बाल कहानी - एम. के. सर : हरीश कुमार ‘अमित’

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“एम.के. सर दिखे क्या?” मयंक ने अपने से आगे वाली सीट पर बैठे राहुल से पूछा. “अभी तक तो नहीं दिखे.” राहुल ने स्कूल बस की खिड़की से बाहर देखते ह...

“एम.के. सर दिखे क्या?” मयंक ने अपने से आगे वाली सीट पर बैठे राहुल से पूछा.

“अभी तक तो नहीं दिखे.” राहुल ने स्कूल बस की खिड़की से बाहर देखते हुए कहा.

“क्या बात हो गई आज या तो वे लेट हैं या हम!” मयंक बोला.

“एम.के. सर ने तो क्या लेट होना है. हमारी स्कूल बस ही एक-दो मिनट लेट है.” राहुल उसी तरह खिड़की से बाहर देखते हुए कह रहा था. तभी वह एकदम जोश में आकर कहने लगा, “वो देखो, वे जा रहे एम.के.सर!”

राहुल की बात सुनते ही बस में बैठे अनेक बच्चों के चेहरे सड़क की बाईं तरफ़ वाले फुटपाथ की ओर घूम गए. फुटपाथ पर उनके स्कूल के गणित के अध्यापक, दिनेश सर, तेज़ी से चलते हुए स्कूल की ओर जा रहे थे.

सड़क पर पैदल चलते दिनेश सर को देखकर कुछ बच्चे मुस्कुराने लगे और कुछ बच्चों की हँसी छूट गई.

“हर रोज़ पैदल स्कूल आने-जाने में थक नहीं जाते होंगे एम.के.सर?” बस में बैठा नीरज बोला.

“चाहे थक जाते हों, पर स्कूल आना-जाना तो मुफ्त में ही हो जाता है न इससे! न बस का खर्चा, न रिक्‍शा का!” मयंक मज़ाक उड़ाने के अंदाज़ में कहने लगा.

“और नहीं तो कम-से-कम एक साइकिल तो खरीद ही सकते हैं न एम.के. सर! इतना ज्यादा चलना तो नहीं पड़ा करेगा न हर दिन!” बस में बैठे बच्चों की ओर देखते हुए राहुल ने कहा.

“साइकिल खरीदने पर रुपए क्यों खर्च करेंगे एम.के.सर? जिस चीज़ के बग़ैर काम चल सकता हो, चलाना चाहिए.” मयंक ने गंभीर-सा मुँह बनाते हुए कहा तो बाकी बच्चों की हँसी फूट पड़ी.

“इतना पैसा बचाकर करेंगे क्या वे?” मयंक का सहपाठी, शिवम, बोला.

“उनके घिसे हुए जूते फट जाएँगे तो नए नहीं खरीदने पड़ेंगे क्या? नए जूतों के लिए ही करते होंगे इतनी कंजूसियाँ!” नीरज की इस बात पर बस में बैठे दूसरे बच्चे हँसने लगे.

सुबह बस में बैठकर स्कूल जाते समय उन बच्चों को दिनेश सर हर रोज़ पैदल जाते दिखाई दे जाते थे. बच्चों को उन्हें पैदल स्कूल जाते हुए देखने की ऐसी आदत हो गई थी कि कुछ बच्चे तो टकटकी लगाकर फुटपाथ की ओर देखते रहते जब तक कि दिनेश सर उन्हें दिख नहीं जाया करते.

इतना तो उन बच्चों को समझ आ गया था कि खर्च बचाने के लिए ही दिनेश सर पैदल स्कूल आया-जाया करते थे. बच्चों ने यह भी देखा था कि दिनेश सर के कपड़े बड़े साधारण-से होते थे. उनके पास सिर्फ़ दो-तीन जोड़ी कपड़े ही थे और वे सब बड़े पुराने-पुराने-से दिखते थे. उनके जूते घिसे हुए होते थे. उनकी कलाई घड़ी भी बहुत पुरानी थी. मोबाइल फोन तो वे रखते ही नहीं थे. बच्चों को इधर-उधर से बच्चों को यह भी पता चला था कि दिनेश सर किराए के एक छोटे-से कमरे में अपने परिवार के साथ रहा करते थे.

