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कहानी - काठ सा रिश्ता - लव कान्त सिंह ‘लव’

काठ सा रिश्ता 

सर्दी पूरी तरह जा चुकी थी लेकिन गर्मी अभी अपनी जवानी में नहीं था, आम में मंजर पड़ने लगे थे,कोयल के कूकने का मौसम आ चुका था। पूरे फिजा में एक चंचलता सी थी मानो कोई नव युवती अभी अभी नींद से जागी हो। खेतों में चारों तरफ रबी की फसल तैयार होकर स्वर्णिम छटा बिखेर रही थी। गांव के इस मननमोहक वातावरण में वो शांति थी जिसकी तलाश में लोग जगह-जगह फिरते हैं। इन्हीं कल्पनाओं में खोया हुआ था तभी दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ लगाई। मैंने बाहर निकल कर देखा वो हमारे पड़ोस में रहने वाले कमालूदिन थे। उनकी ‘‘मलकाइन-मलकाइन” की आवाज़ सुनकर मेरी मां हाथों में 4-5 रोटी और एक बर्तन में सब्जी लिए आई। मां को देखते ही उनके चेहरे पर आशा की रौशनी फैल गई। झुकी हुई नज़रों और शरीर के भाव से धन्यवाद कहते हुए उसने रोटी ले ली और पेड़ की छांव में बैठकर खाने लगा।

आज लाठी के सहारे चलने वाले कमाल को देखकर ऐसा लगता थ जैसे यह बचपन से ही बूढ़ा रहा हो। हद से ज्यादा दुबला-पतला शरीर, पेट पीठ से चिपका हुआ। चार बेटे और दो बेटियों का यह बाप पेशे से धूनिया था। कलकत्ता में रजाई बनाने की दूकान थी। लेकिन वो चार बेटे आज कहाँ हैं, यह पूछने पर कमाल अपने आंसू रोकने की नाकामयाब कोशिश के बाद कहते हैं- ‘बबुआ जी, चारों का निकाह हो गया, चारो अपने-अपने परिवार के साथ अलग हो गए। बड़ी मिन्नतें करने के बाद छोटे बेटे ने अपने साथ रखा है।

कमालूदीन अपने खाट पर बैठे खांस रहे थे। खांसी इतनी तेज हो गई कि सांस फुल गई, चेहरा लाल हो गया। उनकी बहू कपड़े सूखा रही थी। उसने कई बार देखा भी लेकिन पास आकर मदद करने की जहमत भला कौन उठाता लिहाज़ा कमाल खाट पर पसर गए। थोड़ी देर बाद खांसी का आघात रूका तो उनकी आंखों की कगार से अश्रुधार दोनों ओर लुढ़क गए। लेकिन वह भी उस निष्ठुर महिला को पिघलाने में सफल न हुए।

दोपहर बीत चुका था, कमाल भूख से तड़प रहे थे। जब रहा नहीं गया तब उन्होंने बहू को आवाज़़ लगाई - ‘‘बहू भूख लग रही है कुछ खाने को हो तो ले आओ।“ कड़कस सी आवाज़़ में बहू का जवाब आया - ‘‘मुझे ही खा जाओ, अभी कुछ बना नहीं है। बच्चों की तरह सुबह-सुबह चिल्लाने लगते हैं। हुक्म तो ऐसे चलाते हैं जैसे इन्हीं की कमाई पर घर चलता हो।“ इतना कह कर वो भुनभुनाती हुई अपने कमरे में चली गई। बेचारे कमाल रूधे हुए गले और नम आंखों के साथ अपने खाट पर लौट आए। जब इन्सान दुखी होता है तो उसका मन अक्सर उस दर्द को कम करने के लिए पुराने खुशनुमा लम्हों में चला ही जाता है। कमाल भी अपने पुराने दिनों में चले गए। ईद का दिन था, चारों बच्चे नए-नए कपड़ों पर इतराते बाप की उंगली थामे ईदगाह जा रहे थे। 5 साल के छोटे बेटे ने दुलाऱ से ओठ बिचकाते हुए कहा- ‘‘अब्बू गोदी”, कमाल ने झट से उसे गोदी उठा लिया। बेचारा छोटा बच्चा पैदल चलकर पैर दर्द होने लगे होंगे। वापस लौटते समय पांचों रिक्शे में लद कर आए। बच्चों के हाथों में तरह-तरह के खिलौने थे। त्योहार के उमंग में धमा-चौकड़ी दोगुनी हो रही थी। शाम तक उन लोगों ने नए कपडे नहीं उतारे और खेलते रहे,जब लौट कर वापस आए तो कई खिलौनों के बारे में अंदाजा़ लगाना भी मुश्किल हो रहा था कि यह भी कभी नए रहे होंगे। त्योहार में घर आए कमाल अगले दिन ही कलकत्ता जाने को तैयार थे। लेकिन छोटा बेटा उनकी गोदी से उतरने को तैयार न था। वो भी साथ जाने की जिद किए बैठा था। बड़ी मशक्कत के बाद किसी तरह बहला-फुसलाकर उसे मनाया गया और जब उसे पता चला कि अब्बा जा चुके हैं तो घण्टों तक सर पटक-पटक कर रोता रहा था। इन बातों को सोचकर कमाल के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ ही रही थी कि उनकी बहू ने थाली पटकने के अंदाज़ में खाना देते हुए कहा-‘‘इ लो, ठूस लो”। कमाल के लिए खाने में कोई स्वाद नहीं रह गया था लेकिन जीने के लिए खाना भी तो है। हालांकि कमाल को जीने की चाह बाकी नहीं थी लेकिन ऊपरवाला भी न जाने कान में रूई डाले कहां बैठा था। दिन भर पीपल के पेड़ के नीचे खाट पर बैठा बेचारा न जाने क्या-क्या सोचता रहता था। उसके सात पोते थे जिनमें से छः अपने-अपने अब्बू के साथ ही कलकत्ता में काम करते थे। अपने जिस बेटे के साथ कमाल रहते थे उसी का बेटा यानी कि सबसे छोटा पोता खालिद दादा से बहुत लगाव रखता था। स्कूल से आते ही बस्ता फेंक कर दादा के पास भाग जाता, वहीं पीपल की ठंढ़ी-ठंढ़ी छांव में दोनों दादा-पोता बैठकर न जाने क्या बातें करते रहते।

