370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 331 से 333// सारिका भूषण


प्रविष्टि क्रमांक - 331


सारिका भूषण

ढिबरी

-----------

पिछले पाँच घंटों से बिजली का अता - पता नहीं था । मालती की आँखें ढिबरी की लौ पर टिकी थीं । दिल की सारी बातें , गिले शिकवे उस ढिबरी की धीमी लौ को तेज़ कर रहे थे । महीने भर से जो आँखें गिलाफ़ को नम करती आई थीं अब सख़्त हो चली थीं ।

दिल के अंधेरों को रौशन करने की कोशिश और थकान भरी शरीर में पलकें कब बंद हो जाती थी पता ही नहीं चलता । अचानक दरवाज़े की कुंडी लगाने की आवाज़ से मालती चौंक उठी । मालती ने ढिबरी की ओर देखा । अभी तेल आधा से ज़्यादा बचा था । रतन को कमरे के अंदर आते देख मालती सहम उठी ।

" आज ....अभी ...रतन कमरे में कैसे ? ...." मालती का दिल तेजी से धड़कने लगा ।

" जिस पति ने सुहागरात से ही अपनी पत्नी को एक नज़र भर नहीं देखा हो और न ही कभी कुछ बातें की हो ....वह आज अचानक इतनी जल्दी कमरे में ......मेरे पास ......" मालती कुछ भी सोचने - समझने की हालत में नहीं थी ।

" यह मैंने पिछले साल की फसल बिक्री के पैसे बचाकर ख़रीदे थे अपनी पहली लुगाई के लिए .......मगर अफ़सोस दे न पाया ....... निमोनिया ने उसे ............ । " बोलते बोलते रतन की आंखें भर आईं ।

" मगर आज इस घर की बहुरिया को देने की हिम्मत जुटा रहा हूँ , जिसने एक महीने में ही पूरा घर बार संभाल लिया है ........और शायद मुझे भी । " रतन ने खाट 8पर बैठते ही मालती की हाथ में काले मोतियों और सोने की लटकन वाला मंगलसूत्र देते हुए बोला ।

मालती इस स्पर्श और स्नेह से मोम की तरह पिघल गई ।

" ढिबरी धीमी कर दूं ? " रतन मालती की आँखों में अपने प्यार के लिए स्थान ढूंढ रहा था । मालती ने धीरे से ढिबरी की ओर देखा , जिसकी लौ की रौशनी अब तीखी लग रही थी ।

--

प्रविष्टि क्रमांक - 332

सारिका भूषण

वाट - अ - रिलीफ़

----------------------

" अब बोलो भी कौन वाला शूट पहनूँ ? रॉयल गोल्ड या रॉयल सिल्वर वाला ? " जिमखाना क्लब की पार्टी में जाने के लिए संदीप ने डियो लगाते हुए निशा से पूछा ।

" इतनी तैयारी तो शायद शादी में भी नहीं किए होगे । जो मन वही पहनो । मगर इस बार मुझे क्यों ले जा रहे हो ? मुझे अच्छा नहीं लगता यह सब । " निशा एक बार फिर से अपने नहीं जाने की इच्छा बताई ।

" अरे बाबा ! हर बार लोग फैमिली पूछते हैं । एक बार तो चलो । देखो तो कैसी होती हैं हाई क्लास पार्टियां ? " संदीप इस बार कुछ नहीं सुनना चाह रहा था ।

दो घंटे की तैयारी के बाद पार्टी में

दोनों पहुंच चुके थे ।

" मेरा तो दम घुटता है । इन हाय - हलो , चमक - धमक और सबके कटे- छटे कपड़े और रंगीन ग्लास देखकर ! कहाँ फंस गई ....मेरे लिए किचेन और किताबें ही ठीक हैं । " निशा बनावटी मुस्कान देते - देते थक गई थी ।

" निशा , मीट मिसेज़ लोहिया हमारी गोल्फ क्लब की प्रेसिडेंट और मोस्ट डायनामिक लेडी ! " संदीप ने बड़े जोश से किसी मॉडल जैसी दिखने वाली महिला से मिलाया ।

