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गांधी और खादी : संवेदना और स्वाभिमान की साखी - डॉ.चन्द्रकुमार जैन

गांधी और खादी : संवेदना और स्वाभिमान की साखी

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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गांधी जी ने 1920 के दशक में गाँवों को

आत्म निर्भर बनाने के लिए

खादी के प्रचार-प्रसार पर बहुत जोर दिया था ।

यह वास्तव में उत्साहवर्धक है कि खादी के जरिये भारतवासियों को स्वावलंबी बनाने के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपने को साकार करने के लिए शासन और  विभिन्न सरकारी संस्थान आगे बढ़कर खादी के उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। दरअसल, मुझे लगता है कि नए सिरे से लोगों तक पहुंचे रही यह पहल, खादी को लेकर बापू की सोच की व्यापक बनाने का एक प्रयास है।

बहरहाल, खादी पर गांधी जी के दृष्टिकोण में निहित और सूत के एक-एक धागे के साथ जुड़ी स्वाधीनता, संवेदना, आत्म सम्मान की भावना को समझना आज भी समझदारी की बात है। वह आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने चरखे के चक्र में काल की गति के साथ ताल मेल करने और उससे होड़ लेने की भी अनोखी शक्ति को गहराई से देख लिया था। खादी के जन्म की कहानी भी काम रोचक नहीं है।

अपनी आत्म कथा में बापू लिखते हैं कि मुझे याद नहीं पड़ता कि सन् 1915 में मैं दक्षिण अफ्रीका से हिन्दुस्तान वापस आया , तब भी मैंने  चरखे के दर्शन नहीं  किये थे। कोठियावाड़ और पालनपूर से करघा मिला और एक सिखाने वाला आया । उसने अपना पूरा हुनर नहीं बताया । परन्तु मगनलाल गाँधी शुरू किये हुए काम को जल्दी छोड़नेवाले न थे । उनके हाथ में कारीगरी तो थी ही । इसलिए उन्होंने बुनने की कला पूरी तरह समझ ली और फिर आश्रम में एक के बाद एक नये-नये बुनने वाले तैयार हुए ।

आगे गांधी जी लिखते हैं कि हमें तो अब अपने कपड़े तैयार करके पहनने थे । इसलिए आश्रमवासियों ने मिल के कपड़े पहनना बन्द किया और यह निश्यच किया कि वे हाथ-करधे पर देशी मिल के सूत का बुना हुआ कपड़ा पहनेंगे । ऐसा करने से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला । हिन्दुस्तान के बुनकरों के जीवन की, उनकी आमदनी की, सूत प्राप्त करने मे होने वाली उनकी कठिनाई की, इसमे वे किस प्रकार ठगे जाते थे और आखिर किस प्रकार दिन-दिन कर्जदार होते जाते थे, इस सबकी जानकारी हमें मिली । हम स्वयं अपना सब कपड़ा तुरन्त बुन सके, ऐसी स्थिति तो थी ही नहीं । इस कारण से बाहर के बुनकरों से हमें अपनी आवश्यकता का कपड़ा बुनवा लेना पड़ता था। देशी मिल के सूत का हाथ से बुना कपड़ा झट मिलता नहीं था । बुनकर सारा अच्छा कपड़ा विलायती सूत का ही बुनते थे , क्योकि हमारी मिलें सूत कातती नहीं थी । आज भी वे महीन सूत अपेक्षाकृत कम ही कातती है , बहुत महीन तो कात ही नहीं सकती । बड़े प्रयत्न के बाद कुछ बुनकर हाथ लगे, जिन्होंने देशी सूत का कपड़ा  बुन देने की मेहरबानी की ।