मैं भी छुट्टियों में गांव आया हुआ था। जब दूसरे दिन भी मालकिन की आवाज़़ सुनते ही मां को रोटी-सब्जी लेकर जाते देखा तो मैंने पूछ लिया कि मां ये कमाल हमारे घर से मांग कर क्यों खाते हैं जबकि इसका तो अपना घर-परिवार है। मां ने बताया - बेटा गरीब की मदद करनी चाहिए, बेचारा किस्मत का मारा है। इनकी बहू इन्हें ठीक से खाना नहीं देती है, कई बार तो इनकी पिटाई भी कर चुकी है। इतना बोलते-बालते मां का गला रूंध गया। बेचारे जब भूख से बिलखने लगते हैं तो मांग कर खाते हैं। फिर न जाने क्यूं मेरे मन में भी कमाल के प्रति सहानुभूति और उनकी बहू के प्रति घृणा का भाव सिर उठाने लगा। उसी वक्त से मेरा कमाल मियां के साथ कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया। उनको आता देख मैं पहले ही मां को बता देता था कि कमाल मियां आ रहे हैं। पता नहीं क्यूं बच्चे से लेकर बूढ़े तक सब उन्हें कमाल मियां ही कहा करते थे। मेरे बताने पर मां खाना ले आती थी और कमाल मियां उसे ले जाकर पेड़ के छांव में खा लिया करते। कभी-कभी कमाल मियां खाना खाने के बाद मुझे कलकत्ता की कहानियां भी सुनाया करते थे। दो तल्ले की बस, हाथ रिक्शा, रेलवे स्टेशन, हावड़ा का पूल, विक्टोरिया और न जाने क्या-क्या। एक बार कई दिन बीत गए लेकिन कमाल मियां हमारे घर खाना खाने नहीं आए। कई दिनों तक मैं उनका इंतेज़ार करता रहा और जब भी कभी दरवाज़े की तरफ कोई आहट होती तो मैं भाग कर जाता लेकिन उनको न पाकर चिंतित भी होता। मन में अजीब-अजीब ख्याल भी आते, डर लगता कि कहीं उस बेचारे को कुछ हो तो नहीं गया। बाद में पता चला कि उनकी बहू को पता चल गया था कि कमाल मियां मेरे घर से खाना खाते हैं तो उसने उनकी पिटाई भी की थी और आईंदा मेरे वहां न जाने की धमकी भी दी गई थी। सुनकर गुस्सा तो ऐसे आया कि अभी जाकर दो-चार थप्पड़ लगाउं चुडैल को, लेकिन मां ने बताया कि वो ऐसे ही करती है लेकिन बेचारे कमाल की मजबूरी है सो उसके साथ रहते हैं, सारे बेटों ने अपने साथ रखने से मना कर दिया तब छोटे बेटे ने रखा है।