" नमस्कार । आपने कुछ खाया ? " शायद निशा की साड़ी देखकर मिसेज़ लोहिया ने अपनी शालीनता दिखाई ।

" कम ऑन डियर ! चाँद निकलने वाला है । चलो देखकर फिर पार्टी एन्जॉय करते हैं । " कुछ मॉडल जैसी दिखने वाली महिलाओं ने मिसेज़ लोहिया के पास आकर बोला ।

" अरे ! ये लोग पूजा भी करती हैं । अच्छा आज किसी चौथ की पूजा है शायद । " निशा के लिए ऐसा माहौल बिल्कुल नया था ।

सभी सुंदरियों ने चाँद देखा और अपने - अपने ग्लास रंगीन कर चियर्स करते हुए अपना उपवास तोड़ा और मिसेज़ लोहिया ने कहा " वाट अ रिलीफ़ ! "

अब निशा भी अपनी बोरिंग दुनिया में लौटने को बेचैन थी और शायद यही बोलने के लिए " वाट - अ - रिलीफ़ !! "

--

प्रविष्टि क्रमांक - 333

सारिका भूषण

चार आना रिक्शा भाड़ा

-------------------------------

जाड़े की धूप में पूरा शर्मा परिवार अपने घर की बालकनी में बैठा था । छुट्टियों में बेटी मायके आईं थी और साथ में उसके ससुराल वाले भी थे ।

" भई समधी साहब कल आपकी पचासवीं सालगिरह की पार्टी में बहुत मज़ा आया । लेकिन उससे भी ज़्यादा आनंद इस धूप में आ रहा है । हमारे यहाँ दिल्ली में तो ठंढ बढ़ते ही सूरज छिप जाता है , और प्रदूषण बढ़ जाता है वो अलग । "

" भाई साब आपकी दोनों बहुएं भी बहुत प्यारी हैं । आप खुशकिस्मत हैं । अरे हां , आज तो दोनों अपने मायके भी जा रही हैं न । " बेटी की सास ने शर्मा साहब को देखकर बोला ।

" जी हाँ समधन जी ! मैं सचमुच खुद को बहुत खुशकिस्मत मानता हूं । बच्चों की छुट्टियां शुरू होते ही नीरा अपनी बहुओं को मायके जाने के लिए खुद ही बोलती है । आख़िर उनके मायके में भी तो इंतज़ार रहता होगा । " शर्मा साहब ने अपनी पत्नी नीरा की तरफ़ इशारा करते हुए बोला ।

एक प्यारी सी हँसी सबके चेहरे पर बिखर जाती है । मगर मिसेज़ नीरा को गंभीर देखकर समधी साहब को नहीं रहा गया " नीरा जी , आपका मायका कहाँ है ? कभी आपने बताया नहीं । लगता है भाईसाहब किसी को वहाँ नहीं ले जाना चाहते । "

अचानक खिलखिलाते हुए शर्मा जी बिल्कुल शांत हो गए ।

" चार आना रिक्शा भाड़ा ! " नीरा देवी ने गंभीर आवाज़ में बोला । " मेरे मायके और ससुराल में बस इतनी ही दूरी थी । मगर भाइयों ने सिर्फ़ मेरे हाथ पीले करने तक ही अपनी ज़िम्मेदारी समझी । उसके बाद मैं मायके नहीं जानती........ । " बोलते - बोलते मिसेज़ शर्मा का गला रुंध गया ।

" अच्छा माफ कीजिएगा । मैं जरा अपनी बहुओं की पैकिंग देख कर आती हूँ । कहीं मिठाई के डब्बे छूट न जाए । " नीरा देवी ने अपने पल्लू से आंखों की कोर को पोंछा और मुस्कुराते हुए अंदर चली गई ।

--

सारिका भूषण

C / 258 , रोड - 1 C

अशोक नगर

रांची - 834002

झारखंड

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 1307931015777815043

एक टिप्पणी भेजें

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव