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कहानी - नन्हे कदम - वन्दना पुणतांबेकर

"ॐ"

इस शहर में आये हुये नीलिमा को अभी एक महीना ही हुआ था। नये लोग ,नई जगह सब कुछ अंजाना सा था। यहाँ कम्पनी की और से उन्हें एक फ्लैट मिला था। नीलिमा की शादी को अभी दो साल ही हुए थे। पूरा महीना उसे घर व्यवस्थित करने में ही लग गया। यहाँ बस सेकेंड फ्लोर की सीमा से ही थोड़ी बहुत पहचान हुई थी। सीमा के दो बच्चे थे। रोहित छः साल का ओर मनु अभी दो साल की। सीमा का सारा दिन घर के काम मे ही चला जाता,सभी अपने-अपने घरों में रहते। नीलिमा यही सोच कर घर का काम धीरे-धीरे करती । सौरभ के चले जाने के बाद सारा दिन क्या करे। जॉब करना चाहती थी। सौरभ ने अभी एक साल रुकने को कहा था।

कहां "पहले अच्छी तरह से सेट हो जाओ,रास्ते आदि की पहचान कर लो,फिर जॉब तो करनी ही है,"अभी तो तुम आराम करो नीलू, वह प्यार से नीलिमा को नीलू ही पुकारता ।

सीमा को भी इसका नाम नीलू ही मालूम था। अब दोनों की थोड़ी बहुत जान- पहचान हो गई थी। चार बजे की चाय कभी सीमा के यहाँ तो कभी नीलू के यहाँ। अब कभी मार्केट जाना होता तो नीलू सीमा के ही साथ जाती। और रास्तों जगहों की जानकारी लेती।

उनकी मल्टी एक गिलयारे के बाद अंदर जाकर बनी थी। सारी स्कूल बसे बाहर ही रूकती। अंदर सिर्फ कारों के आने जाने के लिए ही बिल्डरों ने जगह छोड़ी थी। सभी बच्चों को बाहर रोड तक पैदल ही जाना पड़ता। सीमा रोहित जो छोड़ने तो जाती , तब तक मनु सोई रहती।

सीमा के पति को जल्दी निकल ना रहता।

नीलू सारा दिन घर मे अकेली रहती,सीमा का सारा दिन घर के काम में ही निकल जाता। रोज दोपहर बारह बजे बस रोहित को गली के बाहर उतार देती। उसी समय नीलू का भी कपड़े सूखने का समय रहता। वह अक्सर बारह से एक बजे के बीच बालकनी में ही रहती। वह रोज रोहित को स्कूल से आते देखती। रोहित थोड़ा ग़ुस्से वाला व शरारती बच्चा था। वह रोज स्कूल से आते समय गली के कुत्तों को पत्थर उठा -उठा कर मरता,ओर मजे लेते -लेते घर आता। एक बजे तक घर पहुँचता। अब यह उसका रोज का ही रूटीन हो गया था।

नीलू उसे रोज बालकनी से कुत्तों को पत्थर मारते देखती। कुत्ते बिचारे कभी इस गाड़ी ने नीचे कभी किसी घर के पीछे भागते नजर आते ,नीलिमा उसकी इस आदत से तंग आ चुकी थी।

लिफ्ट से निकलते समय कई बार उसे समझने की कोशिश करती ,कभी प्यार से तो कभी डाटकर लेकिन रोहित को उसकी बातों का कोई असर नहीं होता,वह नीलिमा को बहुत घूर घूर कर देखता।

एक दिन चाय पीने वह सीमा के यहां बैठी थी। उसका मन नहीं हो रहा था। कि सीमा से रोहित की शिकायत करे। लेकिन नीलू से रह नहीं गया। नीलू ने सीमा से कहाँ..,"सीमा एक बात कहूं,?

"हॉ बोल न इतना सँकोच क्यों कर रही है। ,बता न,

"देख रोहित अभी बहुत छोटा है, मगर उसे हमें ही समझना होगा। कि सड़क के कुत्तों को इस कदर पत्थर ना मारा करे,कभी काट लिया तो ?, रोहित वही बैठा खेल रहा था। नीलू की शिकायत उसे अच्छी नहीं लगी। वह उसे अजीब नजरों से घूर रहा था। जैसे अभी उठकर उसे नोच ही लेगा।

लेकिन सीमा ने नीलू की बात को मजाक में लेकर हँसकर कहा,"हाँ मुझे मालूम है, में इसे लेने नहीं जा पाती हूँ न,इसीलिए खेलते-खेलते आता है। वह नीलू की बातों को अनसुना कर चाय बनाने चली गई। रोहित की आंखों में क्रोध साफ नजर आ रहा था।

अब तो नीलू उसे एक आँख नहीं सुहाती थी। अब वह उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई थी।

वह वापस घर आ गई उसे सीमा की बात अच्छी नहीं लगी। बच्चों को सही गलत का ज्ञान हम नहीं तो और कौन दिखाएगा। यही सोच नीलू अपने घर आ गई।

