नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

डॉ0 नरेश कुमार ‘‘सागर’’ की कविताएँ

          मिलेंगे जब मेरे मनमीत ---------
मिलेंगे जब मेरे मनमीत , होंठों पै उपजेगें गीत
पैंग बढेगी सावन जैसे , पूरी होगी मन की प्रीत
                   मिलेंगे जब मेरे ------------
आयेगी वो छम छम करती , मन आंगन में गुंजन करती
अलबेली  अल्हड  सी  वो ,मेरे  मन को  लेगी जीत
                   मिलेंगे जब मेरे --------------
चाहूं और होगी खुशहाली , झूमेगी जब कान की बाली
मेरे दिल से दिल लगाकर , जब वो निभायेगी रीत
                     मिलेंगे जब मेरे -------------
सपनों की बारातें होंगीं , ख्वाबों की सब रातें होगी
फूल खिलेंगे हरसू हरसू , कोयल भी गायेगी गीत
                      मिलेंगे जब मेरे ------------
नैनों में भरकर मधुशाला , आयेगी जब वो वाला
अपने होंठों से उसे पीकर , कर लूंगा मैं अपनी जीत
                     मिलेंगे जब मेरे --------------
मन लेता अंगडाई अकेला , प्यारा कितना प्रेम झमेला
अपनी धुन में रमकर ‘‘सागर’’, लिखते रहेंगे कहानी गीत
                       मिलेंगे जब मेरे ------------!!
           ------------
            मैं कवि हो गया -------
बच्चों की भूख में , गरीबी के रूप में
माँ के फटे आंचल में , जब भी मैं खो गया
                  बस मैं कवि हो गया ---------
प्रेमिका के प्रेम में , रूप और श्रृंगार में
यादों के परिवार में , जब भी मैं खो गया
                बस मैं कवि हो गया -------------
राहों की धूल में , खिलते हुए फूल में
पावों के चुभते शूल में, जब भी मैं खो गया
                बस मैं कवि हो गया -----------
मन्दिर की टन टन में , मस्जिद की हलचल में
गिरजा की शान्ति में , जब भी मैं खो गया
                 बस मैं कवि हो गया ----------
धरती की प्यास में , मेघों की मलहार में
अश्कों की फुहार में , जब भी मैं खो गया
                 बस मैं कवि हो गया ----------
सूरज की ललकार में , रात की झनकार में
डर से बुरे हाल में , जब भी मैं खो गया
                  बस मैं कवि हो गया ----------
जंगों की तलवार में ,प्रेम के व्यापार में
घरों की लगी दीवार में , जब भी मैं खो गया
                  बस मैं कवि हो गया -------------
राजनीति की अडचनें ,महगें होते गुड चने
टूटे दिलों की धडकनों में , जब भी मैं खो गया
                   बस मैं कवि हो गया -----------
दोस्तों  की  भीड़  में , बढ़ती  हुई  पीर में
नारी के खींचते चीर में , जब भी मैं खो गया
                    बस मैं कवि हो गया -------------
‘‘सागर’’ की गहराई में , पर्वत की उंचाई में
पेडों की परछाई में , जब भी मैं खो गया
                     बस मैं कवि हो गया --------------
कोयल की कूक में , बगुले की मूक में
विरह की धूप में, जब भी मैं खो गया
                    बस मैं कवि हो गया ---------------
बापू की आवाज में , बच्चों की किलकार में
वीबी के प्यार में , जब भी मैं खो गया
                   बस मैं कवि हो गया -----------
ढोलक की थाप में , बात करूं साफ मैं
बैठा हुआ आप में , जब भी मैं खो गया
                  बस मैं कवि हो गया ---------!!
                 -------------
            आ गया नव-वर्ष -----
आ गया नव-वर्ष, सर पर पुराना कर्ज
कैसे मनांउ हर्ष , आ गया नव-वर्ष  ----- आ गया नव-वर्ष---
मंहगाई ने तोडी नींद , सपने हुए वे-उम्मीद
आँखों में भरे है आँसू , मैं घर में किसको तांसू
चिंता का लगा है मर्ज ----- आ गया नव-वर्ष -----
चीनी से चॉंद गंजी , याद आयी पुरानी मंदी
गेहॅूं का खरीदूं आटा , लगता है जैसे चांटा
सरकार ना खाये तर्स ----- आ गया नव-वर्ष ------
हर चीज हो गयी महंगी , इज्जत के उतरे दाम
मूंगफली भी है महंगी , खाउं मैं कैसे बादाम
निभता नहीं कोई फर्ज ----- आ गया नव-वर्ष -------
ले के उधारी घर मे , आयी मिठायी भारी
वीबी से कह रहे थे ,ये प्यार है मेरा प्यारी
हो गया लम्बा कर्ज ------ आ गया नव-वर्ष ----------
प्याज की आयी आँधी , बनिया भी मारे दांडीं
लहसुन ने पैंग बढायी , महंगी हो गयी चटायी
चलता ना घर का खर्च ----- आ गया नव-वर्ष --------
सब कहते हैंप्पी न्यू ईयर , कैसे हो प्यारे डियर
रहते हो किसके नियर ,क्या पहना है अंडर-वियर
पूछे सभी कम जर्फ ------- आ गया नव-वर्ष ----------!!
           -------
           माँ याद आयी है ------
सजी है शाम माँ के नाम तो माँ याद आयी है
मेरे ख्वाबों ख्यालों में , वो देखो मुस्करायी है
माँ के साये में गुजरा ,मेरा वो बचपना सुन्दर
मगर अब तो जवानी भी , लगती गहरी खायी है
                    मेरे ख्वाबों ख्यालों में -----------
नहीं जन्नत कोई देखी ,खुदा का नूर ना देखा
मैंने तो माँ की आँखों से, ये सारा जहाँ देखा
जमाने का हर एक रिश्ता, झूठा है फरेबी है
मुकद्दर वाला वो जिसने , माँ की दौलत पायी है
                    मेरे ख्वाबों ख्यालों में ------------
गया परदेश तो देखा, सभी कुछ था लुभाना सा
बिन माँ के मगर लगता, वो आलम भी पुराना सा
एक तस्वीर मैं लेकर गया था , माँ की संग अपने
मेरी खुशियों की दुनिया में , माँ की ही परछांयी है
                      मेरे ख्वाबों ख्यालों में -----------
नहीं होती माँ जिनकी, कलेजा उनका फटता है
जमाने का हर एक रिश्ता, दे ताने डपटता है
ना दो दुःख कोई माँ को , खुदा भी रूठ जायेगा
मोहब्बत की हकीकत की , बस माँ ही सच्चाई है
                       मेरे ख्वाबों ख्यालों में ----------
मतलब स्वार्थ की दुनिया में , बस माँ वफा करती
वो अपने बच्चों की खातिर, सारे सुख स्वाह करती
माँ का प्यार पाने को , राम-कृष्णा भी ललचाये
झुके ‘‘सागर’’ फरिश्ते भी ,फटी जब भी बिवायी है
                      मेरे ख्वाबों ख्यालों में ----------!!
         ------------
       क्या है  जिन्दगी ?
हंसना है जिन्दगी
रोना है जिन्दगी
गिरकर संभल जाने को
कहते हैं जिन्दगी ---- हंसना है जिन्दगी
यूं तो उजड़ जाते हैं
कितने ही आशियाने
सपनों का महल बनाने को
कहते हैं जिन्दगी ----- हंसना है जिन्दगी
‘‘सागर’’भी हो पास
नदियां भी बहे कितनी
आँसुओं को पी जानें को
कहते हैं जिन्दगी ----- हंसना है जिन्दगी
तूफान भी आतें हैं
सैलाब भी आते हैं
इन सबसे भी कहीं ज्यादा
वीरान है जिन्दगी ----- हंसना है जिन्दगी
कांटों से घीरे रहना
अकेले राहों पर चलना
गुन गुनाने मुस्कराने को
कहते हैं जिन्दगी ------ हंसना है जिन्दगी !!
        ----------

