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"सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव" - डॉ0 रानू मुखर्जी


मीडिया ने समूचे विश्व को एक गाँव में तब्दील कर दिया है. भूत, वर्तमान एवं भविष्य का ज्ञान करने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हमारी सांस्कृतिक, राजनीतिक, व्यावसायिकता का निर्णय कर रहा है. युवावर्ग के लिए इसने एक ऐसी दुनिया का दरवाजा खोला है जो चकित और अभिभूत करने वाली तो है ही, साथ ही इसमें अपने भविष्य का निर्धारण और स्वयं को प्रतिष्ठित करने की संभावनाएं भी स्पष्ट है. इस क्षेत्र में रूची रखने वाले समाचार संपादक, वाचन, कैमरामैन, निर्देशन, विज्ञापन, धारावाहिक, पटकथाकार, फिल्म, ग्राफिक्स एवं संवाददाता जैसे अनेक लोभनीय क्षेत्र उनके भविष्य को संवारने की राह देख रहे हैं.

मीडिया के बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए विश्वविद्यालयों ने मीडिया को पाठ्यक्रम के रूप में स्वीकार किया है. युवाओं को मीडिया की नई-नई तकनीकों का ज्ञान अब शैक्षणिक स्तर पर मिल रहा है. दिन-प्रतिदिन हो रहे आविष्कारों ने इसके तौर तरीकों को बदला है. लेखन से लेकर संपादन एवं प्रस्तुतीकरण के रंग-ढंग में बदलाव आया है. समाज का मीडिया के प्रति आकर्षण पहले से अधिक बढ़ा है. समाचार से लेकर फिल्म, लोकगीत, धारावाहिकों को देखने के लिए बच्चे से बूढ़े तक लालायित रहते हैं.

टेलीविजन इलेक्ट्रोनिक मीडिया का दृश्य-श्रव्य माध्यम है. इस पर ध्वनि के साथ-साथ दर्शक चित्र का भी आनंद लेते हैं. इस उपकरण पर शब्दों को कम चित्रों को अधिक बोलने का मौका दिया जाता है.

टेलीविज़न पर ध्वनियों और ध्वनियों का एक साथ सम्प्रेषण ही टेलीविज़न की वास्तविक प्रक्रिया है. संगीत से नाटकीयता उत्पन्न होने के कारण रोचकता में वृद्धि होती है. इसलिए पटकथाकार को संगीत का विशेष ध्यान रखना पड़ता है.

टेलीविज़न पर शॉट के साथ उपयुक्त ध्वनि एवं संगीत प्रभावों के अलावा कैमरा मूवमेंट का और कैमेरा लोगों का भी अति विशेष स्थान रहता है.

इन सब में सृजनात्मकता का स्थान सर्वोपरि है. सृजनात्मक और मीडिया एक सिक्के के दो पहलू है. दोनों का ही आपस में अटूट सम्बन्ध है. दोनों की अस्मिता एक दूसरे से जुडी है. कविता, कहानी, नाटक, रिपोर्टिंग साक्षात्कार, विज्ञापन, अनुवादन, कमेंट्री, फीचर, यात्रा वर्णन, पुस्तक समीक्षा आदि साहित्य के सृजनात्मक पहलू हैं. जब इनका सम्बन्ध रडियो व टेलीविज़न से जुड़ जाता है तो ये इलेक्ट्रिक मीडिया की श्रेणी में आ जातें हैं. इसके पहले प्रिंट मीडिया के रूप में ही नजर आते हैं.

सृजन हमेशा मीडिया से ही अभिव्यक्त हुआ है. यदि मीडिया न होता तो मनुष्य की सृजनशक्ति आलमारी में ही कैद होती अर्थात प्रचारित और प्रसारित नहीं होती. समाज एक दूसरे की सृजनशक्ति से लाभान्वित न हो पाता.

