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फिल्मों का संवाद लेखन (Dialogue Writing) डॉ. विजय शिंदे

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फिल्मों का संवाद लेखन ( Dialogue Writing) डॉ. विजय शिंदे देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र). फिल्म के निर्माण की अनेक महत्त...

फिल्मों का संवाद लेखन (Dialogue Writing)

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

फिल्म के निर्माण की अनेक महत्त्वपूर्ण कड़ियों में से अहं कड़ी हैं - संवाद। संवाद सृजन प्रक्रिया के साथ जुड़नेवाली कला है। संवादों के माध्यम से कहानी को कथात्मक रूप से संवादात्मक और नाटकीय रूप प्राप्त होता है, जिसका उपयोग अभिनय के दौरान होता है। फिल्मों की व्यावसायिक और कलात्मक सफलता भी तस्वीरों की सूक्ष्मताओं और संवाद के आकर्षक होने पर निर्भर होती है। न केवल भारत में बल्कि विश्व सिनेमा में आरंभिक फिल्में अवाक (बिना आवाज) की थी। इन्हें सवाक (वाणी के साथ, आवाज के साथ) होने में काफी समय लगा। हालांकि सिनेमा के निर्माताओं की मंशा इन्हें आवाज के साथ प्रदर्शित करने की थी परंतु तकनीकी कमजोरियां और कमियों के चलते यह संभव नहीं हो सका। धीरे-धीरे दर्शकों का और सारी दुनिया का सिनेमा के प्रति आकर्षण उसमें नई-नई खोजों से इजाफा करते गया और फिल्में सवाक बनी और आगे चलकर रंगीन भी हो गई। चित्रों के माध्यम से प्रकट होनेवाली कथा-पटकथा संवाद के जुड़ते ही मानो लोगों के मुंह-जुबानी बात करने लगी। लोग पहले से अधिक उत्कटता के साथ फिल्मों से जुड़ने लगे और विश्वभर में सिनेमा का कारोबार दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति करने लगा। फिल्मों के लिए चुनी कहानी को पटकथा में रूपांतरित करने के लिए और पटकथा को संवादों में ढालने के लिए आलग-अलग व्यक्तियों की नियुक्तियां होने लगी। इसमें माहिर लोग पात्रों के माध्यम से अपने संवाद कहने लगे और आगे चलकर यहीं संवाद लोगों के दिलों-दिमाग की बात भी करने लगे। संवादों का फिल्मों के साथ जुड़ते ही फिल्में सार्थक रूप में जीवंत होने की ओर और एक कदम उठा चुकी।

1. संवाद क्या है?

दो या दो से अधिक लोगों के बीच होनेवाली बातचीत, कथोपकथन, चर्चा और विचार-विमर्श को संवाद कहा जाता है। परंतु फिल्मों में कोई पात्र अपने-आप से भी बातचीत कर रहा है तो संवादों के माध्यम से दिखाया जाता है। फिल्मों मे होनेवाली बातचीत में शब्द होते हैं, शब्दों से वाक्य बनते हैं और वाक्यों के माध्यम से होनेवाला आपसी कथोपकथन संवाद का स्वरूप धारण करता है, यहीं संवाद मनुष्यों के बीच होनेवाले क्रियाकलाप, भावनाओं, विचारों, प्रतिक्रियाओं और इच्छा-आकांक्षाओं को सामने लाते हैं। यह बातचीत सार्थक होती है और उसमें कई अर्थ छिपे होते हैं, जिससे फिल्म के मूल विषय या पात्रों के चरित्र को उभार मिलता है। उपन्यास और कहानी की अपेक्षा फिल्मों में संवादों की अधिक एहमीयत होती है, उसका कारण फिल्मों का दृश्य-श्रव्य माध्यम होना है। कहानी और उपन्यास में पाठक कल्पना करता है कि पात्र संवाद बोल रहा है परंतु फिल्में और धारावाहिकों में चित्र स्वरूप पात्र सीधे संवाद बोलते हैं और उन संवादों का अभिनय के साथ प्रकटीकरण भी होता है। ऐसी स्थिति में पात्र और संवादों की जांच-पड़ताल दर्शक सीधे करने लगते हैं।