       --------
          पीने भी दो -----
पीने दो मुझे ओ यारा - पीने भी दो
ना दो मुझे कोई सहारा - पीने भी दो ------
                    पीने दो मुझे ओ यारा -----
उठ उठ के गिरूंगा गिरने दो
मुझे अपने आप संभलने दो
ना दो मुझे कोई सहारा ---- पीने भी दो -----
                     पीने दो मुझे ओ यारा ------
मेरे दिल के टुकडे कहते हैं
यहाँ बेवफा ही रहते हैं
यहाँ तोडे दिल - दिलदारा --- पीने भी दो ----
                     पीने दो मुझे ओ यारा -------------
मेरी आँख के आँसू बहते हैं
उस बेवफा को कहते  हैं
अब गली ना तेरी आना --- पीने भी दो -----
                     पीने दो मुझे ओ यारा ----
गिन गिन के प्याले क्या पीना
घुट घुट के जीना क्या मरना
‘‘सागर’’ सब करो किनारा ----- पीने भी दो ----!!
      ---------
      हिन्दी का विरोध ---
आग कैसी ये देखो ,   सुलगने लगी
सपनों की नगरियॉं ,  जलने लगी
है जिनकी जन्म और कर्म भूमि ये
नजरों में उन्हीं के, ये खलने लगी
                 आग कैसी ये देखो ------
हिन्दी है हम वतन के इस देश में
हिन्दी बालों पै टूटे सितम देश में
राष्ट्र और राष्ट्र-भाषा की परवाह नहीं
उनकी नीति घिनौनी जो चलने लगी
                     आग कैसी ये देखो ------
हिन्दी से पहचान हिन्दुस्तान की
हिन्दी भाषा है जॉं हिन्दुस्तान की
खुद को हिन्दू कहें परहेज हिन्दी से
सूरतें उनकी कितनी बदलने लगीं
                    आग कैसी ये देखो ------
हमने सबको गले से लगाकर रखा
शिवाजी था मराठा घर अपने रखा
फर्क हमने किया ना भाषा -भेस में
फिर भी गोलियां हमपर ही चलने लगीं
                    आग कैसी ये देखो ------
चन्द गद्दार मनमानी करने लगे
देश को टुकडों में ही करने लगे
दे दो फांसी इन्हें देर किस बात की
भारती माँ गुजारिश ये करने लगी
                    आग कैसी ये देखो -------!!
            ------
              ये शब्दों के शूल अगर चुभ जाते हैं -----
सदा रसाई रख तू , अपनी वाणी में
रम जाये जो मधु , छलकते पानी में
जीवन में कडवाहट सी भर जाते हैं
ये शब्दों के शूल , अगर चूभ जाते हैं
जीवन में कडवाहट सी -----------
वाणी जैसा वार नहीं , तलवारों में
वाणी जैसी अगन नहीं , अंगारों मे
मन आंगन,घर,बाहर तक, जल जाते हैं
ये शब्दों के शूल ----------
लहू बहाकर, लाल धरा को कर डाला
कुरू क्षेत्र सा, रण शब्दों ने दे डाला
महारथी भी, तीरों पर टंग जाते हैं
ये शब्दों के शूल ---------
हो जाये तो , थोडा दर्द दवाया कर
कभी कभी मन को भी, समझाया कर
ढह जाते जो , जन्म - जन्म के नाते हैं
ये शब्दों के शूल ---------
देख भुलाकर कडवी-कडवी बातों को
याद ना कर मिलनें वाले,आघातों को
लौट,लौटकर आते हैं , टकराते हैं
ये शब्दों के शूल ---------
हरियाली मुरझा जाती है, गॉव में
धूप सुलग उठती है , ठण्डी छांव में
अन्तर तक में , घाव बहुत कर जाते हैं
ये शब्दों के शूल , अगर चुभ जाते हैं ----!!
       --------