नौटंकी पुतलीनाच, स्वांग, ढोलक आदि के माध्यम से सृजन अभिव्यक्त होता रहा और जनप्रिय होते रहे. फिर मुद्रण कला के माध्यम से पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ पुस्तक रूप में दिखने लगा. तत्पश्चात इलेक्ट्रोनिक मीडिया के कारण मनुष्य की सृजनशक्ति रेडियो और टेलीविज़न के द्वारा घर घर में देखी जाने लगी. दोनों का माध्यम अलग है. भाषा, शब्द-संरचना, प्रस्तुतीकरण एक दूसरे से भिन्न है.

कहानी कविता साहित्य सृजन की प्रमुख विधा है. जो प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया द्वारा संप्रेषित होती है. प्रिंट मीडिया में कविता को बार-बार पढ़ा जा सकता है. प्रकाशित किया जा सकता है. सत्य यह है कि कोई भी लेखन प्रिंट मीडिया में अनेक समय तक जीवित रहती है. पर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में यह संभव नहीं है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया में यह कुछ समय बाद ओझल हो जाते हैं. पाठक व श्रोता मीडिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.

मीडिया से पहले कथा-कविता, इंटरव्यू आदि मंच पर होता था. मंच के सामने श्रोता बैठते थे, पाठक श्रोता कविता कथा से प्रभावित होते थे. प्रत्येक स्तर के लिए लिखी गई कविता का श्रोतागण आनन्द उठाते थे.

समय के बदलाव के साथ-साथ रडियो और टेलीविज़न का आगमन हुआ. टेलीविज़न एक दृश्य माध्यम है, लेकिन नाटकों की तरह संवादों के सहारे इसकी कथा नहीं चलती है.

कहानी एक संवेदना है, विचार है, चरित्र है, जो किसी उद्देश्य को लेकर लिखी जाती है. देशकाल की चर्चा कहानी में रहती है. अगर हम सोचते हैं कि मीडिया के लिए कहानी अलग से लिखी जाती है तो यह गलत धारणा है जो कहानी प्रिंट मीडिया में लिखी जाती है. वही इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रस्तुत होती है पर यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहती हूँ कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया की कुछ सीमाएं हैं. जिनको ध्यान में रखकर प्रोड्यूसर कहानी का चयन करता है. मीडिया द्वारा चयन किया जाने का मतलब कहानी सर्वव्यापी होनी चाहिए. जिसका आनंद हर वर्ग के लोग उठा सके. कहानी को रोचक बनाने के लिए एक विशेष प्रकार की तकनीक का प्रयोग किया जाता है. टेलीविज़न की कहानी में दृश्यात्मकता का विशेष ध्यान रखा जाता है.

पटकथा लेखक को भाषा के अलावा मीडिया संबंधी तकनीक का भरपूर ज्ञान होना आवश्यक है. प्रत्येक प्रकार के दृश्य को फिल्माने के लिए पहले "मास्टर शाट" लेना पड़ता है. इसके बाद विषय से संबंधित शॉट लिया जाता है.

रिपोर्ताज मात्र रिपोर्ट नहीं होता है बल्कि इसमें लेखक का हृदय, अनुभूति, दूर-दृष्टि, संवेदनशील व्यक्तित्व का होना अनिवार्य है. उक्त बातों से जो व्यक्ति ओतप्रोत नहीं उसे मात्र संवाददाता कहा जा सकता हैं. घटना का मार्मिक वर्णन रिपोर्ताज है. सम्मलेन, युद्ध, बाढ, अकाल आदि रापोर्ताज के खुराक है. अच्छी रिपोर्ताज पाठक के मन में सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करती है. भावों और संवेदना के रूप में घटना चित्रात्मकता के कारण आकर्षक बन जाती है. शहर, पहाड़, झील, सम्मलेन आदि विषयों पर अच्छे रिपोर्ताज लिखे जाते हैं. जीवन के ऐतिहासिक पक्ष के अलावा सत्य को संवेदनशीलता में रूपांतरित करना ही असली रिपोर्ताज का लक्षण माना गया है. सही अर्थ में रिपोर्ताज सत्य व तथ्य पर आधारित गद्य की एक विधा है.