असगर वज़ाहत लिखते हैं, "फिल्म में पात्रों द्वारा बोले गए संवाद एक ओर जहां वास्तविक जीवन में बोले गए संवादों के समान होते हैं तो कहीं-कहीं ‘लार्जर दॅन लाइफ’ होते हैं। कम या अधिक पात्रों के बीच भाषा द्वारा अर्थपूर्ण संवाद कभी-कभी भाषा और संकेत का मिला-जुला रूप भी हो सकता है। यदि एक आदमी दूसरे से कुछ पुछता है और दूसरा संकेत द्वारा उसका उत्तर देता है तो यहां संप्रेषण हो जाता है पर दोनों ओर से भाषा का प्रयोग नहीं किया गया है। कहानी में विविध प्रकार के पात्र होते हैं। इन पात्रों की पृष्ठभूमि और स्वभाव भिन्न होता है। यही कारण है विभिन्न पात्रों के संवाद एक-दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। पात्रों के संवादों की विभिन्नता संवाद लेखक के लिए चुनौती होती है। लेखक को न केवल प्रत्येक पात्र की भाषा अथवा बोली बोलने का स्टाइल तय करना पड़ता है बल्कि कहीं-कहीं यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि फिल्म के आगे बढ़ने के साथ-साथ संवादों में किस तरह का परिवर्तन आएगा।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 69-70) फिल्मों की कहानी, पटकथा और संवाद आपस में जुड़े हुए होते हैं। इन तीनों पर अलग-अलग व्यक्ति काम कर रहे हैं तो तीनों को आपसी तालमेल बिठाना पड़ता है और चर्चा के उपरांत कई बार संवादों को अंतिम स्वरूप देना पड़ता है। फिल्म की कहानी पटकथा से चलती है और पटकथा संवादों से बनती है तो दर्शकों को ध्यान में रखते हुए संवाद लिखे जाने चाहिए। कई फिल्मों में कहानी, पटकथा लेखक और संवाद लेखक एक ही होते हैं और कई फिल्मों में यह कार्य तीन अलग व्यक्ति भी करते हैं। "साहित्य की विधा में अगर कवि, कहानी नहीं लिख पाए तो कहीं अनर्थ नहीं होगा। क्योंकि हर विधा स्वतंत्र विधाएं हैं। लेकिन दृश्य-श्रव्य माध्यम में कहानी, पटकथा तथा संवाद एक ही बिंब के तीन अंग हैं। अब यह बात अलग है कि कहानीकार अच्छी पटकथा नहीं लिख पाता इसलिए उसे संवाद लेखन का अवसर नहीं दिया जाता किंतु यह विभाजन समर्थनीय नहीं है।" (पटकथा कैसे लिखे, पृ. 137) लेखक अपनी कहानी की आत्मा के साथ जुड़ा हुआ होता है, अतः वह फिल्मी तकनीकें सीख जाए तो अच्छी पटकथा लिख सकता है और अच्छी पटकथा के बाद अच्छे संवाद भी लिखे जा सकते हैं। हां अगर जरूरत पड़ रही है तो निर्देशक लेखक के साथ सहायक व्यक्तियों की नियुक्ति कर सकता है।

फिल्मी संवादों की विशेषताएं निम्नानुसार बताई जा सकती हैं -

अ. यथार्थवादी,

आ. स्वाभाविक,

इ. सहज,

ई. तर्कसंगत,

उ. सुगठित,

ऊ. प्रभावशाली,

ऋ. संप्रेषणीय,

ऌ. संक्षिप्त आदि।

उपर्युक्त विशेषताएं अगर संवादों में हो तो फिल्में चुस्त-दुरुस्त होती है। दर्शक संवादों को गानों जैसा अपने होठों पर सजा लेते हैं।

2. फिल्मी संवाद के प्रकार

फिल्मी संवादों को असगर वज़ाहत जी ने चार वर्गों में विभाजित किया है। उन्होंने कहा है कि "संवादों के माध्यम से न केवल साधारण बातचीत होती है बल्कि भावनाओं और विचारों को भी व्यक्त किया जाता है। परिस्थिति और घटनाओं का ब्योरा दिया जाता है, टिप्पणियां की जाती हैं। संवादों का बहुआयामी स्वरूप उसके प्रकार निर्धारित करने पर बाध्य करता है। संवाद के विविध प्रयोगों के आधार पर संवाद को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है – (1) सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद, (2) औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद, (3) विचार व्यक्त करनेवाले संवाद और (4) भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 72)