    हैप्पी वैलेन्टाईन्स डे
प्यार पै भारी फाईन है ,देखो वैलेन्टाईन है
जो भी मांझी संग पकडा
डण्डों का बदन पर साईन है ----- देखो वैलेन्टाईन है
घर से संभल ,संभल जाना , बीवी को भी मत संग ले जाना
बैठे जो कहीं होटल में संग
मीडिया की वहॉ लम्बी लाईन है ----- देखो वैलेन्टाईन है
फूल के बदले शूल मिलें , राहों में जो किसी से पेच लडें
मोहब्बत का नशा उतरे नीचे
खाकी का गुस्सा टाईन है ------देखो वैलेन्टाईन है
तैरहा में मिलो पन्द्रहा में मिलो ,चौदह में एस0एम0एस0 युद्ध करो
यादों में गुम होकर देखो
ख्वाबों की खुली बाईन है ------ देखो वैलेन्टाईन है
हर ओर खौफनाक पहरे , मिलने पर बादल है गहरे
सरे - राह मिलने पर कर्फ्यू
सपनों की खुली सब लाईन है ----- देखो वैलेन्टाईन है
बजरंग दल यूं फुफकार रहा ,पश्चिम को वो ललकार रहा
वैलेन्टाईन पर रोक लगाने को
शिव सेना ने खोली ज्वाईन है ----- देखो वैलेन्टाईन है
इंकलाब करो मिलने वालों ,खुलकर मिलो मिलने वालो
कह दो जमाने से तुम ‘‘सागर’’
पी हमने इश्क की वाईन है ------ देखो वैलेन्टाईन है !!
      -----
     
       गीतकार - डॉ0 नरेश कुमार ‘‘सागर’’
ग्राम - मुरादपुर - सागर कॉलोनी , गढ रोड - नई मण्डी
       जिला - पंचशील नगर - हापुड ‘‘उ0प्र0’’

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.