साक्षात्कार भी गद्य की एक नई विधा हैं. इलेक्ट्रोनिक मीडिया की एक लोक प्रिय विधा है. विषय विशेषज्ञ, साहित्यकार, कलाकार, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक आदि का साक्षात्कार प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रचुर मात्रा में मिलता हैं. साक्षात्कार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं. रेडियो व टेलीविज़न के लिए साक्षात्कार लिए जाते हैं. दो व्यक्तियों की मानसिकता इस विधा के द्वारा पढी, सूनी व देखी जा सकती है.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया समयबद्ध प्रसारण हैं इसलिए थोड़े में बहुत कुछ कह देना ही इसकी विशेषता है. विषय को समय सीमा में बांधकर प्रस्तुत करना ही इस मीडिया की दूसरी विशेषता है. नवीनतम शैली, नवीनतम जानकारी प्रदान करना ही सृजनात्मकता की विशेषता है.

इक्कीसवीं शताब्दी के पहले दशक में कम्पूटर, इन्टरनेट, मोबाइल, मीडिया, सोशल मीडिया की भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विस्तार में मन्दन्त स्थापित कर चुकें हैं. आज पूरा विश्व हिन्दी को विषय भाषा के रूप में अपना रही है उसका मुख्य कारण है यह सोशल मीडिया. हिन्दी ने अंग्रेजी को अपने साथ इस प्रकार से मिला लिया है कि इनको एक दुसरे से अलग करना असंभव है. भले ही हम मानसिक रूप से अंग्रेजी से इतना जुड़ नहीं पाएं है परन्तु लिखित भाषा में अंग्रेजी के कई शब्द हमारे सामाजिक जीवन में बड़ी गहराई से जुड़ गए हैं. यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सोशल मीडिया द्वारा हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार हुआ और हिन्दी भाषा द्वारा सोशयल मीडिया का विस्तार हुआ.

सोशल मीडिया ने साहित्य और लेखन के माध्यम से नहीं बल्कि सिनेमा में आने वाले विमर्शों को भी अपने अन्दर समेटा है. आज समाज में स्त्री की भूमिका में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है. वह घर से बाहर निकलकर अपना दायरा बढ़ा रही है. अपने अकेलेपन के लिए उसके पास भी मोबाइल है जिस पर वह जो भी चाहे कहने के लिए स्वतन्त्र है उसके साथ होने वाले अत्याचार छिप जाते थे पर अब उन्हें सोशल मीडिया सबके सामने लाती है. सोशल मीडिया नारी की सृजनशीलता में सहायक हुई है. उसकी रचनात्मकता ही नहीं बल्कि उसकी अस्मिता, अधिकारों और संघर्षों से जुड़े प्रश्नों को भी सामने लाने का प्रयास कर रहा है. अभिव्यक्ति की आजादी के कारण नारी को नए आयाम मिले.

सोशल मीडिया ने नारी को ऐसा मंच दिया जहाँ वह बेबाक, बेधड़क और निडर होकर अपनी बात रखती है. यहाँ वह अबला असहाय नहीं, कई साहित्यिक गोष्ठियों, समूहों के साथ जुड़कर समान विचारोंवाली अन्य स्त्रियों के संग जुड़ रही है. इससे सोशल मीडिया में मिलती तुरंत प्रतिक्रिया और बहस के नतीजों से इनका आत्म-विश्वास और बढ़ जाता है. इससे इनके लेखन में भी प्रगति आई है. जिससे दबे छिपे भावों, संकोच में, दम घोटती इच्छाओं और मरे सहमे अहसासों को भी जैसे नया आकाश और नया वितान मिला है.

युवा वर्ग भी दोस्ती, यारी, भाव, विचार, सहमति, असहमति, नाराजगी, गेमिंग, गाली-गलौज सब अपनी भाषा परिभाषा गढ़ रहें हैं. सोशल मीडिया के माध्यम से ही वह जन आन्दोलन को उकसाता है. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर भी वह देश-दुनिया की चिंता करता हुआ न केवल अपनी सोच अपनी राय बनाता बदलता चलता है, बल्कि वह दूसरे युवा साथियों को भी अपनी आवाज बुलंद रखने, अपनी जिम्मेदारी को समझने, निभाने और दूसरे समुदायों से जुड़ने, संवाद कायम करने के लिए भी प्रभावी भूमिका निभाता है.

