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आलेख - साहित्य समाज और राजनीति की त्रिवेणी-डॉ. लक्ष्मीनारायण सुधांशु -डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज



    “जीवन के बिना सौंदर्य की सत्ता भी अच्छी तरह प्रकट नहीं हो सकती।”…काव्य में कलाकार अपने आत्म- भाव को स्रष्टा के अनुरूप ही रखता है । सृष्टि में ब्रह्म की जो व्यापक सत्ता है, वही काव्य में कवि की रहती है। सृष्टि के अणु-परमाणु में ब्रह्म व्याप्त है, परंतु वह लक्षित कहीं भी नहीं होता। काव्य के वर्ण-वर्ण में कवि का आत्म-भाव परिव्याप्त रहता है, किंतु वह स्पष्ट कहीं भी लक्षित नहीं।” उक्त पंक्तियां डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु ने अपने समीक्षा- ग्रंथ ‘जीवन के तत्त्व और काव्य के सिद्धांत' में कही हैं। डॉ सुधांशु साहित्यिक क्षेत्र में एक सुधी समीक्षक के रूप में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इस पुस्तक में उन्होंने अपने समीक्षा संबंधी विचारों को अधिक व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित करना चाहा है। साथ ही इसमें दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधारभूमि पर काव्यसिद्धांतों को परखने की चेष्टा की गई है। रोमांटिक काव्यशास्त्र की धारणाओं के अनुरूप उन्होंने आत्म-भाव की अभिव्यक्ति को ही कला का मुख्य उद्देश्य माना है।

    डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु जी का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के रूपसपुर गांव में 18 जनवरी, 1908 को माता गोदावरी देवी की गोद में हुआ था। पिता थे ठाकुर धनपत सिंह, जो एक जमींदार थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव और शहर दोनों में हुई। बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में एम. ए. किया। कहा जाता है कि 12 वर्ष की उम्र में ही इन्होंने एक उपन्यास लिखा था। यह पुस्तक अनुपलब्ध है। विद्यार्थी-जीवन में ही इन्होंने ‘कुमार’ एवं ‘अशोक’ नामक पत्रिकाओं का संपादन किया। 1935 से 38 ई. तक गोवर्धन साहित्य विद्यालय देवघर में प्रधानाध्यापक रहे। उसी समय प्रांतीय सम्मेलन के त्रैमासिक मुखपत्र ‘साहित्य’ का संपादन किया था। इसके अतिरिक्त पूर्णिया जिले के साप्ताहिक पत्र ‘राष्ट्र-संदेश’ तथा पटना के मासिक पत्र 'अवंतिका' के भी संपादक रहे। बिहार सरकार द्वारा संस्थापित हिंदी प्रगति समिति के आप अध्यक्ष भी रहे थे। 1950 ई. में इन्होंने गया में आयोजित बिहार-हिंदी-साहित्य-सम्मेलन के 21 वें अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

    डॉ सुधांशु जी ने न सिर्फ साहित्य में ही, अपितु राजनीति में भी अपनी महत्त्वपूर्ण भागीदारी निभाई थी। सन् 1939-40 में पूर्णिया जिलाबोर्ड के अध्यक्ष रहे। 1942 ई. के आंदोलन में जेल गए और वहां की निर्मम यातनाएं सहीं। 1946 ई. में बिहार विधान सभा के सदस्य चुने गए। उसके बाद 1948 में बिहार विधानसभा के कांग्रेस दल के प्रधानमंत्री बने। सन् 1950 में बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मनोनीत हुए। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के जन्मदाताओं में उनकी प्रमुख गणना होती है तथा उसके संचालक मंडल के आजीवन सदस्य भी रहे थे। यह इनके अथक परिश्रम और साधना का ही प्रतिफल है कि पूर्णिया नगर में जिला-साहित्य- सम्मेलन का भवन और कलामंदिर की स्थापना हुई।