अ. सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद – सामान्य जानकारी देनेवाले संवाद सीधे-साधे और सरल होते हैं। इनके माध्यम से केवल जानकारी और सूचनाएं प्राप्त होती है। इसकी भाषा और भाषा में निहित अर्थ दर्शकों की समझ में आसानी से आता है। इसमें कोई अतिरिक्त भाव नहीं होता है। इन संवादों में कोई चमत्कार और टेढ़ापन भी नहीं होता है। कोशिश यह होती है कि दर्शक पात्रों की भाषा को आसानी समझे और भ्रांति पैदा न हो।

आ. भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद – मनुष्य के स्थायी भाव ग्यारह प्रकार के हैं और इनके साथ जुड़कर आनेवाले विभाव, अनुभाव और संचारी भावों की संख्या भी अधिक हैं। अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी भाव स्थायी भावों को ताकद प्रदान करते हैं और इन भावों को बड़ी सार्थकता के साथ फिल्मी संवादों में इस्तेमाल किया जाता है। फिल्मों में संवादों के माध्यम से मनोभावों को प्रकट करना कठिन और जटिल कार्य है। हर कहानी और पटकथा में यह भाव सर्वत्र बिखरे पड़े होते हैं और उनको बड़ी सादगी के साथ क्रम से सजाना होता है। संवाद लेखक के लिए चुनौती यह होती है कि सभी फिल्मों मे कम-अधिक मात्रा में यहीं भाव होते हैं तो अभिव्यक्ति करते वक्त कौनसे शब्दों और वाक्यों को चुना जाए। इतनी सारी फिल्में बन रही हैं और उनमें वहीं भाव प्रकट हो रहे हैं तो पुनरावृत्ति होने की संभावनाएं होती है। उससे बचने के लिए भावानुरूप शब्दों का चुनाव और संवाद लेखन कौशल का कार्य माना जाता है।

इ. विचार व्यक्त करनेवाले संवाद – विचार प्रकट करना जटिल कार्य है और इसकी भाषा आमतौर पर परिष्कृत होती है। फिल्मों में अगर परिष्कृत भाषा का प्रयोग किया जाए तो साधारण दर्शक की समझ में नहीं आएगी। अतः संवाद लेखक की यह जिम्मेदारी है कि परिष्कृत भाषा को थोड़ा नरम करते हुए दर्शकों को समझनेवाली भाषा के शब्दों को चुने और फिल्मी विषय तथा प्रसंग के भाषागत नीति-नियम की भी हानी न हो पाए। संवाद लेखक को ऐसे शब्दों का चुनाव करना पड़ता है जो पारिभाषिक न होते हुए भी विचार को व्यक्त करने में सक्षम हो।

ई. औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद – फिल्मों में कई औपचारिक प्रसंग आ जाते हैं जहां संवाद लेखक के लिए समतोल बनाने की आवश्यकता होती है। अदालती भाषा, पुलिस कार्य प्रणाली की भाषा, सरकारी कार्यालयों की भाषा आदि औपचारिक संवादों की श्रेणी में आते हैं और इन संवादों में संवाद लेखक को ऐसी भाषा के निकट पहुंचना पड़ता है। फिल्मों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल अगर हो जाए तो फिल्में यथार्थ के अधिक निकट पहुंच जाती है। तीन घंटे तक दर्शक के दिलों-दिमाग पर अगर राज करना है तो कसे हुए संवादों की आवश्यकता है।