कभी कभी इसका प्रभाव नकारात्मक भी होता है. जैसे खेलकूद, दोस्तों से मिलना मिलाना, आपस में घर में बातचीत करना आदि लोगों से छूटती जा रही है. भड़काऊ या अश्लील सामग्री का बड़े पैमाने पर उपयोग अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रभावित कर रहें हैं. समय की बर्बादी के कारण लोगों में तनाव, अवसाद, चिडचिडापन और मानसिक उलझन नजर आ रहे हैं. आजकल लोग आमने-सामने मुलाकात की जगह वर्चुअल संवाद अधिक पसंद कर रहें हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वजह से ढांचे को तोड़ती किताब "पतनशील पत्नियों के नोट्स" अपनी तरह की महत्वपूर्ण किताब हैं जो भाषा और मुद्दे को लेकर चर्चित हुई. स्त्री विमर्श के दायरे में लिखी यह किताब अपने कहन और लिखन की वजह से विशिष्ट शैली बनाती हैं. "पतनशील पत्नियों स्त्रियों के नोट्स" में उभरा असमंजस महिला विमर्श को थोडा हटकर और नए सिरे से उठाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है. नए सिरे से कहने का मतलब है उस विमर्श में एक और मजबूत पहलू को जोड़ना है. मजबूत पहलू है पत्नी. पत्नी यानी कि एक ऐसी महिला जो समाज, परिवार, रिश्ते-नाते, सगे-सम्बन्धियों के बीच सांस लेती है. हर पल उनके साथ रहती है. हर परिस्थिति का डटकर सामना करती है. तमाम ऊँच-नीच के बावजूद एक दायरे में रहती है. चाहे जिसने भी वह दायरा बनाया हो पर पत्नी हमेशा अपना दायरा जानती है और लेखिका नीलिमा चौहान असमंजस के उस दायरे में रहकर पतियों से, परिवारों से, समाज से और देश से सवाल पूछती है. बढ़ती उम्र के साथ-साथ होने वाले तमाम शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों की गवाह पत्नियों से जुड़े सवाल (नया ज्ञानोदय, उत्सव अंक, ‘स्त्री का स्वर’ अक्टूबर 2017).

सोशल मीडिया ने प्रवासी भारतियों को भी बहुत व्यापक और द्रुतगामी प्लेटफार्म दिया है. अपने भाव विचारों के आदान-प्रदान में इस नई तकनीक ने न केवल भारतीय लेखकों व साहित्यकारों की दूरदराज के ग्रामीण इलाकों के रचनाकारों बल्कि इन्टरनेट की सहायता से विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय लेखकों, दूर दराज के ग्रामीण इलाकों के रचनाकारों बल्कि इन्टरनेट की सहायता से विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय लेखकों व साहित्यकारों की रचनाओं को भी प्रचुर मात्र में जन जन तक पहुँचाने का काम किया. ब्लागिंग – इन्टरनेट – नेटवर्किंग – ट्विटर – फेसबुक आदि के जरिए नित नई पुस्तकों, कविता, कहानी, संस्मरण आदि के नव प्रकाशित संकलनों की न केवल जानकारी मिल रही है बल्कि यह सोशल मीडिया पुस्तकों की सूची के साथ-साथ नई पुस्तकों की पीडी एफ तक उपलब्ध करा रहा है. प्रवासी साहित्य का प्रचार-प्रसार तो इसी सोशल मीडिया के माध्यम से ही संभव हो रहा है. कहने में कोई हिचक नहीं कि सोशल मीडिया ने समाज और संस्कृति के हित में नए आन्दोलन खड़े किए हैं. सही अर्थों में कहा जाय तो सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वालों का एक बड़ा गुट अभी तक संवेदनशील नहीं है. उसे इस बात का ख्याल तक नहीं है कि वह जो काम कर रहा है उससे देश का और समाज का कितना नुकसान भी हो सकता है या हो रहा है. इसका प्रमाण उत्तर प्रदेश के लखीमपुर - खीरी जनपद मुख्यालय पर 1 मार्च 2017 को घटी घटना में बारहवीं के एक छात्र ने अपने दो दोस्तों की मदद से एक वीडियो बनाकर व्हाट्सएप पर डाल दिया जिसमें कुछ आपत्तिजनक बातें थी. वीडियो वायरल होते ही उस शांत संतोष से रहनेवाले लखीमपुर-खीरी शहर में तनाव फ़ैल गया. हिंसक घटनाएँ भी घटी. पर परिस्थिति और भयानक होने से पहले ही आरोपी पकड़ लिया गया. कहने की जरूरत इसलिए पडी कि क्या आरोपी को केवल पौने दो मिनट की इस विडियो की भयावहता का अंदाजा था? अगर उसे इस भयावहता का ज्ञान होता तो वह इस कार्य को करने के पहले जरूर सोचता. सोशल मीडिया की शक्ति और दुर्बलता यह है इसमें बात दावानल की तरह फैलती है और सबसे अधिक इसका प्रयोग पत्रकार लोग करते हैं. अधिकतर वे सुनी सुनाई बातों को शेयर करते हैं. उन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. उन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं. फिर उस पर दूसरे अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. यह कभी कभी सकारात्मक होता है और कभी नकारात्मक भी. 2015 में भोपाल में भूकंप आया तो जनता में सोशल मीडिया के कारण डर फ़ैल गया. अजीब तरह की भविष्य वाणियों के कारण जनता भयग्रस्त हो गई और वैज्ञानिक अवाक्. इससे अधिक नकारात्मकता सोशल मीडिया की और क्या हो सकती है?

