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संस्मरण - पीड़ा में ममता भरी मुस्कान! - धीरेन्द्र "उत्पल"

जून का महीना था। मैं उस समय अलीगढ़ में कुछ काम से दो-तीन सप्ताह रुका था। एक दिन सुबह मैं अपने कमरे से निकल कर एक चाय की दुकान पर जा पहुंचा। वहां पर कोई आठ दस लोगों की भीड़ थी। मैं थोड़ी देर खड़ा रहा। फिर वही पर पड़ी बेंच पर बैठ गया, और अख़बार उठा कर पढ़ने लगा। कुछ देर बाद एक बुढ़िया आयी। बुढ़िया की उमर कोई पचहत्तर के आस-पास थी। 

चायवाले से बोली- लला(बेटा) चाय कितने की है?

चाय वाला बोला - अम्मा आठ रूपये की।

बुढ़िया वहीं से वापस लौट पड़ी।

चायवाला बोला- क्या हुआ अम्मा।

बुढ़िया बोली- हमारे पास लला पाँच रूपये हैं।

इतना कह कर आगे बढ़ी ही थी कि चायवाले ने आवाज दी, अम्मा आओ चाय पी लो पैसे की कोई बात नहीं ।

बुढ़िया आयी और कंपते हाथों से चाय का प्याला पकड़ कर बेंच पर बैठ गयी और चाय पीने लगी।

थोड़ी देर बाद चायवाले ने पूछा - अम्मा क्या कोई काम से आई हो शहर।

बुढ़िया ने आवाज भारी करके कहा- लला दवाई लेन आयी हती(बेटा दवाई लेने आई थी)।

फिर वह अपने ब्लाउज की जेब से बिस्किट निकाल कर खाने लगी।

कुछ देर मैं चुप बैठा रहा ।

फिर पूछा - दादी तुम्हारे साथ कोई नहीं आया क्या?

बुढ़िया कुछ न बोली और चाय पीती रही।

मैं भी दोबारा कुछ न पूछा और अपना चाय का ग्लास उठा कर पीने लगा।

कुछ समय बाद चाय वाले की दुकान की भीड़ चली गयी।

चायवाला बुढ़िया से बोला - अम्मा लला साथ न लायी हो।

बुढ़िया स्तब्ध रह गयी जैसे उसके सिर पर बिजली गिर गयी हो।

उसकी करूणामयी आँखों से आंसू बहने लगे।

वह अपनी धोती का किनारा पकड़ कर आंसू पोंछती हुई बोली - लला सब भाग्य दौड़ है। इतना कहते ही उसकी आवाज भारी हो गयी और आँखों से मानों एक धार सी बंध गयी हो ।

यह दृश्य देख कर मेरा मन भी भर गया। मैं इस वक्त बुढ़िया के प्रति अपनी वेदना व्यक्त न कर सका।

और वह माथे में धोती का किनारा लगा कर सोचने लगी।

उसके हृदय में इस वक्त वह बचपन की स्मृति उजागर हो रही थी। जब वह पांच-सात बरस की रही होगी।

वह अपने पिताजी से बहस कर रही थी और जिद तो इतनी कि आसमान भी उसके लिए बुलाया जाय।

सूरज भी उसकी जिद के आगे घर भेजा जाए।

और गुस्सा आये तो सारे घर को सर पर उठा ले।

आंसू पोंछते हुए बोली चार लला(बेटा) हैं चार बहुरिया हैं । नाती - नातियां हैं । लेकिन जैसे ही साथ चलने की बात पड़ी एक दूसरे की ओर इशारा करके सब टाल देते हैं।

चायवाले के मुख पर भी दया भाव दौड़ रहा था, और उसकी आंखें भी नम हो रही थीं।

तभी चाय वाले ने पूछा क्या हुआ है अम्मा?

बुढ़िया ने ब्लाउज को खोला और दिखाने लगी।

उसके वक्ष के नीचे बड़ा-सा घाव था फिर घाव को ढकते हुए बोली जब बुढ़ऊ जिंदा थे, साथ चले आते थे अब तो बस लला (बेटा) इसका ही सहारा (लाठी दिखाते हुए बोली) है।

चायवाले ने कहा अम्मा ऐसी ही औलादें जीते जी नरक देखती हैं। आखिर समय में घटिया पर मल मूत्र करते हैं । कीड़े पड़के मौत आती है। बड़बड़ाते हुए चाय बनाने लगा।

तभी बुढ़िया बोली - लला(बेटा) अपनी छाती का दूध पिलाया है। सपने में भी भगवन से अपने लला (बेटा) के लिये बद्दुआ न मांगूं। और वह दर्द से कराहती हुई बोली भगवन लला (बेटा) पर छाया (दया) बनाये रखे।

वह पीड़ा लिये तन पर फिर भी ममता भरी मुस्कान अपने लड़कों पर बिखेरती हुई चली गई।

और मैं थोड़ी देर बैठा सोचता रहा कि दुनिया के कितने विचित्र रूप हैं। ऐसे सामने आ जाते हैं कि सारी चेतना जड़ हो जाती है। फिर मैं उठा और वापस कमरे पर चला आया । सारा दिन सोचता रहा एक व्याकुलता बनी रही।

इस मातृत्व का ऋण हम सहस्त्र जन्म लेकर भी नहीं चुका सकते हैं।

                              - धीरेन्द्र "उत्पल"

                          सीतापुर (उ०प्र०)261206

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