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काव्य संग्रह - मुझे किनारे बैठ कर लहर गिनने का शौक नहीं - शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

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मुझे किनारे बैठ कर लहर गिनने का शौक नहीं                                     शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव कविताएँ- 81                           ...

मुझे किनारे बैठ कर लहर गिनने का शौक नहीं

 
                                 

शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

कविताएँ- 81


                                               1.
अभी
एक वाक्य को पढ़ते पढ़ते
मेरी चेतना थिर हो गई.

इतिहास की परिधि पर मँडराता
मेरा बोध
सहसा अभिकेंद्रित हो गया.

आज पहली बार मुझमें
कोई अँतर्दृष्टि कौंधी
और एक जीवंत प्रश्न का
जन्म हो गया.

उसकी संवेदना पर सवार होकर
एक टूटन (पिघलन)
मेरे पोरों में रिस गई.

अभी यह अहसास भी उभरा-
मेरी अंतःकाया में
जो खुजलाहट थी
वह प्रश्नों की भीड़ के
रेंगने की थी
जिसे मैंने
अंकुरण समझ लिया था.

प्रश्नों की खुजलाहट ने
मुझे गति दी अवश्य
पर उसकी जड़ों में
गहराई न होने से
मैं टकराता रहा
और हर टकराहट में
अभिकेंद्रण की टिमटिमाती प्रतीति
क्षणिका की तरह
एक-धागा राह दिखाती रही.

पर इसमें मेरा भटकाव ही टिका
वर्तमान की लंवेदना नहीं.

आचरण पर तो मैंने
बहुत ध्यान दिया
पर विचार में ही उसकी जड़ें हैं
यह अभी कौंधा.

इन जड़ों की गहराई में
मैंने कभी झाँका नहीं था
विस्मय
इसकी गहराई की प्रतीति से तो
हृदय धक से कर गया.            
                                          6-1-81
                          
                                                  2.
इस सामने पड़े दीए को
न मालूम
मैं कबसे देख रहा हूँ.

दीए की लौ
जब भी छोटी होती है
इसका अँधेरा
धुँधलाता है
इसकी लौ और अँधेरे की
आँख मिचौनी में 
इनकी सीमारेखा
घुली मिली होती है.

दीए की लौ
जब भी तेज होती है
इसका अँधेरा
गहराता है,
इसकी ज्योति और अँधेरे की
सीमारेखा
थोड़ी विवर्तित
पर साफ दिखती है.

इस क्षण मेरी चेतना
आँखों की टकटकी में
थिर होकर
एक अलग ही आयाम
बुनने लगी है,
सन्नाटे में पिघलती
प्रतीति-क्षणिकाओं से-
जो उजाले और अंधेरे के
सम्मिलन में निर्मित
सूक्ष्म अंतरालों में जीवन पाकर
परिपथ रच रही है
सहज अविच्छिन्न.

यह अंतराल
स्वतः निर्मित
एक सिचुएशन है, जिसमें
अँधेरे और उजाले के वर्तमान
रचते हैं
झीना, पर सरल, तारतम्यित.

कितना जीवंत
कितना अस्तित्वमय है
इस अंतराल में होना
जो धीरे से
सरक आया है
मेरे आत्यंतिक अँधेरे
और उजाले के बीच,
मेरे तनावों अंतर्द्वंद्वों को घुलाता
मेरे होने के बोध को
जगाता.

मैं जैसे स्वयं हो गया हूँ
वह अंतराल ही
द्वैध आयामों में प्रसरणशील
तटों की रुक्षता को पिघला कर
अंतर्प्रवाह के अवरुद्ध पलों को
अविरतता प्रदान कर.
                                                     29-1-81

                                                3.
मैं एक घाटी में
खड़ा था
घाटी के सौंदर्य को पीता
घाटी ही हो रहा था.

किस क्षण मेरी पलकें
उठीं, गिरीं,
कितने पल यह आदर्तन
जारी रहा
कुछ ठीक कह नहीं सकता.

हाँ, जिन भणों ने
मेरी घाटी और मेरे मैं को
अलग थलग किया
अब वे बीत रहे थे.

इस अलगाव के साथ ही
मेरे स्वरूप में
एक अंतराल रच गया
कुछ वैसे ही
जैसे कविता और
कवि-हृदय के बीच.

आज भी
मैं बीत रहा हूँ
उन्हीं अंतरालों के साथ
कोई स्रोतस्विनी
छू छू जाती है यदा कदा
दोनों पाटों को
पर मेरा मन और हृदय
अब भी अलग थलग हैं
सेतुहीन.                                    
                                                     18-2-81
                                             4.
आओ बैठो,
थोड़ी बातें करें.

हमारे अंतर्संबंधों में
जबसे दरार पड़ी है
मैं अलग थलग भले ही रहा
मुझमें जुड़ने के आवेग
उठते रहे हैं.

तुम्हारे तईँ क्या है
मैं नहीं जानता.

हाँ, जब कभी भी
हमारी राहों ने
किसी चौराहे पर
हमें जोड़ा है
तुम्हारी आँखों में भी
कुछ रेंगा है.

मैंने उसकी सरसराहट
झेली है.

फिर हमारी आँखें
समानांतर हो गई हैं
महज स्पर्श भर की दूरी पर
जो आज भी कायम है.

इस क्षण हमारी आँखें
मिट्टी कुरेद रही हैं
ये आँखें
कोई पेवंद नहीं हैं
हमारी त्वचा में.

इनकी जड़ें
हृदय की गहराइयों में हैं
जहाँ कुछ भी घटने की संवेदना
इनके डोरों में
तिरने लगती हैं.

मिट्टी कुरेदती पलकों का
यह आघूर्णन
कोई संप्रेषण है स्यात्
हृदय-तंतुओं का
जोड़ने को आतुर हैं जो
हमारी विच्छिन्नता को.

आओ, बैठो, थोड़ा सरल हो लें.                        21-2-81
                                              5.
मित्र!
तुम्हारे चेहरे की
बनती बिगड़ती
आकुंचित रेखाओं की उभरन
पढ़ते पढ़ते
मैं स्वयं
अपनी ही रेखाओं की
उभरन पढ़ने में
उत्सुक हो उठा हूँ.

तुम्हारी रेखाएँ तो
मेरे अनुभव में
नहीं समा पाईँ
पर मैं
अपनी रेखाओं के
जीवित संस्पर्श को
प्रतिपल
अनुभव करने लगा हूँ.

जबतक मैं तुझमें उत्सुक था
मैं अपने को भूल गया था
अब मैं
अपनी ही विकृतियों के कोढ़ को
हर पल झेल रहा हूँ.
वे सारी विकृतियाँ
वे सारी कुंठाएँ
संत्रास के समूचे क्षण
मुझमें जीवन पाए हुए हैं
और मेरे चेहरे को
बदरंग कर रहे हैं.

परिवेश के दर्पण में
मुझे साफ दीखता है
मेरा मन क्वाँरा नहीं
वह युगीन मनस्थितियों के
बलात्कार से अभिपीड़ित है.                          28-2-81

                                             6.
मैंने तुम्हें चुना
संख्या-बल दिया
पर तुमने
मुझे अपने बलाबल की
ईकाई नहीं माना.

तुमने ठोकरें दीं
मैं क्षुब्ध हुआ
तुम्हारे साथियों ने व्यंग्य कसा
“ ले लो अपना समर्थन वापस
पर इससे होगा क्या
हम तो इसे फिर ले लेंगे तुमसे.”

मैंने तुना
तर्क में रोजमर्रा थी
मगर मैंने सोचना नहीं छोड़ा.

समर्थन असमर्थन के बीच
अनुदोलन में
मैं तुम्हारे भीतर
झाँकता रहा
अपने स्नायुयों के आकंपन का
तटस्थ साक्षी बना
और आज मेरे अंतस्तल में
यह बोध उतर चुका है
मेरा जागरित इनकार
मेरे अस्तित्व का
आधार रखता हूँ
ठोस निष्कंप.

मुझे प्रतिपल
विपरीतता के य़बणों में भी
ठहर जाने की, जी लेने की
क्षमता मिलती है.
                                                            4-3-81

                                           7.
आज पहली बार मुझे
कोई झटका लगा
मेरा समूचा अस्तित्व
जड़ मूल से हिल उठा.

मैंने  सोचा था
डोलते क्षणों की ठोकरें
मैं झेल लूँगा
लोगों की नरम तलहत्थी का
सजल संस्पर्श
मेरा संबल होगा.

मगर ये हथेलियाँ
पंजा सिद्ध हुईँ
एक ऐसा पंजा
जिसका सहलाव
जकड़न की भूमिका थीं.

इसने अपनी जकड़न की ऐंठन
आखिर मेरी गर्दन पर
उभार ही  दिया.
                                                         10-3-81
                                               
                                                  8.
जब मैं सड़क पर निकला
वहाँ शोर शराबा था
पूछने पर पता चला
यह एक जुलूस है
जो भीड़ में बदल गई है.

मैंने गौर से देखा
यहाँ वे ही आकृतियाँ ईकट्ठी हैं
जो पिछले कई जुलूसों में
विभिन्न वर्गों की खंड-पीड़ाओं को
उभार कर
उनकी भीड़ को
भुनाती रही हैं.

आज फिर कोई वर्ग
उनके धंधे का शिकार हुआ है.

मुझे जाने क्या हो गया
जो विक्षिप्त होकर
उस भीड़ में दौड़ने लगा
कभी इस कभी उस टुकड़े को
पकड़ता हुआ
स्वयं की पहचान ढूँढ़ने लगा.

मगर मैंने देखा
टुकड़ों की भीड़ में
मैं पूरा का पूरा खो गया हूँ
मेरा चेहरा बदरंग हो गया है
टुड़ों के पेवंद से.

अपने ही प्रयासों की
भूल-भूलैया में उलझ कर
मैंने एक संत्रास ओढ़ लिया है.

इन चिपके पेवंदों में
न कोई संवाद है
न कोई अंतर्संबंध
मैं अब अंतरालों की विकृतियों का
नरक बोग रहा हूँ.                                                                    19-3-81
                                                  
                                                       9.
मेरे शरीर के खोल में
कहीं कोई सागर घुमड़ता है.

उनकी उत्ताल तरंगों का संस्पर्श
मुझमें पुलकन जगाता है.

कभी कदा
मेरा कोई पल
बीतते बीतते ठहर जाता है.

इस अंतर्पल में
मेरा मन और हृदय
सन्नाटा बुनने लगते हैं.

मगर हाय री बिडंबना
यह सन्नाटा
अबतक बुना नहीं जा सका.

हर बार
शाश्वत रचते रचते
रह गया.

मेरी अनुभूतिसंपन्न  प्रतीतियाँ
क्षणों के ठहराव से छिटक कर
उनकी बीतती धड़कनों को
गिनने लगी हैं.

अब अंतर्स्पर्श को आकुल
वह सागर
मेरे मन और हृदय के बीच
रेंगने लगा है
मगर रीता
बोध से अनभिषिक्त.                                    23-3-81

                                                           10.
हर रोज
वापस फेंक दिया जाता हूँ मैं
अपने ही ऊपर.
किनारों से चोट खाकर
आकुल लहरों की तरह.

मेरी स्थिति
ठीक एक द्वीप सी है
जिसका अकेलापन
अपने गिर्द
कुछ ठोस को चचोलता है.

पर शून्य से टकरा कर
वापस लौट लौट आता है
अपने खालों, अंतरावेगों की
पर्तों को मोटा करता
अपने अहसासों को गहराता,

मेरा अपना यथार्थ
मुझे काचने दौड़ता है.

मेरी प्रतीति के प्रतिफलन
विक्षिप्ति के छोरों तक
मुझे तोड़ते हैं.

मगर मेरी निजता में दबी ढँकी
कोई अनपहचानी उर्जा
इस कटुता को झेल लेती है
अकंपित.
थोड़ी देर के लिए
थोड़ी देर के लिए
मैं हो जाता हूँ असहज
पर मेरी अस्मिता
मेरी इयत्ता को टोकती है
और मुझे जीने की
एक खुराक मिल जाती है
अकुंठित.                                   31-3-81

                                                     11.
रोज की तरह
बिजली आज भी गुल रही.

आज उसकी अवधि
कई घंटों की थी.

अबतक मैंने
बहते विचारों की धारा में ही
अपना चेहरा देखा था
मगर आज कुछ कौंधा
और मेरी दृष्टि
पटरी से उतर गई.

मैंने देखा
रौशनी जाते ही
लूटों की बाढ़ आ गई
बलात्कारों की चीखें गूँज उठीं.

आखिर कहाँ छिपे थे
ये तत्व?

क्या रौशनी ने इन्हें
शरण दे रखा था
जिसे मौका देने की ताक में
अँधेरा घात लगाए बैठा था
या यह था अँधेरा का डाका
रौशनी के शीश महल में.                                   1-4-81

                                                     12.
मुझे खुद ही नहीं मालूम
अबतक मैं किससे
बातें करता रहा.

किन्हीं भावाकुल क्षणों में
शब्द हवा में उछल पड़ते-
कभी परंपरागत संस्कारों से
लदे-फदे
कभी नए की चोट से
बिलबिलाते.

अपने निजी क्षणों में
मैं अब भी बतियाता हूँ
शब्द अब भी उछलते हैं
पर अब वे
होने के संत्रास से
अभिपीड़ित हैं ,
कुंठा और संक्रांति के बीच
दोला.मान.

आज मेरे जीवित क्षणों का
यही दर्द है
संबोध्य की अनुपस्थिति में
प्रत्येक पल मेरा शब्दों में होना
मुझे अनुभव के यथार्थ से काटता है.

अब मेरी बातचीत
अपने से अपने के बीच होगी.

ओ री मेरी आत्यंतिक निजता!
तुम मेरी अनुभूति की साक्षी रहना.                                6-4-81

                                                         13.
हर अगले दिन
मेरे जिस्म में
कुछ समाता है.

कहीं कुछ पिघलता है
कहीं कोई ग्रंथि खुलती है
और कुछ क्षणॆं के एकांत में
मैं एक कदम सहज हो लेता हूँ.

