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हास्य-व्यंग्य-आलेख - बैठे बैठे क्या करें..... आभा सिंह

आठवीं कक्षा की हिंदी की पुस्तक में एक कहानी पढ़ी थी ‘हाथी की पूंछ छोटी क्यों?’ कहानी पढ़कर आनंद आया और लेखक की कल्पनाशीलता पर आश्चर्य भी कि भला कैसे यह लेखक प्रजाति पाठक को अपने कल्पना लोक में ऐसे ले जाते है जैसे दूध में दही। मैं इस विचार पर पूरी तरह से आनंदित हो भी नहीं पाई थी कि तभी महाविद्यालय के तासिका सूचक यंत्र (बेल) ने सूचना दी की पहली कक्षा प्रारंभ हो चुकी है। दिन की पहली कक्षा वह भी सुबह सात बजे की मतलब शनीदेव के बाद की लोकप्रियता वाला दूसरा व्यक्ति (पहले तो शनीदेव)। इसके अलावा इस पहली कक्षा की एक खूबी और भी है कि यह अज्ञान और जागरूकता का इतना सुंदर नियोजन करती है कि आयोजन अपने आप डरावना हो जाता है। कक्षा का दृश्य भी कुछ-कुछ अद्भुत-विलक्षण की श्रेणी का होता है क्योंकि कुछ विद्यार्थी अचानक से बुद्धिमान हुए की भूमिका में आंखों को पूरी तरह से खोलकर प्रसन्नचित्त भावभंगिमा के साथ और कुछ ऐसे मानो शिक्षक वाकई में चमत्कार से सभी को बुद्धिमान बना देते हैं और कुछ तो ऐसे जिन्हें देखकर खुद शिक्षक ही व्याकुल हो जाए कि क्यों उसके पास कोई चमत्कारी छड़ी नहीं है।

इसी तरह के अफसोस और आनंद की मिली-जुली कक्षा में एक दिन एक विद्यार्थी घबराया हुआ सा आया। वैसे भी भाषा की विस्तारवादी कक्षा में विद्यार्थी प्रायः घबराकर ही आते थे सो मेरा ध्यान उसकी ओर नहीं गया। विद्यार्थी भी अपने ही दर्जे का अनोखा था, इस दौर में भी वह घबरा रहा था, विद्यार्थी होने के बावजूद सो मेरा चौकना स्वाभाविक था। मैं वेसे ही चौकी जैसे अंधश्रद्धा निर्मूलन वाले श्रद्धा को देखकर चौक जाते है। मैंने अपनेपन के आदर्शवादी लहजे में पूछा -

क्या बात है बेटा इतना घबरा क्यों रहे हो?

भारत जैसे संस्कृति और सभ्यता से लैस राष्ट्र में बेटा यह शब्द मुझे अत्यंत आशावादी लगता है क्योंकि ‘बेटा’ भले ही जिम्मेदारी कम नहीं करता पर उम्मीदें भी कम होने नहीं देता। वह कुछ भले ही न कर पाए पर आशा कम नहीं करता, आशा बराबर बनी रहती है कि कुछ तो कर ही लेगा। दरअसल ‘बेटा’ यह आशावाद का उत्कृष्ट उदाहरण है और प्राध्यापकों की जमात होती ही ऐसी है जो हमेशा आशावाद को घेरे रहती है कुल मिलाकर इस शब्द का प्रयोग उतनी ही आशा से किया जाता है जितनी आशा कोई मुकदमा अपने नतीजे पर पहुंचने की करता है।

मेरे पूछने पर बेटा बोला -

मैडम मुझे आज पता चला है कि सर्कस में जानवरों के उपयोग पर पाबंदी लगा दी गई है इसलिए कहीं पर भी किसी प्राणी का उपयोग होता देखकर तुरंत सूचना देनी है।

मेरी समझ में थोड़ा-थोड़ा आ रहा था कि क्यों मुझे यह जानकारी दे रहा है ताकि मैx जो समय-समय पर उसे गधा बनाती हूं उससे यह इंकार कर सकता है और ऐसी स्थिति में मुझे उसके इंकार को उसका अधिकार समझना है। पर साथ ही मुझे दूसरा संदेह यह भी हुआ कि कहीं इसे यह तो पता नहीं चल गया कि प्राध्यापकों को प्राध्यापक बने रहने के लिए जो कुछ करतब करने पड़ते हैं उसे आसान भाषा में सर्कस भी कहा जाता है और उसी जानकारी के चलते वह मुझे सूचित कर देना चाहता है कि सर्कस में जानवरों के उपयोग पर पाबंदी है और जिसके चलते वह महाविद्यालय रूपी सर्कस में अपनी आजादी की मांग लेकर आया है और वह भी कानूनन।

मैंने पूछा - अचानक तुम्हें सर्कस के जानवरों की चिंता क्यों हो रही है?

