नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

'ओमप्रकाश वाल्मीकि का अंतिम संवाद' का लोकार्पण

50224032_2059711184076266_900739991561306112_n

नई दिल्ली। लोकतंत्र में जैसे विचारों की विविधता की बात होती है उसी प्रकार अनुभवों की भी विविधता होती है और इन सबसे मिलकर राष्ट्रीय साहित्य तैयार होता है। सच कहा जाये तो जो उस समाज को जीता है वही उस समाज को लिख सकता है और ओमप्रकाश वाल्मीकि ने वही लिखा जो उन्होंने जिया। सुप्रसिद्ध दलित लेखक और विचारक प्रो श्योराज सिंह बेचैन ने उक्त विचार विश्व पुस्तक मेले में आयोजित एक समारोह में व्यक्त किये।प्रो बेचैन राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'ओमप्रकाश वाल्मीकि का अंतिम संवाद' का लोकार्पण कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मैं आज बहुत ज्यादा खुश हूँ कि राजपाल ने यह पुस्तक छापी है और उनका जो सन्देश है वो सकारात्मक रूप में बहुत दूर तक जायेगा। वाल्मीकि जी जिस समाज से लेखन की दुनिया में आये और जो उन्होंने साहित्य को जो योगदान किया वैसा कोई और दूसरा नहीं दे सकता।

राजस्थान से आए प्रसिद्ध आदिवासी कवि- उपन्यासकार हरिराम मीणा ने कहा कि विषय वस्तु विधा तय करती है न कि लेखक तय करता है। जमीनी हकीकत को जानने के लिए संस्मरण,देशाटन के लिए यात्रा वृतांत, दृश्य,मानसिकता और अन्य कथ्य कहानी के रूप में जाने जा सकते हैं। विषय साहित्य को विस्तार प्रदान करते हैं और वही उसमें यथार्थबोध प्रदान करते हैं। उन्होंने वाल्मीकि जी से किये इस लम्बे और महत्त्वपूर्ण संवाद को विधा की उपलब्धि बताया।

सुप्रसिद्ध पत्रकार दिलीप मंडल ने कहा कि कोई व्यक्ति अपने जीवन काल में बनता रहता है, बदलता रहता है हमेशा एक जैसा नहीं रहता। असल में यह वाल्मीकि जी के जीवन का सारतत्व हीं है जो इस फॉर्मेट में आया है और इसे उनके जीवन का निचोड़ भी कहा जा सकता है। साज सज्जा भी पुस्तक की अच्छी है,लेखक और प्रकाशक इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं।

चर्चा में जाने माने आलोचक डॉ बजरंग बिहारी ने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से भंवरलाल जी ने बड़ा सराहनीय काम किया है। उन्होंने भंवरलाल मीणा को जमीनी लेखक बताते हुए कहा कि एक समय में उन्होंने राजस्थान के आदिवासी समाज में घूम घूम कर लोकगीत इकट्ठे किये हैं वह आज के समय में बहुत मुश्किल काम ही है। इस पुस्तक को बजरंग जी ने वाल्मीकि जी और दलित साहित्य के सम्बन्ध में आवश्यक और अविस्मरणीय कार्य बताया।

इससे पहले इससे पहले पुस्तक के लेखक भंवरलाल मीणा ने इस पुस्तक की रचना प्रक्रिया बताते हुए वाल्मीकि जी के साथ व्यतीत समय को याद किया। संयोजन कर रहे बनास जन के समापदक और आलोचक पल्लव ने पुस्तक के सम्बन्ध में अपने विचार रखे। उन्होंने वाल्मीकि जी से अपनी अंतिम मुलाकातों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि दलित साहित्य को मुख्य साहित्य के प्रकाशकों तक पहुंचने में समय लगेगा पर आज दलित साहित्य अपने चरमोत्कर्ष पर है और उसी का फल है कि यह किताब राजपाल एंड संस से प्रकाशित हो पाई है।

अंत में राजपाल एंड सन्ज़ की तरफ से प्रकाशक मीरा जोहरी ने सभी का अभिनन्दन किया।

रिपोर्ट -  मीरा जोहरी

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.