अब मेरे हिस्सों का विस्थापन
थमने लगा है.

परिवेश का आहार
मेरे जोड़ों को ही नहीं तोड़ता
वरन उसके थोड़े भी अनुकंपन से
मेरा पूरा अस्तित्व झनझना
उठता है.

आहार का समावेशन
मेरे उर संपुटों में
कोई आविर्भाव जोड़ता है.

कुंठा, संत्रास, कुढ़न के पोरों में
मेरी कोई गरमाई समा कर
उसे तरलता की तरफ धकेलती है.

आभासों में डूबा यह अहसास
कभी कभी अपने वासंती झोंको से
मुझे आह्लादित कर जाता है.                                   8-4-81

                                                        14.
तुम्हारी गहराई में उतरना
एक अनुभव से गुजरना है.

मुझे भान है
होने की पीड़ा का अहसास
तभी साक्षात होगा.

तभी सृजन की अनुभूतियाँ
अस्तित्व के पोर पोर के
टुकड़े बोधों को
जोड़ कर समग्र बना सकेंगी.

गहराई में उतरने सिहरन
अपने स्वरूप से
मैं चखना चाहता हूँ.

मेरे हिस्सों में
उर्जा-खंडों से अभिपोषित
संवेदनाओं का असंपृक्त अंकुरण
रोज जलते बुझते हैं.

तुमसे जुड़ कर
जीवन बुनने के क्रम में
धागे तानते तानते
तुम्हारी दहलीजों पर
फिसल फिसल जाता हूँ.

कैसे ताने थे कबीर ने
झीने धागे
मेरे धागे तो टूट टूट जाते हैं.                                  16-4-81

                                               15
रोज रखता हूं
नींव की एक ईंट
पर नींव नहीं बनती.

वर्षों पहले
एक झीनी चादर बुनी गई थी
उसके धागे
नींव के पत्थरों में ही
बाँधे गए होंगे.

परिधि पर
मैंने बड़ी छलाँगें भरी हैं
धागे तानने के लिए
नींव की ईँट ढूँढ़ते ढूँढ़ते
कुंठाओं की दस्तकें झेली हैं
संत्रास के टुकड़े निकले हैं
पर परिवेश में
मेरे पाँव नहीं टिके.

स्थिरता की भाग दौड़ में
मैं थका हारा
मगर हाथ कुछ न आया.

अब तुम्हारे दरवाजे की तरफ
मुड़ा हूँ
पर यहाँ तो बड़ी फिसलन है
ईंटें फिसलती हैं
पाँव भी फिसलते हैं.

हाँ, इस वातावरण में
टिकने का अहसास अवश्य है.

मेरे हर प्रयास में
मेरे देह-अणु
कुछ ठोस आधार पाते हैं.

मैं पसीना पसीना हो उठा हूँ
मगर ललक ऐसी है कि
फिसलती ईंटों को
अनथक संभाल रहा हूँ.

यहाँ कुंठा नहीं
बस एक आतुरता है
उद्वेलन है.                                             18-4-81

                                                    16.
मेरी अनुभूति में
तुम्हारी टूटी प्रतीति ही
समाती है
तुम्हारे हर टुकड़े
छोरों की निरंतरता की
कथा कहते हैं.
टूटे पलों में भी
इन प्रतीति-खंडों में
किसी अँतर्व्याप्ति का
अहसास होता है.

आश्चर्य है
हर टकडें की केंद्रीयता
संपूर्णता के बिंब-प्रतिबिंबन का
आभास लिए है.

पर एक ही काया के
व्यक्तित्व-खंडों में
पूर्णाभासी इतने मूलों का होना
मेरे अनुभव में नहीं अँटता.

खंडों को पकड़ कर
गेंद की तरह उछालना, खेलना
सुविधाजनक है
पर रुचता नहीं.

सभी खंडों में
कोई अन्विति ढूँढ़ कर
पूरेपन को जीना
कष्ट साध्य है.

कुछ भी हो
मेरी यही ललक है
मेरी ललक अभी थकी नहीं है
वह तुम्हारे अनुभूति-संस्पर्शों को
झेल रही है.                                        28-5-81

                                                       17.
सागर में डुबकने में
एक रोमांचक आनंद है
तुम्हारी खूँटी का सहारा
काफी होगा.

इन आनंद के पलों में
ग्रंथियाँ ढीली होती हैं
कुंठा, संत्रास और तनाव की
ये ग्रंथियाँ
मेरी अस्मिता की परतों में
मेरी बुद्धि ने डाली है
जो अपने दृष्टि-विस्तार के
विस्मय-विस्फार में 
अपने उर्जा के स्रोतों को
भूल बैठी है.

सागर के आलोड़न में
मैं लहरों से उछली एक बूँद हूँ
मुझे उसके मरोड़ की पीड़ाओं को
झेलना ही होगा.

आखिर मेरे होने का भी
अपना यथार्थ है
तुम्हारी गहराई की अनुभूति
मेरे अपने यथार्थ को
जीवन के यथार्थ से जोड़ती है
लहरों के बीच पड़ी दरारों को
पाटती है.

हर बोध एवं अहसास को
अंतराभिव्यक्ति के लिए  
पार्थिव स्नायुओं में
प्रभाव-स्फुरण का संवेदित होना
जरूरी है.

मैं कायिक यथार्थों
और आंतरिक संपुंजन को
एक साथ
अनुभूति से जीना चाहता हूँ
तुम्हारी खूँटी का
आलंबन लिए.                                 29-5-81

                                                    18.
मैं कभी भी
एक लाश नहीं हुआ.

हमेशा
कोई न कोई स्वप्न-संकल्प
मुझे छेड़ते रहते हैं.
जब भी मेरी अस्मिता पर
चोटें हुई हैं
मैं प्रतिकार की फड़कन से
तिलमिला गया हूँ.

चुँकि मैं
किसी आंदोलनबाजी में
नहीं बहा
मुझे एक लाश समझ लिया गया.

कोई माने या न माने
अपनी तरफ हर बढ़ते हाथ को
मैंने टोका है
मेरे मौन दस्तक से
वे परीशान भले ही न हुए हों
शंकालु अवश्य हो उछे है.

मेरी गर्दन
उनकी जकड़न में भी
तनी रही है.

मैं अभीतक
मुखर भले ही न हुआ
अपनी नियति पर
ज्यों का त्यों टिका हूँ.

दरअसल इस दरम्यान
मैं अपनी पहचान के लिए
अपने उर्जा-स्रोत को टटोलता
रहा हूँ.

वस्तुतः
इस निर्विकार अवधि में
मैं अपनी अदाकारी की
भूमिका लिखता रहा हूँ.                                  30-5-81

                                                 19.
मैं क्यों चीखूँ.

इन चीलों ने
झपट्टा मारना नहीं छोड़ा
तो मैं बचना क्यों छोड़ूँ.

ये चीलें
जो हमारी तरफ बढ़ी हैं
हमारे व्यक्तित्व के
किसी कमजोर तंतु ने ही
इन्हें आमंत्रण दिया है.

इन्होंने सदियों से
अपनी आक्रामकता बनाए रखी
मगर हमने टोकना छोड़ दिया.