रोज का वही रूटीन चालू था। अब तो रोहित के तेवर और भी गर्म हो गए थे। जैसे ही वह नीलू को बालकनी में देखता ओर जोर से खींच,खींच कर कुत्तों को पत्थर मरता। उसे यह बात पता चल गई थी। कि मम्मी को मालूम है, पर वह डांटती नहीं है।

सीमा मनु की देखभाल में ही लगी रहती। रोहित बहुत ही बेपरवाह ओर गुस्सेल हो गया था। वह था तो सात साल का पर तेवर सोलह साल के लड़के से कम नहीं थे।

देखते ही देखते चार महीने गुजर गये। अब नीलू ने सोचा कि मुझे ही कुछ करना होगा। वार्ना रोहित बड़ा होकर बिगड़ जायेगा।

नीलू ने अपना रूटीन चेंज किया । जब रोहित की बस आती तब नीलू बासी रोटी ओर ब्रेड के टुकड़े लेकर नीचे खड़ी हो जाती। सभी कुत्तों को अपने पास बुलाकर रोटी व ब्रेड खिलाती।

अब उस समय सारे कुत्ते वहां एकत्रित होने लगे। अब यह उनका खाने का समय था।

अब बिचारा रोहित लड़खड़ाते कदमों से पीठ पर दो किलो का भारी बेग लादकर थका हारा घर आता। अब उसे वहां कोई डॉग नहीं मिलता। नीलू आँटी अब सभी को खाना खिलाती थी।

वह गलियारा उसे अब बोर ओर थका देने वाला लगता। कुछ दिनों बाद क्रिसमस की छुट्टियाँ लग गई,सर्दी ने भी अपना रंग दिखाना चालू कर दिया था।

रोहित अब सारा दिन बोर होने लगा था । अब सीमा के सारे काम छत पर ही होने लगे थे। इन दिनों नीलू के बालकनी में भी धूप नहीं आती थी । तो उसे भी कपड़े सुखाने छत पर जाना पड़ता।

दोपहर को जब नीलू छत पर कपड़े सुखाने गई । तो वहाँ रोहित ओर मनु खेल रहे थे। नीलू को छत पर देखकर रोहित के तेवर बदल गए थे। नीलू ने रोहित को आवाज दी,

"रोहित इधर आओ में तुम्हें कुछ दिखती हूं,ओर मुंडेर पर झुकने का नाटक करने लगी।

वह दौड़कर नीलू के पास आया, नीलू ने उसे पकड़ा ओर उसके दोनों गाल जोर से प्यार से खींचने लगी। रोहित को नीलू का यह व्यवहार बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। वह एकदम चीख पड़ा।

"क्या करते हो आँटी,लगती नहीं है, क्या ?

"अरे तेरे गाल इतने गोलू,मोलू से है,मुझे गुच्ची काटने में बड़ा मजा आया,तो क्या आप अपने मजे के लिए मुझे गुच्ची कटोगी क्या ?लगती नहीं है, क्या ? रोहित एक दम चींखकर बोला।

"तू भी तो रोज अपने मजे के लिए कुत्तों को खींच-खींच कर पत्थर मरता है,उन्हें भी तो लगती हैं, न, मैंने तो तुझे प्यार से गुच्ची काटी, कभी सोचा है, तूने उनके बारे में। रोहित के गाल लाल हो चुके थे। उसकी आँखों मे आंसू आ गये। वह भागता हुआ, नीचे चला गया। छुट्टियाँ समाप्त हो चुकी थी। नया साल शुरू हो चुका था। सभी बच्चे स्कूल जाने लगे थे। बसों के हॉर्न की आवाजें आने लगी थी। नीलू रोज उन कुत्तों को खाना खिलाती,रोहित रोज नीलू को खाना खिलाते हुए देखता था।

दो तीन दिन से नीलू उसे दिखाई नहीं दी। उसी समय कुत्ते भी उसका इंतजार करते। रोहित ने सोचा की आंटी आजकल दिखाई क्यों नहीं देती है। उस दिन रोहित का मन नहीं माना वह स्कूल से आते समय नीलू को नीचे से आवाज देने लगा ।

नीलू को दो-तीन दिन से बुखार था। नीलू घर पर ही अकेली थी, सौरव भी टूर पर गए थे। सीमा ने उसे दलिया खिचड़ी बनाकर दे दी थी। यह बात रोहित को मालूम ही नहीं थी। वह जोर जोर से चिल्ला रहा था। "नीलू आंटी ,नीलू आंटी, नीलू से रहा नहीं गया, वह बाहर आकर नीचे देखने लगी। नीचे रोहित खड़ा पुकार रहा था। "क्या है? आंटी नीचे आओ ना, बेटा मेरी तबीयत ठीक नहीं है। तुम ही ऊपर आ जाओ। मगर रोहित मचलने लगा पैर पटकने लगा। नहीं आप ही आ जाओ नीलू को रोहित का मन तोड़ना अच्छा नहीं लगा आती हूं तू वहीं रुक, रोहित का इस तरह मचलना नीलू के दिल को छू गया। लाईट नहीं थी । लिफ्ट बंद थी वह धीरे धीरे नीचे आई, क्या बात है? रोहित मुझे यहां क्यों बुलाया आंटी आजकल आप दिखाई नहीं दे रहे हो, आप डॉगी को खाना क्यों नहीं दे रहे हो मासूमियत भरे मन से रोहित ने पूछा।

