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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 330 // भूत - काल // डॉ. नीना छिब्बर

प्रविष्टि क्रमांक - 330

डॉ. नीना छिब्बर

भूत  - काल
समय के घर में वर्तमान, भूत एवं भविष्य काल बैठकर अपनी अपनी महता पर बातें कर रहे थे। सब से पहले वर्तमान बोला ," सुन लो दोनों, मनुष्यों की दुनिया में मेरा ही महत्व है।
जो मानव मुझे सर्वोपरि मान कर चलता है वह सदा खुश रहता है। बस आज में जिओ, मस्त रहो, कुछ मिले तो ठीक नहीं तो येन केन प्रकरेण पाओ। ना बीते कल की सोचो ना आने वाले कल की सोच। जो है आज ही है,वर्तमान है।


उसकी बात सुन कर भविष्य ने टेढा मुँह बनाया और बोला ,वाह रे मूर्ख, किस गल्तफहमी में जी रहा है। अरे,सब मेरी यानी भविष्य की चिंता करते हैं। आगे क्या होगा ,इसी चिंता में तेरे(वर्तमान) सुख को भी भोग नहीं पाते हैं ।मेरे लिए तो सभी आयु वर्ग के लोग भागते रहते हैं। कुछ कम अक्ल भविष्य केलिए वर्तमान को भी नष्ट कर देते हैं।


दोनों की बातें सुनकर भूतकाल ने ठहाका लगाया।उसके इस व्यवहार से क्षुब्ध वर्तमान और भविष्य ने डाँटा। हँसने की ऐसी कौन-सी बात कर दी हमने। तब भूतकाल बोला मैं हँसा आप दोनों की मूर्खता ,नासमझी और अज्ञान पर। तुम दोनों किस लोक में रहते हो। मानव चाहे भविष्य में रहे या वर्तमान में उस का अंतर्मन तो भूतकाल से चिपक कर प्रसन्न रहता है। दोनों ने एकसाथ कहा ,झूठ ,कोरी कल्पना सिद्ध कर सकते हो क्या?
        .क्यों नहीं अभी लो। मानव तो बालपन से लेकर वृद्धावस्था तक भूतकाल को गीले कंबल की तरह ओढ़ कर खुश रहता है। युवावस्था में बचपन के सुख दुख, प्रौढावस्था में युवावस्था के पाने खोने का हिसाब,सबसे अधिक वृद्धावस्था में, तब तो उठते बैठते,सोते जागते, खाते पीते, हँसते रोते, भूतकाल की गोद में ही जीता है। समझ लो मानव अनेकानेक घटनाएं,रिश्ते, भावानुभूतियों को याद कर के वर्तमान के सुख और भविष्य के
आनंद को खुद के हाथों नष्ट करता है।


उसकी बातों को सुनकर वर्तमान और भविष्य दोनों सोच में पड़ गए। सच है और प्राणियों का तो पता नहीं पर विशेष कर मनुष्य तो भूतकाल के हिंडोले में झूलना पसंद करता है।
वर्तमान को सुधारने के लिए भी भूतकाल(पैतृक अवलंबन)की आवश्यकता और भविष्य के लिये भी बीता हुआ(ज्ञान, मान , धन)। अब भूतकाल बोला , देखो मेरा नाम तो भूत है पर मैं मरकर प्रेत वाला भूत नहीं। ना ही मेरे पैर उल्टे हैं ना ही मैं जमीन से दो कदम ऊपर चलता हूँ पर मैं प्रत्येक मनुष्य के भीतर तक हूँ समझे ।।
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डा नीना छिब्बर
चौपासनी हाउसिंग बोर्ड
जोधपुर
342008

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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