शुरुआती दौर में सोशल मीडिया पर आम आदमी सक्रिय थे. इनका राजनैतिक दलों, सरकारों और मीडिया से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं था. इस नए माध्यम में वे अपने बारे में लिखते थे. परिवेश से जुडी जानकारी को लिख रहे थे. एक दूसरे से शेयर कर रहे थे. नए दोस्त बना रहे थे. पुराने मित्रों परिवारजनों को तलाश रहे थे. परन्तु कुछ समय पश्चात अन्य दल इसका इस्तेमाल करने लगे. अफवाहें फैलने लगी. सिक्के के दो पहलू की तरह इसके भी दो पहलू हैं.

इसकी सकारात्मकता की बात करें तो वह भी कम नहीं है. लाखों लोग, पत्रकार सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखा रहें हैं. पैसा कमा रहें है. विडियो बना रहें हैं जिन्हें लाखों करोड़ों लोग देख रहें हैं. मीडिया ने दिल्ली के निर्भय मामले में महिलाओं के प्रति लगातार बढ़ती हिंसा के खिलाफ एक जबरदस्त प्रतिक्रिया पैदा की. जिससे निर्भय कांड एक मजबूत आन्दोलन की शकल ले लेता है. जिसके पीछे सोशल मीडिया की अहम् भूमिका रही. घटना के बाद लगातार फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग पर प्रतिरोध की इस आवाज को अत्यधिक समर्थन मिला. एक दूसरे को जोड़ते हुए बड़ी संख्या में महिलाऐं व लड़कियां सड़क पर उतरी. जिसमें सोशल मीडिया पर खुलकर लिखने की महत भूमिका रही. पूरी घटना खुलकर सामने आई. जिससे इस मामले पर पूरे देश का समर्थन मिलने लगा और इसकी परिणति एक सशक्त आन्दोलन में होती है.

मीडिया का कोई भी स्वरूप हो उसकी भूमिका समाज में म्ह्त्वपूर्ण होती है. जहाँ तक वह शब्दों का वास्तविक प्रयोग कर लेखकों और पाठकों के बीच अभिव्यक्ति की गरिमा को बनाए रखे. सोशल मीडिया की जिम्मेदारी तो और बड़ी है क्योंकि उसमें प्रयोग होने वाली भाषा एक साथ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचती है. सोशल मीडिया के माध्यम से व्यक्ति उनसे भी संवाद करता है. जिन्हें वह नहीं जानता है. वह अपनी भाषा द्वारा ही सामने वाले पर अपना प्रभाव स्थापित करता है.

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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