पर अब ऐसा नहीं होसकेगा
मैं टोकने की शक्ति बटोरूँगा
आवँश्यक नहीं कि मैं
किसी भीड़ का इंतजार करू
मेरा अकेला कदम
मेरा साथी होगा.

यदि मेरा प्रतिरोध टिक न सके
तो मेरे मरने काजीवट
उन्हें चुनौती देगा.

मेरे शव में भी
संघर्ष की निरंतरता का
आमंत्रण होगा कि
अगली लड़ाई
मेरी आने वाली पीढ़ियाँ लडें.                      31-5-81.

                                                      20.
अँधेरे की बारीक स्नायु  से
युक्त
रौशनी का पत्ता उगाता
यह दीपक
कदाचित अपने अस्तित्व के
काफी निकट है.

इस दीपक की अस्मिता
मेरे से मेल खाती है.
दीप-ज्योति की तरह
मेरा भी उत्स
अँधेरा ही है.

तम से ज्योति में गमन
मेरी उत्कंठा नहीं
ज्योति से तमस में उतरना
मेरी संकल्प-दृष्टि है.

क्योंकि तभी
अपनी पहचान के आलोक से
मैं भींग सकूँगा.

शायद तभी इस तथ्य का
अनुभवपूर्ण उद्घाटन हो
कि ये ज्योति-तम
जीवन-उर्जा के
अभिद्यक्ति-आयाम है.

प्रकट से अप्रकट में जाकर ही
शायद मैं
अपने मूल के बोध को
जी सकूँगा.                                                 4-6-81

                                                        21.
तुम्हारे दस्तकों के आमंत्रण
मेरी स्नायुओं में
अब भी अनुध्वनित है.

तुम्हारे मौन आह्वानों ने
एक एक कदम
मुझे अपनी तरफ खींचा है.

मेरे तुम्हारे अलगाव के पर्दे
तनाव के सहज होते क्षणों में
अपना अस्तित्व
खोते चले गए हैं.

इन भणों में मुझे ऐसा नहीं लगा
जैसे अंतरिक्ष के
दो अपरिचित अस्तित्व
एक संतुलन बिंदु की तरफ
सरकने की ओर हैं.

बस इतना ही लगा कि
ये प्रत्येक क्षण
मेरी पहचान के
भूले बिसरे क्षण हैं.
    
मैं प्रत्येक पल
अपने उर्जा-कुंड की ओर
जैसे अग्रसर हूँ.

मगर इन क्षणों को पाने में
कुछ परिचित आधार
छोड़ने पड़े हैं.

तट की तरफ अँटकी मेरी आँखें
अपनी पपनियों से
कुछ तिनके पकड़ रखी हैं.

तुम्हारी गहराई में
डुबकने के खतरों से
मैं अपरिचित हूँ
पर इन तिनकोंके छूटने से
उत्पन्न खतरे की भयावहता
अब भी बनी है.

मगर मुझे त्रिशंकु नहीं होना.

मैं स्वयं को अंतरिक्ष में उछाल कर
एक एक पल के जीवंत क्षणों को
जीने की तैयारी में लगा हूँ.

संकट के प्रत्येक पल तब
तुम्हारे साक्षात की अंतरंगता में
होंगे.                                                          20-6-81

                                                 
                                                22.
पानी की परतों से बनी
तुम्हारी झील की गहराई
एक दर्पण की गहराई सी है.

अपनी पहचान खोजने को
जब भी इस गहराई में डुबकता हूँ
हर बीतती परतों के बाद
मेरी देह
अपनी इयत्ता खोती जाती है
खोज का अहसास खोने लगता है
कुछ भूले बिसरे साक्षात का
स्नेही निमंत्रण
गहराता जाता है.

मगर अब भी मेरी स्मृति में
दीवार पर टँगा यह दर्पण
मेरी पहचान को टोकता है.

कई दफा सोच कर भी
मैं इसे तोड़ नहीं पाया.

एक की गहराई
मेरी सीमा तोड़ती है
किसी मूल की तरफ ईशारा करके
दूसरे का परावर्तन
सीमा को गहराता है
शैली, शिल्प, तेवर को
ज्यों का त्यों प्रक्षिप्त करके.

मैं एक दुविधा में हूँ
मेरी पहचान का सूत्र
सीमाओं का टूटना है
अथवा सीमाओं का गहराना?

जब सीमाएँ टूटती हैं
किसी अंतर्बोध
किसी आविर्भाव
किसी अंतःस्फुरण को
जन्म मिलता है
जिसमें मेरे पूरे अस्तित्व की
रस-निष्पत्ति होती-सी है
जब सीमाएँ गहराती हैं
मात्र एक प्रक्षेपक मिलता है
संघर्ष में कुचली या निखरी
एक दिक्काली ठोस आकृति का
जिसपर उभरी रेखाएँ
किस संवेदन का घात या प्रत्याघात हैं
पता नहीं चलता.

कभी कभी दीवार पर टँगे
इस दर्पण में
मेरी एक ही आकृति की
  अनेक नाट्य-मुद्राएँ
प्रक्षिप्त दिखती हैं
जो गहराते अहसासों के
अंतरालोड़ित पल
या कौतुक के क्षण
कुछ भी हो सकते हैं.

मूल तो बस एक ही हो सकता है
जिसपर अनेक ढाँचे खड़े हो सकते हैं
मेरी मौलिकता
इन आकृतियों में छिपी
कोई मूल आकृति है अथवा
मेरे इन तमाम क्षणों का
कोई तटस्थ अनुभवकर्ता
जिसकी इंगिति
तुम्हारी झील की गहराई में
अंतर्भेदित पर्तों के
उत्स की तरफ है.

चित्त में उपजे ये प्रश्न
अब मेरे अस्तित्व का रक्त
पीने लगे हैं.

उस प्रश्न के उभरते ही
मैं आपाद झनझना उठता हूँ.                               28-6-81

                                                             23.
जिस परिवेश से मैं घिरा हूँ
उसे मैंने
आँखें गड़ा गड़ा कर देखा है.

उसके चौराहे सेगुजरती
आकृतियों में
उलटे-सीधे, आड़े-तिरछे
अनेक चेहरे लटके दिखते हैं.

उनके पलों पर तिरते मंतव्यों में
बला की अराजकता है
विसंगतियों में भी
कोई संगति नहीं.

इसकी संस्थाओं के पेट चीर कर
जब भी मैंने अंदर टटोला है
वहाँ
पुरानी कहानी के
किसी राक्षस द्वारा लीला गया
एक पूरा संसार मिला है.

अनेक महत्कांक्षी  प्रवृत्तियाँ
कतारबद्ध, एक दूसरे से भिड़ीं
घात नगाए मंसूबों की किलेबंदी
दुम दबाई भीड़ों का
भीड़ से जन्मे प्रभुओं के प्रति
घुटनाटेक करारोपण, और
नैतिक दुर्गंधों का सुवास
वहाँ का पर्यावरण है.

मैं यह अनपेक्षित देख कर
तिलमिला उठा हूँ
शल्यक्रिया के दरम्यान.