3. फिल्मी संवाद का कार्य

आरंभिक दौर में फिल्में अवाक थी और बाद में सवाक बन गई। परिवर्तन हुआ आवाज के बिना चलनेवाली फिल्में आवाज के साथ चलने लगी। इंसान को प्रकृति से जितनी भी देनें मिली है, उसमें एक महत्त्वपूर्ण देन है आवाज, और आवाज को इसने अपने काबिलियत के बल पर भाषा में रूपांतरित किया। मनुष्य के लिए अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन है ध्वनि या विविध ध्वनियों से बनती भाषा। कितनी बड़ी विड़ंबना थी कि इंसान को फिल्मों के आरंभिक दौर में अपने सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति के साधन को उसमें समाविष्ट करने का मौका नहीं मिला था। बिना आवाज की फिल्मों को देखकर निर्माताओं को भी अधूरापन खल रहा था; अतः फिल्मों को आवाज के साथ प्रस्तुत करने की लगातार कोशिश हो रही थी। जैसे ही फिल्मों के साथ आवाज जुड़ी मानो कोई चमत्कार हो गया और इंसानी सपने को पर लग गए। कहानी के कथन में अड़चन पैदा हो रही थी, वह दूर हो गई और मूकपट बोलपट माना जाने लगा। संवादों के साथ पात्रों का और पात्रों के साथ कहानी की पटकथा, विषय का परिपूर्ण विकास होते गया। मनुष्य कहानियां सुनना और सुनाना पसंद करता है। आरंभ से मंचीय नाटक भी यहीं कार्य करे रहे थे। अब फिल्मों में आवाज और संवाद के जुड़ने से यह कार्य बड़ी सफलता के साथ हुआ और कहानी कहने और सुनने की इंसानी भूख शमने लगी। संवादों के माध्यम से कहानी को गति तो मिलती है ही साथ में फिल्मी पात्रों के चरित्रों का अंकन भी होता है। फिल्मी संवादों का कार्य निम्नानुसार है –

· कहानी को आगे बढ़ाना।

· पात्रों का चरित्र-चित्रण करना।

· वातावरण बनाने में सहायता प्रदान करना।

· कथा के द्वंद्व को आगे बढ़ाना।

· अप्रस्तुत की जानकारी देना।

· संबंधों का चित्रण करना।

· भावों को प्रकट करना।

· विचार प्रकट करना।

· रोचकता निर्माण करना।

· कार्य-व्यापार को सामने लाना।

· फिल्म के विषय को ताकत प्रदान करना।

· जीवन की विविधता और व्यापकता को वाणी देना।

· भाषा को सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति देना।

· व्यंग्य और कटाक्ष को शब्दों के सहारे तीखा बनाना आदि।

4. फिल्मी संवाद और पात्र

फिल्मी संवाद और पात्रों का बहुत नजदीकी संबंध है। पात्र ही संवादों की भाषा पर प्रभाव डालते है। पात्र कौन है? कहां से आया है? उसकी परिस्थिति क्या है? आदि बातें संवादों की भाषा को तय करती है। फिल्म के भीतर पात्र अनाड़ी है और उसके संवादों में परिनिष्ठित भाषा और अंग्रेजी का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है तो यह उटपटांग लगेगा। कहानी के मूल लेखक को पता होता है कि उसने वह पात्र कौनसी परिस्थितियों में गढ़ा है। उसकी भाषा से वह भलीभांति परिचित होता है, अतः फिल्मों के संवाद खुद लेखक लिख रहा है तो उसके संवादों में पैनापना आ जाता है। यही कार्य अगर लेखक की जगह पर कोई दूसरा संवाद लेखन करेगा तो उसे सबसे पहले पात्रों की सारी पृष्ठभूमि को जानना पड़ता है। "संवाद का पात्र से गहरा रिश्ता होता है क्योंकि संवाद पात्र ही बोलते हैं। अच्छे संवाद लेखक अपने पात्रों को जितनी अच्छी तरह जानता है और उनके स्वरूप की जितनी अच्छी कल्पना कर सकता है वह उतने ही अच्छे संवाद लिख सकता है। पात्र का संवाद लेखक से यही आग्रह होता है, ‘मैं जैसा बोलता हूं वैसा तू लिख’ अच्छा संवाद लेखक स्वाभाविक संवाद लिखता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 80) संवाद लिखने से पहले लेखक को पात्र के बारे में निम्न जानकारी मालूम होनी चाहिए।