इन्हीं सब बातों की वजह से बच्चों ने उनका नाम एम.के. सर रख दिया था. एम.के. यानी महा कंजूस.

“आज टीचर्स डे है. एम.के. सर कम-से-कम आज तो अच्छे कपड़े पहनकर आते स्कूल!” शिवम बोल उठा.

“और कम-से-कम आज तो पैदल मार्च न करते, बस या रिक्‍शा में आ जाते स्कूल!” राहुल बोला.

“अगर ऐसा होता तो फिर हमें उनका नाम एम.के. सर के बदले कुछ और नहीं रखना पड़ता क्या?” मयंक ने जैसे ही यह कहा बाकी बच्चे हँसने लगे.

तभी बस स्कूल के सामने पहुँचकर रुक गई और बच्चे बस से उतरने लगे.

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी शिक्षक दिवस के मौके पर स्कूल में एक कार्यक्रम रखा गया था. इस वर्ष के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे वहाँ के जिलाधीश महोदय. स्कूल के विद्यार्थी और अध्यापकगण कार्यक्रम स्थल पर पहुँचकर कुर्सियों पर बैठने लगे. कुछ देर बाद कार्यक्रम शुरु हो गया.

कार्यक्रम के दौरान जब मुख्य अतिथि महोदय के भाषण का समय आया तो उन्होंने माइक के सामने खड़े होकर अपना भाषण देना शुरू किया. भाषण की शुरुआत करते हुए वे कहने लगे, ‘‘मैं इस स्कूल में कई सालों बाद आया हूँ. आप सोच रहे होंगे कि मैं इस स्कूल का छात्र रह चुका हूँ, मगर ऐसा नहीं है. मैं इस स्कूल का विद्यार्थी कभी नहीं रहा, पर इस स्कूल में एक-दो मिनटों के लिए आने का मौका मुझे अनेक बाद मिला है. दरअसल मैं इस स्कूल के गणित के अध्यापक दिनेश सर से मिलने कई बार इस स्कूल में आ चुका हूँ. यह कहने में मुझे गर्व हो रहा है कि आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह दिनेश सर के कारण ही हूँ. अगर ये मेरी स्कूल और कॉलेज की फीस चुकाने में मदद न करते, तो मैं तो कभी पढ़ ही नहीं पाता और अपने पिताजी की तरह मज़दूर बनकर रह जाता. इस स्कूल में मैं दिनेश सर से अपनी फीस के लिए रुपए लेने ही आया करता था.” इतना कहकर मुख्य अतिथि महोदय कुछ देर के लिए रूके.

फिर उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “आप लोग शायद इस बात को नहीं जानते, पर मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि दिनेश सर ने जैसे मेरी मदद की, वैसे ही उन्होंने दूसरे कई बच्चों की भी मदद की और ऐसा ही आज भी कर रहे हैं. इसी कारण ये इतने साधारण तरीके से रहते हैं और बड़ा सोच-समझकर घर का खर्च चलाते हैं ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा पैसा बचाकर ज़्यादा-से-ज़्यादा बच्चों की मदद कर सकें.”

यह सब कहते-कहते मुख्य अतिथि महोदय फिर थोड़ी देर के लिए रूके. सामने मेज पर पड़े पानी के गिलास से उन्होंने एक घूँट पानी पिया और उसके बाद आगे कहने लगे, ‘‘आप सोच रहे होंगे कि आज के ज़माने में जब कोई किसी दूसरे को एक पैसा भी बग़ैर मतलब के नहीं देता, तो फिर दिनेश सर अपने खर्च में से बचत कर-करके ग़रीब बच्चों की मदद क्यों करते हैं. इसकी भी एक वजह है जो दिनेश सर ने कभी मुझे बताई थी. दरअसल दिनेश सर बहुत गरीब घर में पैदा हुए थे. इनके पिता जी के पास थोड़ी-सी ज़मीन थी जिस पर खेती करके घर का गुज़र-बसर होता था, फिर भी दिनेश सर के पिताजी इन्हें किसी तरह स्कूल में पढ़ने भेजा करते थे.”