इस तिलमिनाहट के दरम्यान
न मालूम कब मेरी दृष्टि
अपनी ही अनकश्चिति में सरक गई.

अब मैं
अपनी ही शल्यक्रिया में
तल्लीन हूँ.

मैं यह देख कर भौंचक हूँ कि
वह सारा कुछ
जो मैंनेअपने परिवेश में देखा
ज्यों का त्यों यहाँ भी मौजूद है.

कैसी विडंबना है
दीए की तली स्वयं अँधेरे में है
पर वह परिवेश के अँधेरे को
दूर ठेल रहा है.

वहाँ उस पेट का सिला जाना
अभी बाकी है
और यहाँ
मैं अपने चेहरे के भी
चीर-फाड़ में लग गया हूँ.

कहीं ऐसा न हो
मेरे चित्त का संतुलन बिगड़ जाए
और मैं
न घर का रहूँ न घाट का.                                     3-7-91

                                              24.
मेरी धमनियों में
रक्त की गरमाहट ने
अब करवट बदली है.

लोगों ने
बहुत सारे आंदोलन छेड़े
सामयिक उबालों में गोता खाते
वे सब बासी पड़ते गए.

समय के संदर्भ में
इनकी प्रासंगिकता
धमिल पड़ती चली गई.

बहुत सारी रगें
शून्य की थरथराहट में
उलझ कर
बिखराओं मेंभटकती गई.
आज परिवेश की रगों में
हर स्तर पर
बासीपन का रिसाव है.

मगर मेरी रगों में
अभी ताजगी है.

अपने गिर्द की उलझनों में
छलाँगे भर कर
उसकी कड़वाहट को
मैंने भरपूर पी है.

पर इस कोशिश में
स्वयं अपने आधार से
मैं कट गया हूँ.

रे लहू की उष्मा
अब हवा में न उड़ कर
अपनी जड़ें खोजने लगी हैं.

तुम्हारी गहराई में डूब कर
वह अपना थाह पाना चाहती है.

अंधड़ तूफान में
उसकी पत्तियाँ भले ही नुच जाएँ
जड़ों की अविच्छिन्नता
न हिले न थमे.      *

मेरे रक्त की गरमाहट
अब ऐसी कोंपलें  उगाने को
सर्जनाभिविष्ट है
जो विपरीतता की नियति
झेल कर भी
आकाश फोड़ कर
पर्यावरण में उत्क्रांति बोकर
पूरेपन की ताजगी लिए
अपने अस्तित्व को उरेह सके.                              21-7-81

                                              25.
हर आदमी की तरह
मेरा भी
अपना एक अंतरिक्ष
अपना एक सूरज है.

प्रतिपल
इनका गहराता अहसास
मेरी रुधिर नाड़ियों में
उष्ण लहू की ताजगी पिरोता है.

रोज के बासी पड़ते मुहिम
मेरे रंध्रों तक आकर
लौट जाते हैं.

मेरे पोरों में
मात्र पूरेपन का ही
स्वीकरण है.

असंपूर्णताओं के टुकड़े
मेरी अस्मिता में
पेवंद लगाते हैं.

पसरी किरणों के उत्स
सूरज तक की यात्रा में
जैसे अंतरिक्ष के अँधेरे से
गुजरना होता है.

मैं अपने होने के सूरज का
अनुभव जीने के लिए
अपने अंतरिक्ष के अँधेरे से
गुजर रहा हूँ.

मैं तम से रोशनी की तरफ नहीं
रोशनी से तम की तरफ
अग्रसर हूँ.

मेरा दैनिक अनुभव है
राख की परतों में छिपी
चिनगारी की अनुभवता
उसमें अग्नि-प्रवेश से ही मिलेगी
इसी में ताजगी का संदर्भ भी है.                                22-7-81
                                              26.
बहुतों ने
अपने लाल की लाली देखी
मुझे भी यह साध हो चली है.

अनुभवियों ने आगाह किया है
बूँदों को
अपनी अस्मिता तक
समुद्र की समाई में
खोनी पड़ती है.

यह नहीं कि मैं
जीवन-संघर्षों के
अंतर्बाह्य संघर्षों से कट कर
इस अनुभव-यात्रा में
शामिल होना चाहता हूँ.

अपने तमाम अंतर्बोधों
अंतर्विरोधों के साथ
मैं इस खतरे में
कूदने को तत्पर हूं.

मुझे भान है
घहराते प्रवाहों के थपेड़े
मेरे होने की परतों में
टिकाव जोड़ेंगे.

मैं कोशिकाओं की शव-यात्रा में
एक जुलूस बनने को तैयार नहीं.

मैं व्यष्टि की समाई में
समष्टि के समोने का.                                      22-7-81

                                                    27.
अपनी ही व्यष्टि के गिर्द
सन्नाटा बुनना
एक कठिन काम है.

जब भी मैंने यह कोशिश की है
बगुलों की चोंच में टिकी
लकड़ी पकड़े
कछुए की मनस्थिति को
मुझे झेलना पड़ा है.

मन के अंतरिक्ष में
मौन के बिखरे क्षमों को
चुन कर एकतान पिरोने में
मैं फिसलन की
सांघातिक कुढ़न से
बौखलाया हूँ.

ऐसी कितनी मनस्थितियों के
वर्तुल में प्रत्यावर्तित मेरा मैं
संस्कारों के बाँध तोड़ने में
चोट खाया है.

मगर कितनी अजीब है
मेरी कायिक और आत्मिक रचना
चोट की स्मृति लिए
मैं तुम्हारी आत्यंतिकता से
बलात टकराता रहा हूँ.

टकरा आज भी रहा हूँ.

तुम्हारे संस्पर्श की पुलकन ने
मुझे रोमांचित किया है.

मेरी स्नायुओं में उग आए
तनाव के क्षण   
आंदोलित हुए हैं
मगर उनका अभिदेशन
तुम्हारी केंद्रीयता की तरफ है.

तुम्हारी निगूढ़ता में
अपनी आत्यंतिक निजता की
मुझे भनक मिली है.

अपनी परिचिति के क्षणों को
मैं ठीक ठीक तोनहीं खोल सकता
मगर तुम्हारे गिर्द की
मेरी घुमड़न ने
मेरे अस्तित्व के गहराते सोर
और उठती ऊँचाई के टिकाव को
मेरे पोरों में ठूसा है.

अब मैंपरिधि पर छलांग लगाकर
अहसासों के जंगल में
बिखरे स्वरों को पकड़ने का
आकांक्षी नहीं.

तुम्हारी खाई से पिसल कर
अब मैं अनुभव की प्रगाढ़ताक
एक अणु से पीना चाहता हूँ
अब मैं रेखाओं सेअनुभव को नहीं
अनुभव से रेखाओंको खींचने का
आकांक्षी हूँ.                                               25-9-81

                                                      28.
यह अचानक
जो विद्युत कौंध गई
मेरे पोरों को
प्रगाढ़ कर गई.

अपने रंध्रों से मैं
परिवेश की आहट लेता हूँ.

मेरी प्रतीति की धड़कनें
मेरे अनुभव का सन्नाटा
बुनती है.