· पात्र की उम्र क्या है।

· पात्रों की पारिवारिक पृष्ठभूमि कौनसी है।

· पात्रों की आर्थिक पृष्ठभूमि कौनसी है।

· पात्र शिक्षित है या नहीं।

· पात्र का सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश कौनसा है।

· पात्र की जाति और धर्म कौनसा है।

· पात्र कौनसे देश और भौगोलिक स्थान से आता है।

· पात्र का व्यवसाय कौनसा करता है।

· पात्र की पसंदें और विशेष अभिरुचियां कौनसी हैं।

· पात्र का चाल-चलन, भाव-भंगिमाएं और वेशभूषा कैसी है।

· कहानी में पात्र की भूमिका कौनसी है।

· कहानी में पात्र का अन्य पात्रों के साथ संबंध कौनसा है।

· पात्र की स्वभावगत विशेषताएं कौनसी है।

पात्र संवाद नहीं बोलते तो संवाद ही पात्रों की पहचान होते हैं। पात्रों का चरित्र संवादों के आधार पर ही फिल्मों में गढ़ने की प्रक्रिया होती है। इसलिए पात्र और संवादों का रिश्ता बहुत महत्त्वपूर्ण, बहुआयामी और नाजुक होता है। एकाध गलती भी क्षम्य नहीं है। कोई छोटी गलती पात्र के चरित्र को हानी तो पहुंचाती है साथ ही फिल्म की कहानी और विषय को भी चोट पहुंचाती है।

5. फिल्मी संवाद की भाषा

संवाद के प्रकारों के भीतर संवाद की भाषा कैसी होनी चाहिए इस पर चर्चा हो चुकी है उसी चर्चा को यहां आगे बढ़ाया जा सकता है। संवादों की भाषा हमेशा गतिशील होती है और उसका गतिशील होना कहानी के हित में होता है, परंतु संवाद लेखक के लिए इस भाषा को गतिशील रखना एक प्रकार की चुनौती होती है। फिल्मों में आनेवाले पात्र हमारे आस-पास उपलब्ध होते हैं या यूं कहे कि मानवी जीवन की ही कहानियां फिल्मों में होती हैं, तो उसमें भाषाई प्रयोग भी उन पात्रों के अनुकूल ही होता है। संवादों की भाषा सबके लिए संप्रेषणीय होनी चाहिए क्योंकि फिल्में और धारावाहिकों को व्यापक जनसमुदाय देखता है और इस जनसमुदाय को वह समझ में आनी चाहिए। भाषा में सुगमता और सर्वग्राह्यता भी आवश्यक है। संवादों की स्वाभाविक भाषा लेखक की नहीं तो पात्रों की होती है। फिल्मी संवाद की भाषा को निम्म आकृति के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।

सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद, औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद, विचार व्यक्त करनेवाले संवाद और भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद यह चार संवादों के प्रमुख प्रकार हैं और इन प्रकारों के अनुरूप फिल्मों की भाषा बनती है। संवादों के प्रकारों में इसका विश्लेषण हो चुका है, अतः पुनरावृत्ति को रोकने के लिए यहां पर उसकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। यहां जो अन्य बातें हैं उस पर संक्षेप में चर्चा कर सकते हैं जिसके भीतर भाव प्रधान संवाद और अन्य भाषाई प्रयोगवाले संवाद फिल्मों में सौंदर्य निर्माण करने का कार्य करते हैं।

फिल्मों में भावनाएं होती हैं और मनुष्य के ग्यारह प्रकार के स्थायी भाव – प्रेम (रति), उत्साह, हास, शोक, क्रोध, भय, घृणा (जुगुप्सा), विस्मय, निर्वेद (शम), श्रद्धा और वत्सलता का फिल्मों में अंकन होता है। इन भावों के अनुकूल शब्दों का चुनाव अत्यंत आवश्यक होता है। इन भावों के प्रकटीकरण के लिए संवाद लेखक अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का इस्तेमाल करते हुए संवाद लेखन करता है। व्यंजना शब्द शक्ति के भीतर अलंकारिक भाषा का भी उपयोग होता है। परंतु इन सारी विशेषताओं को संवाद की भाषा के साथ जोड़ते वक्त इस बात का ध्यान रहे कि संवाद स्वाभाविक, सरल और पात्रानुकूल बने। अतिशयता और अतिरंजितता विषय को खतरा पैदा कर सकती है।

· प्रतीक – "संवाद की भाषा में प्रतीक का प्रयोग अभिव्यक्ति के स्तर को बहुत ऊपर उठा देता है। किसी भाव या विचार को बहुत प्रभावशाली ढंग से बताने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। प्रतीक आमतौर पर जनसाधारण में प्रचलित हैं और उनका संवाद में प्रयोग बहुत सरलता से पूरा संदेश प्रेषित कर देता है। मुख्य रूप से प्रतीक की विशेषताएं ये हैं कि वह अप्रस्तुत को प्रस्तुत कर देते हैं। मन में तुरंत किस भावना का संचार होता है। प्रतीक प्रायः अपने देश की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास से प्रेरित होते हैं। प्रतीक बनने की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। प्रतीक के प्रयोग से न केवल वाक्य में नयापन आता है बल्कि उसका प्रभाव बढ़ जाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 86-87)