" बेटा मेरी तबीयत ठीक नहीं है, जब ठीक हो जाएगी तो खिला दूंगी। यह पूछने के लिए मुझे नीचे बुलाया, मुझे कितना बुखार है, शर्म नहीं आती बड़ों से इस कदर मजाक करते हैं। नीलू रोहित पर चीख पड़ी। रोहित ने नीलू की आंखों में प्यार से देखा बड़े ही मासूमियत के साथ बोला एक काम था, इसीलिए आपको आवाज दी। गुस्से से चीख पड़ी नीलू क्या काम था?,

"आंटी आप मेरे बैग की चेन खोल दो ना प्लीज, "क्या है इसमें कितना वजन है ,कितने पत्थर भरकर लाया है। इन 2 दिनों में खूब पत्थर मारे होंगे तूने है ना, नीलू गुस्से से बोली जा रही थी। और बैग की चेन खोल रही थी। "ले खोल दी तेरी बेग की चैन जा ऊपर जा, मम्मी इंतजार कर रही होगी," हां हां चला जाऊंगा, पहले मेरा एक काम तो कर दो," अब क्या तेरे बेग के पत्थर निकाल कर कुत्तों को मारू," नहीं आंटी नहीं बड़े ही मासूमियत से रोहित ने कहा।

तो क्या? नीलू ने पूछा ,"आप मुझे टिफिन निकाल कर दे दो मेरा हाथ नहीं पहुंच रहा है । बैग भारी है, घर आकर मम्मी निकालती है मेरा बैग ,और स्कूल में मिस निकाल देती है,ना इसीलिए, नीलू टिफिन निकाल कर देती है, " क्या है इसमें ? बड़ी बड़ी आंखें करके रोहित बड़े प्यार से नीलू को देखता है। कहता है। " इसमें पराठे हैं, सुबह मम्मी ने मुझे दिए थे । " तो खाए क्यों नहीं?

आपने 2 दिन से डॉगी को खाना नहीं खिलाया ना इसलिए, आज मैं अपना टिफिन बचाकर डॉगी के लिए लाया हूं, हम उनको साथ खाना खिलाएंगे ।

क्योंकि आप को देखे बिना डॉगी आएंगे ही नहीं ना इसलिए, मैंने आप को आवाज दी सॉरी आंटी। रोहित की बातों से नीलू की आंखें भर आई उसके प्यार से रोहित को सीने से लगा लिया। ,

" सॉरी रोहित,

"आप क्यों रो रही हो आंटी, आप रो रही हो मुझे क्यो सॉरी कह रहे हो ,रोहित कुछ समझ नहीं पाया। "अभी आपको गुस्से में उल्टा सीधा कहा ना इसलिए, चलो हम डॉगी को खाना खिलाते हैं।

दोनों ने मिलकर डॉगी को खाना खिलाया।

रोहित को लेकर वह सीढ़ियों से ऊपर जा रही थी । लिफ्ट बंद थी, नीलू ने एक हाथ में रोहित का बैग और रोहित का हाथ थाम कर सीढ़ियां चढ़ रही थी। वह नन्हे-नन्हे कदमों से सीढ़ियां चढ़ रहा था । शायद थक चुका था। तीसरा माला जो चढ़ना था । नीलू को आज रोहित पर बहुत प्यार आ रहा था। वह उसे बहुत ही प्यारा लग रहा था। उसके नन्हे कदमों को बड़े प्यार से देख रही थी। उसे बुखार था, फिर भी उसने रोहित को गोद में उठा उठा लिया।

और सीढ़ियां चढ़ने लगी। रोहित एकदम मचल गया । "नहीं आंटी ,आप मुझे नीचे उतार दो ,आपकी तबीयत ठीक नहीं है। सेकंड फ्लोर आते-आते लाइट आ चुकी थी । रोहित और नीलू लिफ्ट से थर्ड फ्लोर पर आ गए,

" बाय आंटी करते हुए रोहित ने अपने घर की डोर बेल बजा दी। नीलू दरवाजा खोल कर अंदर गई सोचने लगी । हम चाहे तो अपने बच्चों को बचपन से ही सही राह दिखा सकते हैं। उनके नन्हे कदम हम ही सही राह पर मोड़ सकते हैं । कोई भी इंसान बुरा नहीं होता, उसे बचपन से ही सही मार्गदर्शन नहीं मिलता, इसीलिए समाज में अपराधों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है । हमें ही इन नन्हे कदमों को सही दिशा देनी होगी। आज उसे एहसास हो चुका था। कि गुस्से वाला रोहित आज बड़ा ही प्यारा रोहित बन चुका था। उसने भी उसके प्यार को महसूस किया था । यही सोच कर उसे अपनी जीत की खुशी महसूस हुई, और वह मुस्कुरा उठी।

वंदना पुणतांबेकर

इंदौर

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