बेटा बोला - नहीं मैडम मुझे जानवरों की चिंता नहीं हो रही है वह तो सुरक्षित हो गए मुझे चिंता तो अपनी हो रही है।

उसके इस जवाब ने मुझे फिर संदेह में डाल दिया कि कही यह जाम्बवान द्वारा ज्ञान देने के पहले ही ज्ञान पा लेने वाला हनुमान तो नहीं हो रहा है क्योंकि ऐसी स्थिति में उसके संयमित रहने की संभावना का कम होना तय था। मैंने अपनी चिंता को कम करने के लिए उसकी चिंता को कम करना जरूरी समझा और उससे पूछा -

तुम्हें भला अपनी चिंता के लिए कहां जगह मिल गई यह तो जानवरों की सुरक्षा के लिए बनाया गया नियम है।

परंतु वह वैसा ही चिंतित बना हुआ था जैसा मतदान के गुप्त होने के बाद भी मतदाता होता है। अपनी इसी चिंता में वह बोला -

ऐसी बात नहीं है मैडम, बात तो यह है कि यदि किसी को सुरक्षित किया गया है तो निसंदेह किसी की सुरक्षा को ताक पर रखा गया होगा।

विद्यार्थी की इस विवेकबुद्धि पर मुझे संदेह हुआ कि कहीं यह महाविद्यालय में वास्तव में शिक्षा तो ग्रहण नहीं कर रहा क्योंकि बदलती शिक्षा व्यवस्था ने विद्यार्थियों को किताब पर निर्भर न रखते हुए तकनीक पर निर्भर होना सिखा दिया था जिसके चलते बच्चे भी ‘जो है सो है’ की श्रेणी के मिलते थे। मैं चकित थी क्योंकि इतना होते हुए भी वह अपनी विवेकबुद्धि का उपयोग कर रहा था वरना तो आजकल के बच्चों में से तार्किकता वैसे ही नदारद हो रही थी जैसे बाजार से गुणवत्ता।

मैंने उससे पूछा - तुम्हें अपनी सुरक्षा का भय क्यों लग रहा है?

मेरे प्रश्न का उसने जो उत्तर दिया वह सत्य होने के कारण भयानक हो गया था, वह बोला -

मैडम उल्लू तो वैसे भी आसानी से पकड़ में नहीं आते परंतु उन्हें पकड़ने की लालसा सभी में होती है और वो मिलते नहीं है इसलिए किसी न किसी को बनना पड़ता है और इस तरह से ‘उल्लू बनाया’ मुहावरा चरितार्थ होता है। (इतना कहकर वह रुका नहीं अपितु प्रवाहमयी धारा की तरह धाराप्रवाह बोलता गया)

वह आगे बोला - सोचिए मैड़म जब बिना असली उल्लू को देखे कोई पीढ़ी नकली उल्लू को ही असली मानने लगे तब ज्यादा समस्या तो उल्लू को ही आएगी कि वह खुद को साबित कैसे करें।

मुझे लगा यह बालक चिंतातुर विद्वान बनने की ओर अग्रसर है अर्थात् यह विद्वान तो पक्का बनेगा। मैंने उसकी विद्वत्ता को समाप्त करने के लिए प्रश्नों की तलवार निकाल ली और उससे कहा कि -

उल्लू बनाया तो बच जाएगा बेटा पर ‘उल्लू बनना’ मुहावरा नहीं रह जाएगा वाक्य बन जाएगा तब क्या होगा? (एक तरह से मैं भी उसकी चिंता से सहमत हो रही थी) गणित वाले गलत नहीं होते भई, मिलाने से तो चीज बढ़ती ही है, मैंने भी चिंता में चिंता मिलाकर चिंता बढ़ा दी। चिंता तो वैसे मेरी भी बढ़ गई थी इसलिए मैं उसके बेटेपन में सौतेला भाव मिलाने को मजबूर हो गई, मुझे लगा इसे वैसे ही नकार देना चाहिए जैसे वर्तमान समाज बौद्धिकता को नकार रहा है।

वह ‘बेटा’ अचानक जोश में आने की हद तक होश में आकर बोला -

मैडम ‘गधे के गधे’ या ‘पूरे गधे’ वाले वाक्य तो गधे के लिए ही संकट है।

मैंने उसे नकारते हुए कहां कि - गधा थोडे ही सर्कस में काम करता है।

वह बोला - मैडम काम तो उल्लू और अन्य भी नहीं करते परंतु सवाल तो अस्तित्व का है। एक बिचारा वही तो ऐसा जानवर है जो होता पूरा ही है फिर भी लोग उसे पूरा साबित करने में लगे रहते है तभी तो कहा जाता है कि, ‘पूरे के पूरे गधे हो’ या ‘पूरा का पूरा गधा है’ मानो गधा न हुआ विशेषण हो गया जो सम्मान के आधार पर तय होगा।

मुझे लगा मैं तुरंत इस विद्यार्थी से क्षमा मांग लू और कहूं कि, हे जिज्ञासु मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर किसी आदर्श के आधार पर नहीं दे सकती, आदर्श तो उधार लिया होता है उसे आधार नहीं होता अतः मुझे अपनी जिज्ञासाओं के आगे सूली पर मत चढ़ाओ अन्यथा मेरी विनम्रता कब ‘हाथी के दांत’ में बदल जाए मैं खुद नहीं कह सकती।’ यह विचार आते ही और विचार से राजनैतिक परिस्थिति रुपी बू आते ही मैं वहां से ऐसे छू-मंतर हुई जैसे सरकार अपने वादों से होती है।

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आभा सिंह नागपुर

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