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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 386 // अपने-पराए // अनिता मंदिलवार "सपना"

प्रविष्टि क्रमांक - 386

अनिता मंदिलवार "सपना"

अपने-पराए

      ."माँ जी", आप आ गई, बहुत-बहुत स्वागत है आपके अपने घर में । आपको आने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई । रीता ने बहुत आत्मीयता से अपनी सास को संबोधित किया ।

नहीं, बहू । संक्षिप्त सा उतर था माँ का ।

मुन्ना कहाँ है ? प्यार से अपने बेटे रोहित के बारे में पूछा । बहू ! बहुत याद करता होगा न मुझे ।

हाँ माँ जी,

अब कहती भी क्या वह ! रोहित तो कभी माँ का जिक्र नहीं करता ।

जब रोहित ने रीता से प्रेम विवाह किया था तो माँ जी ने बहुत विरोध किया था और कहा था कि तुम दोनों का कभी मुँह न देखूँगी । अपनी बेटी दामाद के पास रहने चली गयी थी ।

वहाँ बेटी सीमा तो बहुत ख़्याल रखती थी पर दामाद की बातों से अक़्सर ये एहसास होता कि ये घर उसका नहीं है ।

एक दिन जमाई बाबू ने सीमा को कहा -माँ जी कब तक यहाँ रहेंगीं । पूरी उम्र यहीं गुजारने का इरादा है क्या ?

अब माँ कहाँ जाएँगी, भाई-भाभी से नाराज है । अब मैं क्या कह सकती हूँ । सीमा ने मायूसी से जवाब दिया ।

परदे की ओट से माँ ने सब सुन लिया । आँखों के कोरों में अश्रु छिपाए आगे बढ़ गयी । उसी शाम बेटे रोहित के पास रहने चल दी ।

रीता ने जिस तरह आत्मीयता से स्वागत किया । माँ को इसकी उम्मीद कतई न थी ।

          "आ गए बेटा"

शाम को रोहित के घर वापसी पर माँ ने कहा

              "हाँ "

आपको कोई तकलीफ तो नहीं हुई न । पूछते हुए कमरे की तरफ बढ़ गया ।

कमरे में पहुँचते ही रीता ने कहा कि माँ जी जबसे आई है आपको ही पूछ रही हैं।

हूँ । कितने दिन रहेंगी । पूछ लो । रोहित का जवाब था ।

कितने दिन मतलब ?

अब हमेशा यहीं रहेंगी । असली घर तो उनका यही है रोहित । अब मैं उन्हें कहीं जाने न दूंगी । वो हमारी भी तो माँ हैं ।

रोहित के पीछे जाते हुए माँ ने सब सुन लिया ।

आज वह सोचने पर विवश थी कि अपना कौन है और पराया कौन !

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✏--- अनिता मंदिलवार "सपना"

अंबिकापुर सरगुजा छतीसगढ़

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