नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

कहानी // यादें // ऋषि सचदेवा

snip_20180912153950

कुछ अधूरे ख्वाब देखे मैंने कल रात,

अजीब से थे, मैंने भुला दिया था तुम्हें, तुम्हीं ने कहा था की वापिस नहीं आना तुम्हें मेरी खुशहाल, आबाद, मुस्कराती ज़िन्दगी में तुम्हीं ने तय कर लिया सब, कब आना है कब जाना है बॉस हो न तुम फैसले लेने का अधिकार तो केवल तुम्हारा ही है खैर......

मैंने तुम्हें एक नाम दिया है "गुमनाम" क्योंकि तुम्हें सब से बात करना सबके सामने आना नापसन्द है कोई तुम्हारी ज़िन्दगी में तांका झांकी करे तो तुम्हें गुस्सा आता है एक और अजीब बात है तुम्हारी की तुम मेरे जीवन में अधूरी सी हो जितना जीना चाहती हो उतना जीती हो, जीतना बताना चाहती हो बताती हो, रहस्य की चादर ओढ़े जीतना आना चाहती हो उतना आती हो बाकी खो जाती हो किसी दीवार के पीछे !!!

पर फिर क्यों अचानक बिन दरवाज़ा खटखटाये चली आयी, और क्या कह रहीं थी तुम की तुम्हें मुहब्बत नहीं है मुझसे,, ठीक है मुझे भी परवाह नहीं तुम्हारी, पर क्यों चली आती हो बार बार यादों में बिन बुलाए मेहमान की तरह ।।

लड़कर गयीं थी तुम, कह कर गयी थी कभी न आओगी पर झूठी हो तुम बहुत झूठी, आती हो रोज़ आती हो मेरी यादों में, मत आया करो मैं नहीं महसूस करना चाहता तुम्हें, तुम्हारे इत्र को, तुम्हारी खुशबू, तुम्हारी छुअन, तुम्हारे आँसू, तुम्हारा मन, नहीं कुछ भी नहीं चाहिए मुझे जो तुम्हारी याद दिलाए, तुम्हारी महक नहीं महसूस करनी मुझे जब भी आती हो रुला जाती हो खुशियों से शायद कुछ एलर्जी है तुम्हें ??

तुमने मुझे भी अपनी तरह झूठा बना दिया, क्यों कह रहा हूँ मैं तुमसे ये सब जब तुम्हें सुनना ही नहीं मेरी ये कहानी बंद हो कर रह जायेगी मेरी किताब में जिसे मैं कभी लिखूंगा ही नहीं कागज़ के पन्नों पर काली स्याही से क्योंकि बहुत सुनहरे रंगीन सपनों को नहीं उकेरना चाहता मैं काले रंग से क्योंकि दुनियाँ की काली नज़र से डर लगता है मुझे और सच कहूँ तो डरता हूँ तुम्हारे नाराज़ हो जाने से तुम्हारे रूठने से ।।

तुम्हें कोई कुछ कह न दे, तुम याद हो मेरी, मेरे साथ ही चलोगी दिन भर - रात को भी, आज भी कल भी और परसों भी, अगले साल दर साल मुहब्बत हो तुम कभी लम्हों में कैद नहीं हो सकती, न आना चाहो मेरी ज़िन्दगी में कोई बात नहीं तुम्हारी मर्ज़ी पर मेरी यादों से खुद को कहाँ ले जाओगी ???

लड़ लो झगड़ लो मत बात करो मुझसे ये हक है तुम्हारा, पर मेरी यादों से कहाँ भागकर जाओगी जाओ चली जाओ जहाँ जाना है तुम्हें पंछी बन उड़ जाओ नीले अम्बर में पर उड़ कर जब थक जाओगी तब आराम करने तो मेरी यादों में ही आना होगा, ये मालूम है मुझे भी तुम्हें भी ।।

कहानियाँ अच्छी लिख लेती हो, पात्र गढ़ना तुम्हें आता है, पर कुछ सच मैं भी लिख लेता हूं। मैं भी लिख दूंगा कि इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं, उनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं, पर सच तो ये है कि इस कहानी में कोई पात्र था ही नहीं सिर्फ "मैं" था तुम थीं "गुमनाम" और थी मेरी "यादें" ......................

जो रूठी हैं मुझसे, नाराज़ हैं पर मेरे साथ हैं, हैं न ????

--

"अभिव्यक्ति"

ऋषि सचदेवा,

हरिद्वार, उत्तराखंड ।।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.