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प्रमोद जैन प्रेम की रचनाएँ


                            संकोच
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सामने है द्वार उसका , फिर यह कैसी हिचकिचाहट ।
खुल रही है देख कुंडी , हो रही है सुन ले आहट ।।

गांठ यूं मत बांध , मन
की सारी गांठें खोल दे ,
आज मत संकोच कर ,
तू दिल की बातें बोल दे ,
सामने है वो खडा , खुल रहे हैं देख ले पट ।।

एक मौका हाथ में है ,
अगले पल वो जा रहा है ,
धुन विदा की छिड़ गई ,
झोंका हवा का गा रहा है ,
सूखे पत्तों में नहीं क्यों ?  सुन रहा तू सुगबुगाहट ।।

जिन्दगी के खास लम्हों ,
को मनाना सीख ले तू ,
चूकना मत जिन्दगी से ,
दिल लगाना सीख ले तू ,
कल न जाने कितने हाथों में यह खुशियाँ जायेंगी बट ?

एक इशारा तो समझ ,
एक नजर तो देख ले ,
सामने है देख मंजिल ,
एक डगर तो देख ले ,
देख ले उसके अधर पर भीनी - भीनी मुस्कराहट ।।

आज जब वो सामने है ,
ना शब्द हैं , ना बोलता है ,
ना नजर भर देखता है ,
ना नजर से तौलता है ,
क्या ? इसी दिन के लिये , तू चूमता था रोज चौखट ।।

ना इधर है , ना उधर है ,
बीच में है रास्ता ,
अब नहीं जाना भटक ,
है तुझको उसका वास्ता
चल बढा अब कदम पथ पर दूर कर अब यह थकावट ।।

इस आस में ढेरों मरे ,
इस चाह में ढेरों जिये ,
बुझ चुके हैं बिन बताये
इक आह ले ढेरों दिये ,
देख ले अब तन भी तेरा , छोड़ता है गुनगुनाहट ।।


              रहने दे ( सकार - नकार )
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क्यों ? बदल रहा नख से शिख तक
पहचान जरा सी रहने दे ।
इस कदर तोड़ ना प्रिय मुझको ,
इक जान जरा सी रहने दे ।।

अपनों का अपनापन छीना
सब छीन लिये संगी - साथी ,
सब ओट अटारे लूट लिये ,
और छुडा लिये घोडे , हाथी
विधु को दरिया से मिलने दे , इक फूल प्रेम का खिलने दे ,
बहती है नदिया बहने दे ।।

रहने दे पत्थर को पत्थर ,
क्यों उसको मोम बनाता है ,
इक बार तो देखेगी दुनिया ,
बोलेंगे लोग देवता है ,
रहने दे हाथ  हथौडों को ,चेहरे पर उभरे फोडों को ,
तन पर रेखाएं रहने दे ।।

इक पैर जमीं पर रखता हूं ,
इक पैर के नीचे है पानी ,
भू पर अंगडाते अंधड़ हैं ,
जल में लहरें हैं तूफानी ,
किस तरह चले जीवन नौका ? प्रिय हाथ में दे दे इक मौका ,
मगरूर आंधियां रहने दे ।।

रचने दे हाथों में मेंहदी ,
होने दे गाल गुलाबी से ,
लहराने दे आंचल महका ,
पड़ने दे पैर शराबी से ,
रहने दे मय औ मधुशाला , रहने दे हाथों में प्याला ,
और साथ में साकी रहने दे ।।

क्यों सब्ज बाग दिखलाता है ,
सपना दिखलाये फूलों का ,
दामन में कांटे भर , देता
बदला इंसानी भूलों का ,
सपनों को जरा चहकने दे , फूलों को जरा महकने दे ,
कांटों का दामन रहने दे ।।

               
                        गीत की अमरता
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मन में बैठा मायावी कोई , चित्र उकेरा करता ।
हर विचार में भाव भरे  शब्दों में भरदी कविता ।।

अधर खोल मन बोल रहा
अन्तर में मौन समाया
मैं खोज रह हूं खुद को
मैं पकड़ रहा हूं छाया
भीतर के खालीपन में कोई स्वप्न सहेजा करता ।।

बियावान में भटका मन
क्यों ? ढूंढे प्रारब्धों को
एक गीत को आतुर सा
कवि पकड़ रहा शब्दों को
अंतर का श्रोत फूट जुबां से गीत सुहाना झरता ।।

बेबस हो क्यों ? चीख रहा है
मुझ पर आज जमाना
मैं मिट कैसे जाउंगा ?
मैं तो हूं इक अफसाना
यदि शब्द सार्थक है तो फिर गीत नहीं मर सकता ।।