उदा. मेरे दोस्त के घर में महाभारत शुरू है। एक भाई भीम की तरह कौरव सेना पर टूट पड़ा है। यहां पर महाभारत, भीम, कौरव सेना आदि भाषाई प्रयोग प्रतीक है।

· बिंब – फिल्में देखी जाती है अर्थात् वह दृश्य माध्यम है। फिल्मों में दृश्य स्वरूप में बिंबों को चित्रित किया जाता है। फिल्मों में यह अत्यंत प्रभावी प्रयोग है। बिल्कुल कम शब्दों में फिल्मी संवाद के भीतर बिंबों की सहायता से ताकत आ जाती है। फिल्मों में जहां दृश्य बिंब बनाना संभव नहीं वहां शब्द बिंबों की मदत ली जाती है। इसके कारण भावनाएं अधिक प्रभावशाली बन जाती है, संवादों में ताजगी और जीवंतता आती है।

उदा. खेत में काम करने के बाद अगर परिवार के सदस्य थक चुके हैं तो होनेवाले संवाद की भाषा में बिंबों का इस्तेमाल किया जाए तो इस प्रकार संवाद बनेगा – "मैं आज चुर-चुर हो गया हूं। क्या मेरे माता-पिता भी इसी प्रकार चुर-चुर हो गए होंगे। आज जैसे लग रहा है सारा शरीर चक्की में डालकर पिसा गया हो। क्या मां भी ऐसा ही महसूस कर रही होगी।"

· मुहावरा और लोकोक्ति (कहावत) - "भाषा में मुहावरों के माध्यम से सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति होती है। किसी प्रसंग या अभिव्यक्ति विशेष के संबंध में शताब्दियों से संचित अनुभव मुहावरों के रूप में स्थापित हो गए हैं। मुहावरों के माध्यम से न केवल सटीक बात कही जाती है बल्कि मुहावरे ऐसे बिंब भी बनाते हैं जो श्रोता को सरलता से गहराई तक ले जाते हैं। बोल-चाल की भाषा में मुहावरों का इस्तेमाल अक्सर किया जाता है। मुहावरे संवाद की भाव प्रधान भाषा में बहुत उपयोगी साबित होते हैं। लेकिन यह देखना आवश्यक है कि मुहावरा पूरे प्रसंग में सटीक बैठता हो और सिनेमा का दर्शक समुदाय उसे अच्छी तरह समझता हो। संवादों में मुहावरों का प्रयोग बहुत सोच-समझकर उचित स्थान पर ही करना चाहिए। मुहावरों की तरह लोकोक्तियां भी शताब्दियों से बोल-चाल की भाषा का हिस्सा हैं। लोकोक्तियां जीवन के कार्य व्यापार से संबंधित अनुभव आधारित अभिव्यक्तियां हैं, जो प्रायः सर्वमान्य हैं। मतलब यह कि उनके द्वारा व्यक्त किया गया मत प्रायः स्वीकार किया जाता है। मुहावरा कुछ शब्दों का समूह माना जाता है, जो एक साथ मिलकर अभिव्यक्त होते हैं। मुहावरों का सीधा अर्थ न होकर कोई और लक्षित अर्थ होता है। मुहावरें जब वाक्य में प्रयोग किए जाते हैं तब शब्दों को नया आयाम मिलता है। मुहावरों के शब्दों को समान्यतः बदला नहीं जाता क्योंकि ऐसा करने से उनका प्रभाव नष्ट होता है। लोकोक्तियां प्रायः वाक्य जैसी होती है। उनमें कोई अनुभव जनित सच्चाई छिपी होती है। लोकोक्तियां छोटी होती हैं। भाषा सरल होती है। इनमें लोकजीवन के तत्त्व भी होते हैं। लोकोक्तियों का प्रयोग वाक्य में नहीं किया जाता, इन्हें उदाहरण के तौर पर कहां जाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 88)