तुम्हारी घाटी के शिखर पर
मैं अकेला खड़ा हूँ
प्रतिपल
तटीय आकर्षण के
स्पंदितखतरों को
सिहरन के क्षणों में
डबबता उतराता.                                  25-9-81

                                                     28.
यह अचानक
जो विद्युत कौंध गई
मेरे पोरों को
प्रगाढ़ कर गई.

अपने रंध्रों से मैं
परिवेश की आहट लेता हूँ.

मेरी प्रतीति की धड़कनें
मेरे अनुभव का सन्नाटा
बुनती हैं.

तुम्हारी घाटी केशिखर पर
मैं अकेला खड़ा हूँ
प्रतिपल
तटीय आकर्षण के
स्पंदित खतरों को
सिहरन के क्षणों में
डूबता उतराता.                                        25-9 81

                                                  29.
बिंदु बिंदु अनुभव बटोर कर
मैंने एक व्यक्तित्व जोड़ा-
अनुभवक्षम, अनुभव समृद्ध.

ये अनुभव मैंने निचोड़े हैं
खंड अहसासों से
खंड अनुभूतियों से
जो जिंदगी के किन्हीं आवेगों
किन्हीं ठहरावों
किन्हीं टकरावों के क्षणों में
हासिल हुए हैं, प्रकंपित.

मैंने समझा था
ये निचुड़े अनुभव
मेरी अस्मिता के पोरों से रिस कर
मेरे अस्तित्व से एकतान हो चुके हैं
हालाँकि अकड़न की बोध-तिहरन
मुझे योकती थी.

सिहरन के गारों से
ये अनुभव की जुड़ी ईंटें
उस क्षण भहरा उठीं
जब तिनका-खरोंच से बिगड़ कर
रास्ते में पड़ा गेंहुअन
मुझ पर लपका.

हलाँकि मेरे हाथ का डंडा
अकस्मात उठ गया
और सर्प रुक भी गया
मगर मेरा शरीर कंपायमान था.

मुझे बोध नहीं
मेरे हाथ का डंडा कब तन गया
शायद वह मेरे शरीर की
अनिवार्य प्रतिक्रिया थी
चेतना से अलग
जो होनी ही थी.

मुझे तब इसका अहसास हुआ
जब देखा
सिहरते हाथों में
डंडा की बदलती करवट से
सर्प की भंगिमाएँ बदल रही हैं.

मेरे बटोर में
इस अनुभव का कोई टुरड़ा
शामिल नहीं था.

जिन अनुभवों को मैंने बटोरा था
उसमें
मेरी पूरी अस्मिता भी
शामिल नहीं थी.

इस क्षण मेरी
समूची अस्मिता
अस्तित्व के पोरों से
एक एक पल को पी रही है.

वह सर्प
अब भी पूँछ पर खड़ा
अविचलित पैंतरों को काटता
जीवंत अनुभूति-संस्पर्शों को
जगाता
वहीं पड़ा है.

मैं भी डंडा साधे
पल पल भृकुटि बदलते खतरा को
अपने होने के अणु अणु से पीता
उसके सीधे साक्षात्कार में
अभी भी संग्लग्न हूँ.

मैं सोचता जा रहा हूँ
इस छोटे से जीव में
अपनी अस्मिता की कितनी पकड़
अपने होने का कितना सजग
अहसास है
जो क्षणों के सीधे साक्षात्कार से
जुड़ा है.

एक मैं हूँ
जो लोक में बिखरे पलों से
उलझ कर
अनुभव बटोरता रहा
और जब जीवंत क्षणों से
सीधे मुलाकात हुई
तो पैर तले की मिट्टी
खिसक रही है.                                    6-10-81

                                                     30.
मेरे व्यक्तित्व में
पंक्ति से हट कर चलने की
अनुगूँज
पहले भी थी.

मगर तब
मेरी स्थिति अहजह की थी.

लीक से हट कर चलना
संकचापन्न पलों को
न्योता देना है.

मुझे लगता है
मेरे प्रतीति-क्षण
मेरे पोरों में रूपायित होकर
खतरे के जीवंत क्षणों को
न्योता देने के लिए
उत्सुक हैं.

मैं अब पंक्ति से हट कर
नई लीक पर चल पड़ा हूँ.

अपने संदर्भ हैं
अपनी बिडंबनाएँ हैं.

मेरे मानस-तंतुओं
मेरी हृदय-शिराओं में
मेरे हीमूल से समुद्भूत
रक्त-संचार की
अपनी गतिविधियाँ हैं
जो मेरे अस्तित्व के तट से प्रवहमान
निजी  बोध-स्पंदनों से संवलित है.

मेरी रचना के प्रत्येक तंतु
चतुर्दिक बहती हवाओं के
स्पंदनों को पीते है.

मैं इन कंपनों को
छंदबद्ध लय प्रदान कर
अपने अभिव्यक्ति-स्वरों को
निखारता हूँ.

अब मेरे पास
अहसासों का जंगल नहीं
अंतरिक्ष की अन्विति का संस्पर्श
अंतर्विकास का
स्वतःस्फूर्त स्पंदन
और संकल्प की सीढ़ी है.

यह समर्पण की बाँसुरी में
संगीत जगाती है.

मुझे कोई चलने दे
या न चलने दे
मैं पंक्ति से हट कर ही चलने का
प्रयत्न करूँगा.                                                       27-10-81

                                                   31.
तुम्हारी सोहबत में आने से पूर्व
मुझे भी यही लगा था
-कि आजादी
एक दुर्लभय वस्तु है
उसे पाने के लिए
दूसरों से जूझना पड़ता है
जंगलों, पहाड़ों की
खाक  छाननी पड़ती है.

-कि आजाबी एक माँग है
जो माँगी जा सकती है
जिसे जुलूसों में
तोला जा सकता है.

मगर नहीं
तुम्हारी निपट निजता में डूब कर
मैंने जाना कि
आजादी एक शान-चढ़ी तलवार है
जिसपर पैर रखे जाएँ
तो रक्त के फौब्बारे फूटते हैं.

चिड़िया ने कैसे समझ लिया
वह संत्रास के हर क्षण से
निरापद ही रहेगी.

पंख के जकड़े जाने की
संभावना से
कैसे उसने आँखें मूँद ली.

अगर उसके पंख
जकड़े बी गए
तो बँधे पंख की कुंठा
और संक्रमण संघर्ष की उत्तुंगता
दोनों में से एक को चुनने को
वह स्वतंत्र है.

वह संक्रमण-संघर्ष को ही
चुनने से
क्यों कतराए.

आजादी तो
मेघ-संकुल अतरिक्ष में
अस्तित्व के उनमुक्त उड़ान की
ऐतिहासिक अंतर्यात्रा बी है.

इतिहास के द्वंद्वों, अंतर्विरोधों से
लड़ कर
आजाद रहने की मनोनिर्मिति भी तो
आजादी का एक पहलू है.

नुक्कड़ का सिपाही
गालियाँ चबाता है, चबाने दें
पेट-फूली औरत
उधर ध्यान ही क्यों दे
वह पेट पुलाने को आजाद थी
तो वह उसे सँजोने को भी आजाद है.