                      अनमोल श्रद्धा
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दर धीमे से खोल
दो शब्द प्रेम के बोल ।
मैं द्वार खडा हूं तेरे
गलियों में स्वार्थ लुटेरे
सब रहे हैं डाका डाल
देते हैं साथ अंधेरे
कर्कश कोहराम मचा है
बाहर बहका माहौल ।
दीवारें कान लगाये
किसे अपनी बात बतायें
संदेह पला सांसों में
अपने सब हुये पराये
सब करते कानाफूसी
सब खडे खोलने पोल ।
सर पर मंडराता भूत
जितनी भी की करतूत
फिर - फिर मुंह दिखलायें
आंखें दिखलायें अकूत
पर विश्वास घना है तेरा
श्रद्धा तेरी अनमोल ।


                            असमंजस
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नफरत तेरी जीने ना दे  , प्रेम तेरा मरने ना दे ।
सांप छछूंदर जैसी हालत , जीने दे ना मरने दे ।।

तैरे बिन क्या ? खो लूं , पा लूं
तुझे छोड़ किसको अपना लूं  ?.
गीत मिलन का कैसे ? गा लूं
या कि दिल में बिरह बसा लूं
आंखों से पानी की बूंदें , यूं फिजूल गिरने ना दे ।।

मन के साथ खडे कई मन हैं
जीवन के भी लाख प्रश्न हैं
तिरछी क्यों तेरी चितवन है
मुझसे क्या ? तेरी अशवन है
तेरी अनबन मुझको तुझसे प्रश्न कोई करने ना दे ।।

तुझ बिन मैं कैसे जी पाऊं ?
जीऊं नहीं तो क्या मर जाऊं ?
अब मैं तुझको क्या बतलाऊं ?
मरकर क्या मुक्ति पाऊं ?
तेरी तिरछी चितवन  मन के घावों को भरने ना दे ।।

नफरत से क्या हल होना है  ?
फूल कहां  ?  कांटे बोना है
पाना क्या केवल खोना है
जीवन का भी क्या ?  रोना है
प्रीत पलों में नफरत तेरी झरने सा झरने ना दे ।।

         
                        तुम जो पास हो
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एक - एक पल  लगे फूल सा कोमल ।
तुम जो साथ हो , तुम जो पास हो ।।
कुछ ना कहो लबों से
हर आस मौन है
फटके ना कोई साया
आहट है कौन है ?
हर दर्द हो गया है निर्भर सा निश्छल
तुम जो ...............................।।
पानी के बुलबुले
कुछ देर तक रहे
पल - पल गुजर रहा है
गुमसुम ना कुछ कहें
हर दृश्य हो रहा , हर आंख से ओझल
तुम जो ................................।।
बेगानों सा शहर है
अनजानी हर नजर है
बेबुझ सी दिशायें
भटकी सी हर डगर  है
हर गीत है रुआंसा , है उदास हर गजल
बस तुम ही साथ हो , बस तुम ही पास हो ।।


                           प्रार्थना
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यही एक प्रार्थना है मेरी भगवान से ,कि
बुझे नहीं दीप कभी आदमी की आस का ।
खूब फूले , खूब फले और खूब महके प्यार
मरे नहीँ फूल कभी मन के पलाश का ।।
खूब हों उमंग हिये , मन प्रेम संग जीये
मिट जाये , शूल सब हिये के हताश का ।
जग जगमग होवै प्रेम के प्रकाश में
खूब प्रसार प्रिय प्रेम के प्रकाश का ।।


                 भावना (लड़की ) कुंज ( लड़का )
              .............................................

भावना के कुंज में औ प्यार के इस पुंज में
यार तुम जीवन बिताओ सुख चैन से ।
हर पल , हर छड़ दिलों का मिलाप होवै
प्यार का पैगाम पाओ तारों भरी रैन से ।।
मृदु बोलो , मृदु सुनो , और मृदु देखो यार
भावना की भावना को जीतो मृदु बैन से ।
इत - उत , ताक - झांक छोडो अब यार मेरे
नैनों को मिलाओ नित भावना के नैन से ।।


                             दर्द
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दर्द देखता हूं दर्द दिखता है चहूं ओर
देखता हूं द्वार - द्वार खुशियां रुआंसी हैं ।
आह ढेर , चाह ढेर मनवा के आंगना में
पाता हूं कि खुशियां क्षणिक हैं , जरा सी हैं ।।
हाथ जोड़ , पांव मोड़  खुशियां खडी हैं द्वार
दर्द हुआ दावेदार , खुशियां तो दासी हैं ।
उड़ जायें, मुड़ जायें , कांप जायें , कुढ जायें
दर्द है धमाकेदार , खुशियां धुआं सी हैं ।।

               

                        प्रमोद जैन प्रेम

कविता 2611694227134037825

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