कार्यक्रम में उपस्थिति सभी लोग मुख्य अतिथि महोदय का भाषण बड़े ध्यान से सुन रहे थे. महोदय आगे कहने लगे, ‘‘दुर्भाग्य से किसी बीमारी के कारण दिनेश सर के पिता जी का देहान्त हो गया. अब सर के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं था कि वे पढ़ाई छोड़कर अपनी माता जी के साथ अपनी ज़मीन पर खेती करने का काम करें. पढ़ाई छोड़ने का फैसला करने के बाद जब दिनेश सर अपनी किताबें बेचने के लिए किताबों की एक दुकान पर गए, तो बातों-बातों में दुकानदार को किताबें बेचने की वजह मालूम पड़ गई. वह दुकानदार इतना भलामानस था कि उसने दिनेश सर से वादा किया कि वह उनकी स्कूल और कॉलेज की फीस तब तक भरता रहेगा, जब तक सर की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती. इस तरह उस दुकानदार की मदद से दिनेश सर की पढ़ाई हुई. इसी कारण दिनेश सर भी जितना हो सके, ग़रीब बच्चों की मदद करते हैं.”

मुख्य अतिथि महोदय के मुँह से यह सब सुनकर कार्यक्रम स्थल बड़ों और बच्चों की तालियों से गूँज उठा.

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अगले दिन यानी छह सितम्बर की सुबह के समय वही स्कूल बस स्कूल की तरफ जा रही थी. बस में बैठे बच्चों को जब रास्ते में दिनेश सर फुटपाथ पर पैदल चलते दिखाई दिए, तो कोई बच्चा उन पर नहीं हँसा, उलटा बच्चों के सिर दिनेश सर के सम्मान में झुक गए.

तभी मयंक कहने लगा, ‘‘दोस्तों, हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि दिनेश सर जैसे महान अध्यापक हमें पढ़ा रहे हैं.”

“बिल्कुल सही बात है.” राहुल ने मयंक की बात का समर्थन किया और फिर ज़ोर से नारा लगाया, ‘‘दिनेश सर की जय हो! ”

बस में बैठे दूसरे बच्चों ने भी यही नारा दोहराया. बच्चों की आवाज़ इतनी ऊँची थी कि उसे सड़क पर आते-जाते दूसरे लोगों के साथ-साथ दिनेश सर ने भी सुना. दिनेश सर ने मुस्कुराकर बच्चों की ओर देखते हुए अपना हाथ हिलाया और फिर दुगने उत्साह से स्कूल की ओर बढ़ने लगे.

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संक्षिप्त परिचय

नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी); पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 800 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

एक कविता संग्रह ‘अहसासों की परछाइयाँ’, एक कहानी संग्रह ‘खौलते पानी का भंवर’, एक ग़ज़ल संग्रह ‘ज़ख़्म दिल के’, एक लघुकथा संग्रह ‘ज़िंदगी ज़िंदगी’, एक बाल कथा संग्रह ‘ईमानदारी का स्वाद’, एक विज्ञान उपन्यास ‘दिल्ली से प्लूटो’ तथा तीन बाल कविता संग्रह ‘गुब्बारे जी’, ‘चाबी वाला बन्दर’ व ‘मम्मी-पापा की लड़ाई’ प्र‍काशित

एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित

प्रसारण लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार (क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994,

2001, 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) ‘जाह्नवी-टी.टी.’ कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) ‘किरचें’ नाटक पर साहित्य कला परिष्‍द (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) ‘केक’ कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) ‘गुब्बारे जी’ बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) ‘ईमानदारी का स्वाद’ बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) ‘कथादेश’ लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) ‘राष्‍ट्रधर्म’ की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2017 में व्यंग्य पुरस्कृत

(ञ) ‘राष्‍ट्रधर्म’ की कहानी प्रतियोगिता, 2018 में कहानी पुरस्कृत

(ट) ‘ज़िंदगी ज़िंदगी’लघुकथा संग्रह की पांडुलिपि पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान, 2018 प्राप्त

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त

पता 304, एम.एस.4 केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56, गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: बाल कहानी - एम. के. सर : हरीश कुमार ‘अमित’
बाल कहानी - एम. के. सर : हरीश कुमार ‘अमित’
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