उदा. उंगलियों पर नचाना (मुहावरा) – किसी को पूरी तरह अपने काबू में कर लेना। फिल्मों में कोई पात्र दूसरे पात्र के दिमाग और मन पर हांवी हो गया हो तो इस मुहावरे का इस्तेमाल हो सकता है।

तलवे चाटना (मुहावरा) – बहुत खुशामद करना, चापलुसी करना। फिल्मों में कोई पात्र अपने लाभ के लिए या भय से दूसरे पात्र की बहुत खुशामद कर रहा है, चापलुसी कर रहा है तो इस मुहावरे का इस्तेमाल हो सकता है।

अकल बड़ी की भैंस (लोकोक्ति) – बुद्धिमानी सबसे बड़ी ताकत है। बुद्धि और ताकत के इस्तेमाल से कोई काम किया जा रहा है और उस प्रसंग में सफलता बुद्धि के बल मिल जाए तो इस लोकोक्ति का इस्तेमाल होता है।

आम के आम गुठलियों के दाम (लोकोक्ति) – किसी काम से दोहरा फायदा होना। पर्यावरणीय संदेश देनेवाली फिल्म में पेडों को लगाने का आवाहन किया है और ऐसी स्थितियों में लोगों ने ऐसे पेड़ लगाए जो पर्यावरणीय संरक्षण करते हैं और फल भी देते हैं तो यहां पर इस लोकोक्ति का उपयोग हो सकता है।

5. फिल्मी संवाद, ध्वनि प्रभाव और आंगिक भाषा

फिल्मी संवाद, ध्वनि प्रभाव और आंगिक भाषा का तालमेल अगर बैठ जाए तो फिल्में चार चांद लगा देती है। दर्शकों के दिलों पर राज करती है। विश्वभर की फिल्मों में इनका तालमेल बिठाकर उत्कृष्ट निर्मिति का प्रयास होता है। "शब्दों की बेजोड़ अभिव्यंजना जिसे लोग गीतों की तरह गुनगुनाए और फिल्म के वहीं लफ्ज उसके अमरता की गाथा को बयां करें, जिसमें शामिल हो पूरी फिल्म की रूपरेखा या संवाद ऐसे शब्दों का गुलदस्ता होता है जिसे दर्शकों की जुबां मिलती है। सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में हजारों फिल्में रूपहले पर्दे पर नजर आईं लेकिन उनमें से कुछ के संवाद दशकों गुजरने के बाद भी आम आदमी की जुबां पर हैं। शब्दों की यही अविस्मरणीय सजावट जिसकी आहट भी कान के पर्दे पर पड़ते ही पूरी पृष्ठभूमि को सामने ला देता है।" (पटकथा : सौंदर्य और सृजन, पृ. 189) इसका अर्थ यह है कि फिल्मी संवाद विशिष्ट ध्वनि प्रभाव से आंगिक भाषा के साथ अभिनय रूप में पर्दे पर उतरे तो वह फिल्मों की सफलता का मानक बनती है। संवादों की प्रस्तुति से अभिनेताओं की आवाज तथा उच्चारण से अर्थों के नए द्वार खुल जाते हैं। एक ही शब्द को कई तरह से प्रस्तुत करते हुए अभिनेता शाब्दिक सौंदर्य से फिल्मों को अभिभूत करते हैं। एक ही संवाद विविध अभिनेताओं की आवाज में अभिनय के साथ प्रस्तुत हो जाए तो दर्शकों के लिए अलग प्रकार का आनंद मिल सकता है।