    जैसा कि हम जानते हैं कि सुधांशु जी ने अपने छात्र जीवन से ही अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत कर डाली थी। सन् 1926 में ‘भ्रातृप्रेम’ नामक एक उपन्यास तथा 1928 में ‘गुलाब की कलियां’ और 1929 ई. में ‘रसरंग’ नामक कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। उनके दो विवाह हुए। पहली पत्नी देवकी देवी के आकस्मिक निधन के पश्चात् उनकी मर्मस्पर्शी वेदना उनके प्रसिद्ध गद्यकाव्य ‘वियोग’ (1931) में फूट पड़ी है। इसमें उन्होंने अपने अंतर्मन में बसने वाली स्वर्गीया पत्नी की स्मृति में अपने हृदय के हाहाकार को स्वर दिया है। प्रिया वियोग की छटपटाहट, मानव-हृदय के विविध मृदुल, पुरुष भावनाओं-संयोग के क्षण का आनंद, उल्लास तथा वियोग के क्षणों की प्रधानता, शक्तिहीनता एवं दुर्बलता आदि का अत्यंत मनोवैज्ञानिक वर्णन उक्त पुस्तक में प्रस्तुत है। दूसरा विवाह अपनी साली (देवकी देवी की छोटी बहन) जलपरी देवी से हुआ, जिनसे चार पुत्र और दो पुत्रियां हुईं। पहली से कोई संतान न थी।

     डॉ सुधांशु की प्रतिभा समीक्षा के सैद्धांतिक निरूपण में है और इसके लिए उन्होंने मनोवैज्ञानिक सौंदर्यशास्त्र एवं प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के गहन अध्ययन द्वारा समुचित तैयारी की है। छायावाद की छाया तले पलने वाले इस समीक्षक पर रोमांटिक काव्यशास्त्र का प्रभाव यथेष्ट है तथा उन्होंने रामचंद्र शुक्ल की शास्त्रीयता की कड़ियों को ढीला करने का प्रयास किया है। इनका एक बहुचर्चित ग्रंथ ‘काव्य की अभिव्यंजनावाद' (1938) है। इस ग्रंथ में अभिव्यंजनावाद की शब्दावली की ऐतिहासिक रूपरेखा भी है तथा काव्य में अलंकारों के औचित्य, प्रभाव, प्रतीक और उपमान अमूर्त और मूर्तविधान आदि अभिव्यंजना की विशेष प्रवृत्तियों का अध्ययन भी उपस्थित किया गया है। ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’ तथा ‘जीवन के तत्त्व और काव्य के सिद्धांत' की यह एक वास्तविकता है कि इन दो कृतियों की चर्चा बिना हिंदी साहित्य की आलोचना अधूरी रह जाती है। हिंदी आलोचना-विधि के विकास के अध्ययन के लिए इनकी ये दोनों कृतियां आज भी प्रासंगिक हैं। इनमें उनकी सूक्ष्म दृष्टि, गंभीर विवेचन एवं भाषा के प्रांजल प्रयोग का पता चलता है। उपर्युक्त कृतियों के अतिरिक्त उनकी ‘साहित्यिक निबंध' (1964), ‘संपर्क भाषा हिंदी' (1965), ‘हिंदी के दस प्रबंध महाकाव्य' (1967) तथा ‘व्यक्तित्व की झांकियां’ (1970) प्रमुख हैं।

    इन सबके बावजूद सर्वात्मना हिंदीव्रती डॉ सुधांशु जी हिंदी के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए भी राजनैतिक जीवन की व्यस्तता के कारण बहुत कुछ उल्लेखनीय काम नहीं कर सके। उन्होंने स्वयं भी लिखा है, “मैं अनुभव करता हूं कि मुझसे अपराध हो रहा है। साहित्य-सेवा मुझ पर अनिच्छा से लदी नहीं, मैंने स्वयं उसे निमंत्रित किया है। सेवक बनने का दावा किया है। कभी-कभी ऐसी लाचारी होती है कि अपने ही ऊपर खीझ हो जाती है। करूं तो क्या, कहूं तो किससे कहूं?” इनकी स्मृति और सम्मान में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका का अक्टूबर-दिसंबर -2000 अंक ‘लक्ष्मीनारायण सुधांशु-अंक' प्रकाशित किया है। इस एक साथ साहित्यकार, राजनीतिज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता का निधन 17 अप्रैल, 1974 ई. को हो गया।

             डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज, शेखपुरा, खजूरी, नौबतपुर, पटना- 801109.

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