नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

अंजू निगम की 2 लघुकथाएँ

अशेष

नीमा नीम अंधेरे भाई के बिस्तर की ओर बढ़ आयी। भाई की उठती-गिरती साँसे देख उसने दीर्घ निश्वास छोड़ी। रोज जब सूरज दिन की पीठ पर चढ़ता, नीमा का मन एक और दिन के उजास से भर जाता।

भाई की लाइलाज बीमारी का सच हम तीनों के चेहरे पर चिपक गया था। शायद भाई के चेहरे पर भी। जब-तब वे नीमा का हाथ कस कर पकड़ लेते, मानो मौत की आहट उनके कानों में बस गयी हो। वे छटपटाते, अपने साथ बने रहने का करूण आग्रह करते। नीमा आँख चुराती और आँखों तक लटक आये आँसुओं को जबरन जब्त करती।

माँ के पास आसुँओं का तो सहारा था पर बाबा तो खाली हाथ, खाली आँखें लिये शून्य में घंटों तकते। भाई के पास जब आते तब हमेशा एक मजबूत संबल बने भाई को हौसला देते। अंदर से उनका शरीर कितना खोखला था, ये सच तो केवल नीमा जानती थी। माँ बावली सी हर मंदिर-मस्जिद में माथा टेक आयी थी। खाने-कपड़ों का होश नहीं होता था। नीमा माँ बन दो निवाले उनके मुँह ठेल देती।

भाई के साथ हम तीनों भी उतना-उतना ही मर रहे थे। पहले रिश्तेदारों का जमघट लगा रहता। नीमा झींकती, "इनकी तीमारदारी कँरू या भाई के पास बनी रहूँ!!

जब भाई का दर्द असहनीय हो जाता तब नीमा की समझ मूक हो जाती। दोनों हाथ कस कर आपस में पकड़ मरोड़ती, देखूं तो मैं भी, दर्द कितना असहनीय होता है।

उस रोज भाई को थोड़ा सहज देखा। मुँह दमक से भरा था। वो दमक नीमा-बाबा दोनों की आँखों में उम्मीद पकड़ा गये। उस रोज भाई ने घर के खाने की इच्छा जतायी थी।

"माँ जाने किस दर बैठी भाई का जीवन माँग रही होगी, सोच नीमा ने माँ के हाथ जैसा ही खाना बनाया। भाई की जैसे बरसो की साध पूरी हो गई हो, ऐसे तृप्त हो उसने खाना खाया।

उस रात नीमा जाने कितनी रातों की नींद ले सोयी हो। भोर नीमा को लगा जैसे भाई बुला रहा हो। वो दौड़ती भाई के कमरे में गई। भाई के चेहरे पर अगाध शांति थी। उसका चेहरा सौम्य था, मानो गहरी नींद में हो।

नीमा एकटक भाई का चेहरा देखती रही। आज भाई की उठती-गिरती सांसो को उसने देखना ही नहीं चाहा। सुई से बींधी कलाई में कोई जीवन नहीं था। रात के जाने किस पहर भाई ने विदा ली।

बाबा ने आ जब नीमा के सिर पर हाथ फेरा, तब नीमा ने यही कहा, "बाबा, भाई चला गया"!!आँख से एक कतरा आँसू का नहीं उतरा।

भाई को जाना था, इस सच से तो तीनों लड़े, पर उसका जाना अभी मन में नहीं उतर पाया था।

आज भाई को गये पूरा महीना हो गया है। पर आज भी भाई हर जगह हमारे साथ बने है। शरीर से न सही मन में ही।

----

तीरे-नजर

बहुत दिनों से सब पीछे पड़े थे, बेटे का इतने बढ़िया कॉलेज में एडमिशन हो गया। एक पार्टी तो बनती हैं। मैंने भी सोचा आते रविवार को सबकी ये शिकायत दूर कर ही दूँ।

मैंने और बाई ने मिल कर मोर्चा संभाल लिया। पर काम था कि सुलट ही नहीं रहा था। तभी मेरी दोस्त सुरभि आ गई।

  "चलो, कुछ मदद मिल जायेगी। " मैंने सोचा।

  "शाम को कुछ खास दिखना चाहिए न। शाम का खाना तो बनाना नहीं मुझे तो सोचा क्यों न पार्लर ही हो आँऊ। " बड़ी अदा से कह, बन चुके खाने को थोड़ा-थोड़ा चुगती फिर बोली, " तुम भी चली चलती पर तुम्हें तो बड़ा काम होगा न!!!" भई, तुम्हारे हाथ की पुदीने की चटनी का तो जवाब नहीं। वो भी बना ही लेना, " कह वो दरवाजे के बाहर निकल गयी।

मेरे मन में थोड़ी उथल-पुथल रही फिर मैं शाम की तैयारी में जुट गयी।

सबको ८.३० का वक्त दिया था पर सुरभि ८.०० बजे मेरे घर थी। सब तो बन चुका था बस सलाद बाकी थी। सो, वो ८.३० तक सलाद "बनाने" में जुटी रही। जब दोस्तों की आवक शुरू हुई तो सुरभि रसोई में "अति व्यस्त" थी।

"ये टिक्की लीजिए न, मैंने इसमें "कार्नफ्लोर" डलवा दिया था। अरे!!आप तो कुछ ले ही नहीं रहे। इस चटनी में अमिया डलवायी तो स्वाद कितना अलग हो गया न!!"सुरभि अपने रंग जमा रही थी, इधर मैं कुढ़ रही थी। वियोम दो बार आ मुझे टोक चुके थे, "सारा क्रेडिट ले रही हैं और तुम मुँह सीये बैठी हो। " सुरभि की ये अदाकारी तो अभि भी देख रहे थे। खाने के दौरान फिर सुरभि ने अपना परचम लहराया, "आप लोग पुलाव जरूर खाईयेगा। मैंने उसके ऊपर तली हुई गोभी डलवा दी थी। " तभी अभि बोल उठे, " भई सुरभि, तुम तो छुपी रूस्तम निकली। तुम्हारे हाथ में इतने जायके हैं, मुझे अब तक मालूम ही नहीं पड़ा। हमें भी बना कर खिलाओ भई!! और हमें ही क्यों इन सबको भी तो पता चले कि हमारी बीवी के हाथो में कितना जादू हैं। तो अगले शनिवार को आप सब हमारे यहाँ पधारे। "

"सुरभि, इस बार एक सब्जी-पूड़ी से न टरका देना। भई, अब जब पता चल ही गया हैं कि तुम्हारा खाना बनाने में कोई तोड़ नहीं तो इस बार हम भी रच के खायेंगे। "विदिशा ने चुटकी ली।

  "संध्या भाभी, आपको सिल में पिसी चटनी बहुत पसंद हैं न। इस बार सुरभि के हाथ की बनी खाईयेगा। "अभि ने तीर छोड़ा।

" इस शनिवार हम सबका खाना तो सुरभि के यहाँ होगा संध्या। तो चलो, फिर ३ से ६ की पिक्चर देख आयेंगे। काफी दिन से गये भी नहीं। और सुरभि, जैसा टिक्की और पुलाव तुमने बनवाया, वो तो लाजवाब लगे। ये दोनों तो तुम बना ही लेना। " आलोपा के तरकश का ये आखिरी तीर एकदम निशाने पर लगा।

---.

 

अंजू निगम

इंदौर

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.