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भावभूमि को कंपित करती कविताओं का संग्रह - बदलती लकीरें

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कविता के बारे में क्या कहें- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी जितनी शास्त्रीय और मार्मिक समीक्षा की है उसके बाद अब क्या कहा जाए! कहां से आती है,कैसे उतरती है,कैसे आकार लेती है कविता इसके बारे में जितना भी,जैसा भी कुछ कहा जाता है उसके बाद भी बहुत कुछ छूट जाता है,अनकहा रहा जाता है। कुछ रहस्यमय सी होती है कविता इसलिए भीड़ में भी हमें घेर लेती है और अपने साथ ले चलती है एकांत में कहीं या अकेले बैठे हों तो न जाने कितनी यादों की भीड़ के साथ चली आती है। कविता ऐसी न होती तो शायद दिल की गिरह खोलने वाले इतने हरदिल अजी़ज़ कवि भी न होते। ज़िंदगी की बेसाख्ता मसरूफियत के बीच भी कविता खूश्बू की तरह जिनके दिल-ओ-ज़हन में उतरती है उनमें एक नया और खास नाम है संध्या रियाज़ का। नाम से जाहिर है कि जैसे कविता के लिए सरहदें बेमानी होती हैं वैसे ही संध्या के लिए मज़हब की सरहदें बेमानी रही हैं। वे टीवी की दुनिया में एक सम्मानजनक नाम हैं,मुंबई में रहती हैं,उस मुंबई में जो बेहद खूबसूरत है पर जिसकी खूबसूरती को देखने का वक्त और ज़रूरत दोनों ही वहीं के बाशिन्दों के पास बहुत कम है। आपाधापी इतनी है कि आदमी खुद का पता भी भूल जाता है,फिर सिनेमा से जुड़ा काम हो तो यह और भी बढ़ जाती है। संध्या रियाज़ की कविताओं की चर्चा करने के पहले इन बातों पर चर्चा करना एक तरह से ऐसा है जैसे कैनवास पर कलर कंट्रास किया जा रहा हो,कवि की पृष्ठभूमि उसकी भावभूमि से भी जुड़ती है। संध्या रियाज़ की कविताओं का संग्रह है- बदलती लकीरें। इसकी भूमिका में कहानीकार असग़र वज़ाहत ने एक पते की बात कही है – संध्या भावनात्मक संघर्षों की कवयित्री हैं। हिन्दी की समकालीन कविता की एक धारा कहीं न कहीं ओढ़ी हुई बौद्धिकता से बोझिल दिखाई पड़ती है। इस परिप्रेक्ष्य में संध्या रियाज की कविताएं अपनी सहजता और सरलता के लिए आकर्षित करती हैं।

उनकी कविताओं में मानवीय मन की हर प्रवृत्ति बड़ी खूबसरूती से आकार लेती है। वहां स्मृतियों की गमक है तो आशंकाओं का अंधेरा भी,भय है तो ज़िदगी का सवेरा भी। उम्मीदें हैं,विडंबनाएं हैं,सवाल हैं और सवालों की तलाश भी,जिज्ञासाएं हैं बच्चों की तरह और मां भी है। उनकी कविता अम्मा- पढ़कर मां की अनगिनत यादें किसी के भी भीतर मचल सकती हैं- अम्मा के जाने के बाद/उनकी पेटी से एक थैला मिला है/जिसमें मेरे बचपन का रेला मिला है/एक चरखी एक लट्टू एक गुड़िया मैली सी/एक नाव आड़ी टेढ़ी लहरों में फैली सी/एक किताब जिसमें पहली बार मैंने अम्मा लिखा था/लाल रूमाल में बांध के अम्मा ने अब तक रखा था/हां तीन पेन्सिल मेरी उसमें टूटी हुई भी रखीं थीं/डोर जिसमें अम्मा की साड़ी की अब तक बंधी थी---। ऐसी कई कविताएं हैं जिन्हें पढ़ना ऐसा है जैसे धूप में भागते हुए सांस टूटने लगे और दम लेने के लिए कोई छाया भरा दरख्त मिल जाए। एक कविता है चिड़िया। बेशक यह प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन की कविता है जो मन के भीतर कहीं कुछ टूट रहे हिस्से को थाम लेती है लेकिन इसमें एक प्रतीक भी उपस्थित है जिसमें समाज में लड़की की स्थिति देखी जा सकती है। मुम्बई जैसे शहर की विडम्बनाएं ‘वो आदमी शीर्षक कविता में रेखाचित्र की भांति उतरती हैं। अनजाने शहर में घर बसाने का डर बहुत गहरा होता है/बसते हैं घर नयी-नयी बस्तियों में नये-नये शहरों में/बेगानों के घर के आसपास। एकाकीपन का यह दंश,अपनों से दूर होने की विडम्बना कचोटती हैअनजान शहर शीर्षक कविता में। स्त्री विमर्श की कविता है बेजान दरवाजा। एक औरत की ज़िन्दगी कैसे हादसों की मुकम्मल कहानी होती है इसकी सहज बानगी इस कविता में सरलता से आकार लेती है।

संध्या रिजाज़ की कविताओं के इस संग्रह ‘बदलती लकीरें में जीवन का हर रंग उपस्थित है। उनके कहने की सादगी कठिन और दुरूह विषयों को भी मर्मस्पर्शी बना देती है। ये कविताएं पाठक के मन में विचारों की तरंगें पैदा कर देती हैं,उसकी तटस्थता को तोड़ती हैं और उसकी भावभूमि को कंपित कर देती हैं।


समीक्षक – धीरेन्द्र शुक्ल

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कवयित्री- संध्या रियाज

संग्रह का नाम- बदलती लकीरें

कवयित्री- संध्या रियाज प्रकाशक-अनामिका प्रकाशन इलाहाबाद

मूल्य- 200 रूपये

संध्‍या रियाज़ का संक्षिप्‍त परिचय

नाम- संध्‍या रियाज़

जन्‍म-7 जनवरी 1964 भोपाल (मध्‍यप्रदेश) में

शिक्षा- लखनउ विश्‍वविद्यालय से हिन्‍दी साहित्‍य में स्‍नातक

संगीत नाटक अकादमी लखनउ से कथक नृत्‍य की शिक्षा गृहण की।

प्रसिद्ध फिल्‍म निर्देशक मुजफफ्‌र अली की फिल्‍मों,धारावाहिकों और टेलीफिल्‍मों में लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी।

-सहारा वन चैनल में एक्‍सक्‍यूटिव प्रोड्‌यूसर और कलर्स, सहारा वन इमेजिन आदि में प्रसारित अनेकों धारावाहिकों की क्रियेटिव हेड रहीं।

-सम्‍प्रति ः-मुम्‍बई में क्रियेटिव आई लिमिटेड के फिल्‍म एवं टेलीविजन विभाग में आइडियेशन हेड के पद पर कार्यरत।

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