बापू स्पष्ट करते हैं कि सन् 1917 में मेरे गुजराती मित्र मुझे भड़ोच शिक्षा परिषद में ले गये थे । वहाँ महा साहसी बहन गंगाबाई मुझे मिली । वे पढ़ीं-लिखीं अधिक नहीं थी , पर उनमें हिम्मत और समझदारी साधारणतया जितनी शिक्षित बहनों में होती है उससे अधिक थी । उन्होंने अपने जीवन में अस्पृश्यता की जड़ काट डाली थी, वे बेधड़क अंत्यजों में मिलती थीं और उनकी सेवा करती थी । उनके पास पैसा था , पर उनकी अपनी आवश्यकताएँ बहुत कम थीं । चाहे जहाँ अकेले जाने में उन्हें जरा भी झिझक नहीं होती थी । वे घोड़े की सवारी के लिए भी तैयार रहती थीं । इन बहन का विशेष परिचय गोधरा की परिषद में प्राप्त हुआ । अपना दुख मैंने उनके सामने रखा और दमयंती जिस प्रकार नल की खोज में भटकी थी, उसी प्रकार चरखे की खोज में भटकने की प्रतिज्ञा करके उन्होंने मेरा बोझ हलका कर दिया ।

अगर इंसान की इच्छा शक्ति प्रबल हो तो वह इतिहास की गति को भी मोड़ लेता है। गांधी जी ने पुराने चरखे से मैनचेस्टर की सबसे आधुनिक मिलों को पीट दिया था.हालांकि गांधी जी  ने आठ दिसंबर, 1921 को यंग इंडिया में अपने लेख में लिखा था- ‘चरखा व्यापारिक युद्ध की नहीं, बल्कि व्यापारिक शांति की निशानी है.’ और गांधी जी  ने खुद तो खादी पहना ही, लगभग पूरे देश को खादी पहना दिया था, खादी पहनने को शान की चीज़ बना दिया। पर खादी महज कपड़े भर का नाम नहीं है। गांधी जी ने इसे जीने के तरीक़े और सादगी से जोड़ा।

आज ‘खादी’ गांधीजी के नाम से जानी जाती है, लेकिन वैदिक काल से ही ‘खादी’भारतीय सभ्यता की जड़ों में समाहित थी। कपास की खेती, सूत की कताई और बुनाई ये तीनों चीजें विश्व-सभ्यता को भारत की देन हैं। दुनिया में सबसे पहले भारत में ‘सूत’ काता गया और कपड़ा बुना गया! सूत कातना और कपड़ा बुनना यहां का उतना ही प्राचीन उद्योग है, जितना कि स्वयं हिंदुस्तान की सभ्यता। मेरे विचार में खादी हिंदुस्तान की समस्त जनता की एकता , उसकी आर्थिक स्वतंत्रता की प्रतीक है और इसलिए ‘खादी हिंदुस्तान की आजादी की पोशाक है’। अप्रैल 1957 में  खादी ओर ग्रामोद्योग आयोग स्थापित हुआ जिसका  मुख्य कार्य ग्रामीण विकास में लगे अन्य अभिकरणों से समन्वय स्थापित कर ग्रामीण क्षेत्रों में खादी और अन्य ग्रामोद्योग के विकास के लिए कार्य करना है। इसमें खादी और ग्रामोद्योग में लगे कारीगरों के लिए प्रशिक्षण का आयोजन भी किया जाता है।

खादी जो एक समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक हुआ करती थी, आज भी लोकप्रिय तो है किन्तु इसे देश प्रेम के भावों से जोड़ना एक चुनौती है। फिर भी लोग हैं जो यह मानते हैं कि आज का दौर सदाबहार खादी के इस्तेमाल की नई इबारत लिख रहा है। खादी चलन में तो हमेशा थी, पर अब फैशन में भी आगे की पंक्ति पर शुमार है। बहरहाल इतिहास साक्षी है कि स्वदेशी, स्वराज, सत्याग्रह के साथ चरखे और खादी ने भारत की आज़ादी की लड़ाई में कितनी अहम भूमिका निभायी है। खादी सिर्फ वस्त्र नहीं परिश्रम और स्वाभिमान का प्रतीक भी बनी। तभी तो कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा -

खादी के धागे धागे में

अपनेपन का अभिमान भरा,

माता का इसमें मान भरा

अन्यायी का अपमान भरा।

खादी के रेशे-रेशे में

अपने भाई का प्यार भरा,

माँ-बहनों का सत्कार भरा

बच्चों का मधुर दुलार भरा। 

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प्राध्यापक ( राष्ट्रपति सम्मानित )

शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय

राजनांदगांव

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