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निःस्तब्ध करके चले गए (लघु कथा ) - सुशील शर्मा

सुशील कुमार शर्मा


दरवाजे की घंटी बजी ट्रिन- ट्रिन -ट्रिन
वसुधा ने दरवाजा खोला
सामने पोस्टमैन खड़ा था "मैडम जी रजिस्ट्री "
वसुधा ने हस्ताक्षर करके रजिस्ट्री ली जैसे ही उसने प्रेषक का नाम देखा उसकी त्योरियां चढ़ गई ,उसपर उसके पति आनंद का नाम अंकित था जिसको वो करीब छह माह  पहले तलाक दे चुकी थी.
"मम्मी किसका पत्र है " वसुधा की बड़ी बेटी निमिषा ने पूछा।
किसी का नहीं वसुधा ने पत्र को लापरवाही से रद्दी की टोकरी में फेंका।
दोपहर तक वसुधा के मन में अपनी पुरानी जिंदगी को लेकर कड़वाहट भरी रही उसे याद आता रहा किस तरह उसे अपनी जान से ज्यादा चाहने वाला आनंद दूसरी औरत के  चक्कर में अपने परिवार को छोड़ कर चला गया किस तरह उसने कोर्ट में बेइज़्ज़त कर  तलाक लिया।
वसुधा के मन में उत्कंठा हुई रात को उसने डस्टबिन से पत्र  निकाल कर खोला।
पत्र में लिखा था
प्रिय वसुधा
क्षमा कर देना
जब तुम ये पत्र पढ़ रही होगी तब तक मैं इस दुनिया को छोड़ कर जा चुका होऊंगा ,आज से एक साल पहले मुझे डॉ ने बता दिया था कि अब मई शायद ही बचूंगा क्योंकि मुझे ब्लड कैंसर है ,तुम्हें नहीं बताया क्योंकि तुम्हें बताता तो सारा परिवार अस्तव्यस्त होता करोड़ों रूपये खर्च होते बच्चों का भविष्य अन्धकार मय होता इसलिए मैंने तुमसे दूर होने का फैसला कर लिया मोहनी मेरी बहुत अच्छी दोस्त है बस इसके अलावा कुछ नहीं।
मैंने अपनी सारी  प्रापर्टी एवं पैसा तुम्हारे नाम कर दिया है अब तुम बच्चों को अच्छे से शिक्षा देकर उनकी सारी जिम्मेवारी निवाह सकती हो ,ये सरे कागजात तुम्हें भेज रहा हूँ। मैंने तुम्हारा दिल दुखाया माफ़ी के लायक तो नहीं लेकिन हो सके तो माफ़ कर देना।
वसुधा अवाक थी उसके आँखों से झर झर आंसू बह रहे थे।
अगले दिन जब वसुधा हॉस्पिटल में पहुंची तो मोहनी उसका इंतज़ार कर रही थी ,वसुधा उससे लिपट कर रोने लगी।
वसुधा मुझे माफ़ कर दो ,आनंद ने मुझे मजबूर कर दिया था उसकी अंतिम इच्छा के कारण मैं चुपचाप रही "मोहनी ने रोते हुए कहा।
"नहीं मोहनी माफ़ी तो मुझे तुमसे मांगनी चाहिए कि मैं अपने पति को न समझ पायी 'वसुधा ने मोहनी को गले लगाया।
वसुधा एक टक मृत आनंद का चेहरा देख रही थी उसके मुंह से एक ही वाक्य निकला "तुम्हें सरप्राइज़ देने की आदत थी आखिर निःस्तब्ध करके चले गए "

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