भिखमंगेपन के लिए
आजादी की कोई अर्थवत्ता नहीं
जो बाजार में लुकाठी लिए खड़ा है
आजादी उसकी है.

संत्रास आएँगे
पत्थर चबाने पड़ेंगे
सृजन की पीड़ा कोई प्रसूति से पूछे
वह बच्चा जनने को आजाद है
पर संक्रमण-पीर के थपेड़े
उसे झेलने ही पड़ते हैं.

अब जंगल भाग कर
पत्थर चबाने से काम नहीं चलेगा.

अब सरे बाजार में
प्रतिरोधों की जकड़न में
अपने अंतर्लोक में
झाँकना होगा
हम अस्तित्व  कितने निकट हैं.

हमारे अस्तित्व के तट से ही
हमारी आजादी की धारा पूटती है.

हमने होना स्वीकारा है
तो होने की सार्वभौम स्वीकृति के लिए
संघर्षों के सातत्य की दुंदुभी
फूँकनी ही पड़ेगी.  *                                           27-10-81

*अयन पत्रिका के 22 वें अंक (जु-सि 82) में प्रकाशित.


                                                 32.
कभी कभी ऐसा लगा  है कि
मेरी जिंदगी
किश्तों में बँटी एक संकलन है
अनन्वित अनभिव्यक्त.

जब भी ऐसा ख्याल आया है
मैं टुकड़ों में
बँटता चला गया हूँ
छंद लय से रिक्त तालमेल हीन.

मेरे चेहरे पर
हठात उभर आने की होड़ड में
ये प्रतिद्वंद्वी टुकड़े
मेरा पुनः  पुनः संशोधन
करते रहे हैं
अपरिचय के क्षणों मेंडुबाते.

सतह की
असंपृक्त बिंदु-तरंगों के
समान ही
परस्पर टकराते ये टुकड़े
तनावों, कंठाओं के अंकुरण
मुझमें उगाते रहे हैं.

मगर अब
जबसे तुम्हारी निकट गहराई में
उतरता जा रहा हूँ
मेरे अणु अणु में
पलों के टिकाव जुड़ते जा रहे हैं.

सामयिक थपेड़ों की खरोंच तो
अब भी बाकी है
पर अब उनकी भूमिका
किसी रेखांकन की नहीं
मेरे पूरेपन के विखरावों के
अनुलयन की है.

अब मुझे स्पष्ट भान है
मैं संकलित किश्तों की
कोई संशोधित कृति नहीं.                                      29-10-81

                                                       33.
तुम्हारी मिट्टी में
मेरे होने के अंतर्वीज
छिंटे पड़े हैं.

मेरे प्रतीति-क्षणों में
इस बोध की तरंग-थिरकन
विस्फोट की अति तक
सिहरन उगाने लगी है.

हालाँकि अभीतक
कोई विस्पोट घटित नहीं हुआ
मगर
तुम्हारे कोरे काव्य से
सीधे साक्षात्कार की
स्वतःस्फूर्त आविर्भावी भूमिका
बनने लगी है.

मेरे पोरो में
इन प्रतीति-पलों का आवर्तन
विद्युतस्फुलिंग जगाता है.

अब मुझे लगता है
मेरे छंदों का तालमेल
तुम्हारे छंदों से हो सकेगा.

मैं इस कोशिश में हूँ
कि अपने छंदों की पहचान में
इतना गहरे डूब जाऊँ कि
उनकी रेखाएँ पकड़ते पकड़ते
अपने ही छंदों में
तुम्हें भी ढूँढ़ लूँ.                                        31-10-81

                                                 34.
अबतक मैंने प्रश्नों को माँजा है
पर अभी जो प्रशन मेरे सामने है
वहमुझे माँज रहा है.

प्रश्न है-
मैं इस सृष्टि के संदर्भ में हूँ
अथवा यह सृष्टि
मेरे संदर्भ में है.

थोड़ा केंद्राभिसारी संकुचन में
सिकोड़ कर दृष्टि पसारुँ
तो यह प्रश्न
यों कोंचता है-
फूल का होना
उपवन के संदर्भ में है
अथवा उपवन का होना
फूल के संदरअभ में.

यदि संदर्भ उपवन हो
तो फूलों की समाई घटती है
पंखुरियाँ सिकुड़ती हैं.

यदि संदर्भ फूल हो
तो उपवन का शिल्प
निखरता है
मस्तिष्क की संभावना
पसरती है.

आज मेरा होना
इतिहास की धारा में
एक पड़ाव पर है.

बहाव का हिस्सा होते हुए भी
इस पड़ाव पर
मैं थोड़ा ठिठका हूँ.

इस ठिठकन में
मेरे रंध्रों से टकराती संवेदनाएँ
मुझमें कुछ अहसास जगाती हैं.

यह बहाव मेरे संदर्भ में है
या मैं इस बहाव के संदर्भ में.

यह प्रश्न
मेरे पोरों में तरंगित
अंतरावेगों ने उभारा है
अगर मैं संदर्भ होऊँ
तो सृष्टि में मोड़ पैदा करना
मेरी क्षमता में जुड़ता है
सृष्टि में परिष्करण की
संभावनाएँ जुड़ती हैं.

अगर सृष्टि संदर्भ हो
तो मेरी क्षमताएँ सिकुड़ती हैं
उसके पोरों में फिट होने की
मुझमें मानसिकता जगाती हैं.

मुझे ये प्रशन
निरंतर माँज रहे हैं
किसी नतीजे पर पहुँचना
दुष्कर लगता है.

मगर हाँ,
इस मँजाव मेंटूटते जुड़ते
संवेदना-तारों की धड़कन का
मैं साक्षी हो रहा हूँ.                                         3-11-81

                                                        35.
वे अब भी मुझे को पंक्ति देने की
कोशिश में हैं
तुम मुझे पंक्ति को मत देना.

मुझे पंक्ति में डाल कर
वे मुझे इतिहास का संस्करण देंगे
मुझे आरोपण से इनकार है.

वे क्वाँरी कली को उपवन देंगे
उसे अंतरिक्ष का आमंत्रण चाहिए.

उनकी समाई में आकर
मेरी इयत्ता टूटती है
टूटे,
मगर मेरी क्षमताएँ
वहाँ कुंठित होती हैं
मुझे अपनी क्षमता की
पहचान चाहिए.
मैं पलायनवादी नहीं हूँ
जब प्रकृति ने
मेरे होने को स्वीकारा है
तो परिवेश के संघर्षों से
मुझे गुजरना ही है.

मैं किसी गिर्द की मर्जी को
नहीं छेड़ूँगा
पर अपनी मर्जी की
मिल्कियत को भी
नहीं छोड़ूँगा.

पंक्ति में आकर पंक्ति की मर्जी
झेलनी पड़ेगी
मैं अपनी आविर्भूत मर्जी
नहीं छोड़ने को.

अब त्याग में कोई रस नहीं
अपने होने, उनके होने के
स्वीकरण में
एक चुनौती है
इसमें जीवन की क्षमताएँ
दाँव पर चढ़ जाती हैं.

होने के पोर पोर में
अस्तित्व के बिखरे संतुलन
टटोल जाते हैं.
पंक्ति से हट कर ही
मेरी क्षमताएँ
खराद पर चढ़ सकती हैं.