संवाद लेखक द्वारा लिखे फिल्मी संवादों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसकी पृष्ठभूमि में अन्य प्रतीकात्मक आवाजों को जोड़ा जाता है तब उसे ध्वनि प्रभाव कहा जाता है। उदा. कौओं की आवाज, बिल्ली की आवाज, बादल का गरजना, रेल की खड़खड़ाहट, तूफान, समंदर की आवाज, कुत्ते का भौंकना आदि आवाजें संवादों में ध्वनि प्रभाव के साथ जोड़ दी जाती है। अर्थात् संवाद और विभिन्न ध्वनि प्रभावों के साथ अभिनेताओं का आंगिक अभिनय एक-दूसरे से जुड़ी कड़ियां है। "आंगिक भाषा एक विकसित ज्ञान है। अभिनय में आंगिक भाषा का विशेष महत्त्व है और प्रमुख रूप से यह अभिनय का ही विषय है लेकिन पटकथाकार को इसका ज्ञान होना आवश्यक है। आंगिक भाषा शब्दविहीन संप्रेषण का माध्यम है जो शरीर के विभिन्न अंगों, चेहरे के भावों तथा आंखों की गति से किया जाता है। कहा जाता है कि मनुष्य के संप्रेषण में आंगिक भाषा की हिस्सेदारी पचास प्रतिशत से अधिक होती है। आंगिक भाषा से पात्र की मनोदशा, उसका संभावित व्यवहार, प्रतिक्रियाएं और जिज्ञासाएं सामने आती हैं। पात्र की भावनाओं को आंगिक भाषा प्रभावशाली बनाती है। आंगिक भाषा प्रायः उंगलियों, सिर के हिलने, हाथों की गति से उत्पन्न होती है। आंखों, होठों, जबडों, तथा चेहरे की मांसपेशियों को गति देने से भी आंगिक भाषा बनती है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 88) फिल्मी संवाद, ध्वनि प्रभाव और आंगिक भाषा का तालमेल बिठाते वक्त निम्न बातों का विशेष ध्यान रखें –

· संवाद के साथ कुछ अतिरिक्त ध्वनियां संवाद को अधिक प्रभावशाली बनाती है।

· संवाद को अधिक प्रभावशाली बनानेवाली ध्वनियां प्राकृतिक या मॅकेनिकल (यांत्रिक) ध्वनि भी हो सकती है।

· आंगिक भाषा शब्दविहीन संप्रेषण का माध्यम है जो शरीर और चेहरे की गति से संपन्न होता है।

· फिल्म और टी. वी. में आंगिक भाषा का महत्त्व बढ़ रहा है।

· कभी-कभी संवाद का उत्तर आंगिक भाषा से दिया जाता है।

· आंगिक भाषा संप्रेषण को सरल बनाने का कार्य करती है और संवादों में स्वाभाविकता आती है।

सारांश

प्रारंभिक फिल्में अवाक थी। उनके साथ कोई संवाद नहीं था। चित्रों और अभिनय के माध्यम से फिल्म के कहानी को समझना पड़ता था। परंतु जैसे ही फिल्मों के साथ संवाद जुड़े तो सिनेमाघरों में तहलका मचने लगा। लोगों के दिलों-दिमाग की बातें संवादों के माध्यम से पर्दे पर साकार होने लगी। संवादों के जुड़ने से सिनेमा पहले से ज्यादा जीवंत हो गया। कहानीकार, पटकथा लेखक और संवाद लेखक की त्रयी सिनेमा को और अधिक प्रभावशाली बनाने में कामयाब हो गई। हालांकि संवादों का अस्तित्व हमारे कहानियों में पहले से मौजूद था अड़चन थी उसे तकनीकी तौर पर फिल्मों के साथ जुड़ने की। संवाद जब तकनीकी तौर पर सिनेमा से जुड़े तब अभिनय, चित्र और सिनेमा भी सार्थक बन गया। पात्रों के बीच चलनेवाले संवाद मनुष्य के विविध भावों को और मनोदशाओं को पर्दे पर सफलता के साथ प्रदर्शित करने में सफल हो गए हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. कथा, पटकथा, संवाद – हूबनाथ, अनभै प्रकाशन, मुंबई, 2011.

2. पटकथा कैसे लिखें – राजेंद्र पांड़े, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, आवृत्ति 2015.

3. पटकथा लेखन फीचर फिल्म – उमेश राठौर, तक्षशीला प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001, द्वितीय संस्करण 2005.

4. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.

5. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वज़ाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

6. पटकथा सौंदर्य और सृजन - डॉ. चंद्रदेव यादव, डॉ. मनोज कुमार, अनंग प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015.

7. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

8. सिनेमा : कल, आज, कल – विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006.

9. हिंदी साहित्य कोश भाग 1, पारिभाषिक शब्दावली – (प्र. सं.) धीरेंद्र वर्मा, ज्ञानमंड़ल लि. वाराणसी, तृतीय संस्करण, 1985.

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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रचनाकार: फिल्मों का संवाद लेखन (Dialogue Writing) डॉ. विजय शिंदे
फिल्मों का संवाद लेखन (Dialogue Writing) डॉ. विजय शिंदे
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