अब मेरी छुट्टियां खत्म हो गई थी, मैं अपने पिताजी के साथ शहर जाने के लिए निकला। जैसे ही हमारी गाड़ी उस पीपल के पेड़ के पास से गुजरी, किसी ने आवाज़ लगाई। रूककर देखा तो कमाल मियां थे। उनके हाथ में एक नया तकिया था। उनके चेहरे पर खुशी मिश्रित चमक थी, मुझे देखकर बोले - ‘बबूआ जी यह तकिया मैंने आपके लिए बनाया है, कलकत्ते वाली रूई है इसमें, मखमल जैसी। बहुत आरामदायक भी है, सिर रखते ही नींद आ जाएगी।’ पिताजी ने मना करना चाहा भी लेकिन कमाल मियां भी कमाल के थे। लगे कहने - ‘क्यों, हम बबूआ जी के दादा समान नहीं हैं? क्या हम इनको एक छोटी सी चीज भी नहीं दे सकते क्या?’ डबडबाई आंखों से उन्होंने कहा कि ‘मेरे सारे बेटे नालायक निकल गए और अल्लाहताला भी न जाने मुझे और कितना सज़ा देना चाहता है, बबूआ जी मेरी जितनी इज्ज़त देते हैं उतनी तो आज तक मेरे अपने बेटों ने भी नहीं दिया। यही सोचकर मैंने यह तकिया बनाया था कि जाने वक्त दे देंगे पता नहीं फिर मुलाकात हो न हो’ और इतना कहते ही मोती उनके आंखों से बाहर आने लगे। जल्दी- जल्दी उन मोतियों को समेटते हुए उन्होंने तकिया मेरी ओर बढ़ाया लेकिन इस बार पिताजी भी कुछ कह न पाए और वो तकिया मेरे हाथों में आ गया। पिताजी ने सौ के दो नोट निकाले लेकिन कमाल मियां के बनावटी गुस्से को देखते हए वापस जेब में रखना पड़ा। फिर कमाल मियां को उसी पीपल के पेड़ के नीचे छोड़कर हमारी गाड़ी तेजी से शहर की तरफ भागती चली गई।

समय बीतता गया, अगली छुट्टी में घर वापस आते हुए मन ही मन सोच रहा था कि यह जो चेकदार लूंगी खरीदी है मैंने पता नहीं वो कमाल मियां को पसन्द आएगा या नहीं या कहीं उसकी बहू को पता चला कि यह लूंगी मैंने उन्हें दी है तो फिर कहीं उन्हें परेशान न करे लेकिन अगर इस बार उसने कमाल मियां पर हाथ उठाया तो उसको सबक सीखाए बिना छोड़ूंगा नहीं। ख्यालों के उलझन में कब गांव आ गया पता ही नहीं चला। गांव में घुसते ही मैंने देखा कि वो पीपल का पेड़ सूख गया है। मुझे चिन्ता होने लगी कि- बेचारे कमाल मियां पता नहीं अब किस पेड़ के नीचे अपनी खाट डालते होंगे। मन में अजीबो-गरीब सवाल आ रहे थे- यह पीपल का पेड़ क्यों सुख गया? इसपर रहने वाले सारे पक्षी अब कहां चले गए होंगे? इन्हीं सवालों को चीरता हुआ मैं अपने घर पहुंचा।

कई दिनों तक कमाल मियां दिखाई नहीं दिए, मैंने सोचा हो सकता है उनकी बहू अब भी उनपर शासन रखती हो। तभी बाहर से किसी की आवाज़ आई, आवाज़ सुनते ही मैंने मां से कहा कि- मां खाना ले आओ कमाल मियां आ गए। बाहर आकर पता चला कि वो कोई और था और पिताजी से मिलने आया था। मेरी बात सुनकर आश्चर्य से मेरी मां भी भागती हुई बाहर आईं, यहां-वहां देखा और मेरा हाथ पकड़ के घर में ले गई। कारण पुछने पर उन्होंने बताया कि कमाल मियां को गुज़रे 8 महीने हो गए और उसके बाद ही वो पीपल का पेड़ भी सूख गया। लोग कहते हैं कि उस बेचारे के सुख-दुख का साथी तो वही पीपर था। इसीलिए वो भी सुख गया। मेरे मन में आया कि लोग कहते हैं कि काठ में भाव नहीं होता लेकिन यहां तो पेड़-पौधे, पशु-पक्षी हम से कितने अच्छे हैं जो इन्सान की भवनाओं को भी समझ जाते हैं, जबकि कई इन्सान भीतर से काठ के काठ ही रह जाते हैं।

- लव कान्त सिंह ‘लव’

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