपनी पूंछ के लिए भी विख्यात हैं। अपनी इसी दुम के सहारे उन्होंने सारी लंका में ही आग लगा दी। रावण का इरादा उसकी पूंछ में आग लगा कर हनुमान की दुर्गति कर उसे प्रताड़ित करने का था लेकिन हो गया उलटा ही। हनुमान की दुम में आग क्या लगी, लंका का ही दहन हो गया। रावण बेचारा तापता ही रह गया।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०. एच आई जी / १, सर्कुलर रोड ,

इलाहाबाद -२११००१

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