मुझे पंक्ति से अलगाव का
संक्रमण चाहिए
उसके अहसासों, प्रतीतियों के खाद
मेरे होने की घोषणा करेंगे.                                       21-11-81

                                                         36.
मेरी अस्थि और त्वचा के
बीच की घाटियों में
तम्हारे संसरण की प्रतीति
अहसास के पलों में
कौंघ कर बुझ जाते हैं.

ये थोड़े से क्षण
मुझमें रोशनी का
आभास जगाते हैं
तुमसे जुड़ने के पड़ावों को
आलोकित करते.

लेकिन बुझे पलों में
रागों के कर्षण
मुझे छेड़ते हैं
मैं इन रिश्तों का क्या करुँ.

वीतराग होने से तो मैं रहा
विरागों की पीड़क परिस्थतियाँ
मुझे तोड़ती हैं.

तो क्या अपनी ही घाटियों में
उतरने के साथ
परिवेश की घाटियों में भी
कदम उतारने होंगे
किसी संतुलन की
बुनियाद चुनने को?

मेरे पोरों के स्पंदन
मेरे अनुभव-संदर्भों में
जीवन उकेरेंगे?

अपने स्तित्व के साक्षात्कार का
तब साक्षी हुआ जा सकेगा?

मेरी घाटियों में
उनकी आहट छेड़ती है
छेड़ेगी ही
मेरी आस्था के द्वार कहाँ खुलें?
क्या मुझे स्वयं ही
अपनी आस्था का द्वार खोलना होगा?                    14-12-81

                                                    37.
जब भी मैं
तुम्हारे निकट से गुजरा हूँ
तुम्हारे दीए की लौ
छलाँग लगाई है.

मेरी प्रतीति के क्षण
जिसमें अचानक मैं ठहर गया हूँ
इसकी रवाही देते हैं.

तुम्हारी लौ के कंपन को
मेरी बाती की नोक पर जमी धूल
उड़ाई है.

मगर ज्योति के
पोर पोर में उतरने से पूर्व ही
अंतरिक्ष की आँधियों ने
मेरी बाती को
लौ से दूर हटाया है
धूल की थोड़ी और पर्तों को
वासंती हवा से जड़ कर.

मेरी बाती भी
गजब की हठीली है
वह अंतराकर्षण के धुंध में भी
किसी अपरिचित अंतरावेग से
धकेली जाकर
बार बार उस लौ की ओर
ललचाई है.

आज भी वह ललक
गहराई भले ही न हो
पर पोरों की सीढ़ियाँ चढ़ती
लौ की समृद्धि से अचंभित है.

लौ के अकंपन ने
एक बार फिर
मेरे तारों को झनझनाया है
रोमों को खड़खड़ाया है.                                      16-12-81

                                                    38.
अनथक अपराजेय लड़ाकों को
भूशायी करने के लिए
यहाँ शिखंडियों के उपयोग हुए हैं.

उपयोग किए हैं
द्वापर के संपोषित भगवान
सतत आवर्तित चेतना की
परम घटना- कृष्ण ने
जो काल के आर पार
अनवद्य संक्रमशील हैं.

विरोध किया था अर्जुन ने
जो मित्र भी था , शिष्य भी
मगर गुरु की देशना के आगे
वह नतमुख था
पौरुष को उलाहना का
तोहफा देकर.

कृष्ण ने समझाया था
यह युक्ति है रणनीति है
द्वापर का युद्ध जीतने की
एक महत आयोजन में
राजनीति को जो भी स्वीकार है
वह धर्मानुकूल है.

द्वापर में भगवान का उपयोग
उँगली पर गिनी जा सकने वाली
ये शिखंडियाँ
समादृत थीं.

मगर आज
शिखंडियों की पंक्तियाँ खड़ी हैं
पर समादर खो चुकी हैं.

द्वापर की शिखंडी गर्वीली थी
उसे अपनी परिचिति स्वीकार थी
आज की शिखंडियाँ
आत्मविमोहित आत्मविस्मृत हैं.

इन्हें अपनी मूल पहचान से भी
इंकार है.

किसी विस्मरण में
ये पौरुष का लेबल लगा रखी हैं.

क्यों री शिखंडियों
आत्म-स्वीकरण की आग से गुजर कर
अपने अस्तित्व के से बहना
तुम्हें क्यों स्वीकार नहीं.

तुम्हारे लाख आयोजन के बाद भी
तुम्हारी अस्मिता एक प्रहसन है
कहीं संवृत कहीं निवृत.

फिर अपनी ही आग में गल कर
तुम खरा होना क्यों नहीं चाहती.

पर में आत्म-प्रक्षेपण ने
तुम्हें गौरव नहीं दिया
एक बार अपनी ही गहराई में
अपने को फेंक कर तो देखो.                               21-12-81

                                                      39.
मैं
तुम्हारी तरंगों में
छलांग लगाने की तैयारी में हूँ.
किनारे बैठ कर
लहर गिनने का मुझे शौक नहीं.

तुम्हारी गहराई की मात्रा में ही
उछलती उत्ताल तरंगों की निस्पंदता
मेरी त्वचा की घाटियों में
सिहरन उगाती हैं
मगर डराती नहीं.

तुम्हारी हर उठती गिरती
लहरों के साथ
मेरी आस्था को
नया आयाम मिलता है
और मेरे पोरों की संघर्ष-क्षमता
और गुरु हो जाती है.

मेरे दृष्टि-संपुटों में
तुम्हारे परिदृश्य की स्फुरणा
नाड़ियों से बह कर
मेरी अस्मिता को तोलती है.

मेरे अहसासों के जंगल में
तुम्हारी तरंग-थिरकन
कदम कदम पर शून्य बुनती है
और न जाने कब
मेरी अपनी ही अनुभूति की
एक आधारळिला चुन जाती है.
हलाँकि इसका चुना जाना
तब महसूस होता है
जब मेरे तंत्र में
कोई छंद करवट लेता है.

मेरा अपना कोई
निरूपित छंद नहीं है
कुछ टूटे छंदों की अनुध्वनन
जो मेरी संवेदना में
जलते बुझते आविर्भावों की
प्रसूत होती हैं
मेरी रगों में रेंगती हैं अवश्य
मगर उनकी संधि-कड़ियाँ
भूली सी हैं.

इन तिरोहित कड़ियों के प्रति
मैं आकर्षित हूँ
यह कर्षण ही
मेरी संभावनाओं केपर उगाता है
और मैं अपनी यात्रा के
चरण-निक्षेपों में
बल का अनुभव करता हूँ.

मैं पाता हूँ
आकाश में उड़ानें भरने की
मेरी कांक्षाएँ
ठोस धरती की स्पर्श-संवेदना से
मेरा संबंध जोड़े रखी हैं.
तुमसे जुड़ा न होकर भी
कोई न कोई झीना संबंध-सेतु
मेरे तुम्हारे बीच बुना पड़ा है
मुझे लगता है
मेरा अंतरिक्ष
तुम्हारी ही रचना का
कोई विस्फोट है.                                  31-12-81

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