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प्रमोद पाण्डेय की 5 ग़ज़लें

         ग़ज़लें
    1
कत्लेआम के तो  महज अभी रुझान है ।
होगा कुछ भी नहीं क्योंकि महीना अभी रमज़ान है ।।

सियासतों ने कचरा कर दिया मजहबों का वरना,
सबको पता है,रामायण माँ और मौसी कुरान है ।

माँ की खिदमत से बड़ी कोई इबादत नहीं ,
वरना मुझे भी सुनाई देती ये अज़ान है ।

चेहरा देखकर मेरा क़िरदार पे मत जाओ ,
  ये गिरते आँसू तो मेरे आंखों की मुस्कान है ।

गले लगाकर बड़ी बेरहमी से खंजर घोंप दिया,
ये तो आज के दौर के दोस्तों की पहचान है ।

जीत के आखिरी लम्हों तक उसे उलझा के रखा,
हमारी हार से तो दुश्मन भी परेशान है ।

हम चुप है,तो हमें बुजदिल मत समझो ,
ये खामोशी ही हमारा तर्जुमान है ।

दुश्मन तो रूबरू हुआ नहीं जंगे मैदान में,
लगता है अब तो ये जंग खुद ही के बनाम है ।

उसने कहा था कभी मेरा जिक्र न करना,
उसके बिना तभी तो ये मेरा कोरा दीवान है ।।

  2

उसकी फितरत में अब भी कोई सुधार नहीं ।
गले लगके कहती मुझे तुमसे प्यार नहीं ।।

लोग ठीक से उतरे नहीं हैं मोहब्बत के भँवर में,
वरना इसके जैसी तो कोई मंझधार नहीं ।

मेरा कलाम उसके जीने के अंदाज़ में शामिल था,
अब कहती है कि मेरी कलम में कोई धार नहीं ।

कल शब मैंने अपनी शमशीर की सारी जंग छुटा दी,
अब मुझपे किसी की कोई दुश्मनी उधार नहीं ।

मैं पुख्ता सबूत लेके पहुँचूंगा तो भी हार जाऊंगा ,
उसके दर पे मेरी दलीलों का कोई आधार नहीं ।

कभी सरमाया बनाती है ,कभी तगाफुल करती है,
मेरी महबूबा के प्यार की भी कोई मेयार नहीं ।

जो बिना डरे कागजों पे पूरी हकीकत लिख दे ,
ऐसा तो इस देश में अभी तक कोई अखबार नहीं ।

  3

उससे बिछड़े एक हफ्ता हो गया पता ही ना चला ।
  इश्क कितना सस्ता हो गया पता ही ना चला ।।

एक दिन वो हमें कोहनी मरके क्या निकली ,
  वह दिन इतना अच्छा निकला इसका पता ही ना चला ।

उस पगडंडी पर एक कदम चलना दुश्वार होता था,
  कब वहाँ पे शीशों का रास्ता हो गया पता ही ना चला ।

    जिस फल की मिठास पूरी दुनिया में मशहूर थी,
  वह फल कैसे इतना खट्टा हो गया पता ही ना चला ।

जो कभी एक दूसरे पर जान देने की बात करते थे ,
कब उसकी कराबत में खड्डा हो गया पता ही ना चला ।

जिसने राखी बांधी तुमने उसी को बेआबरु कर दिया,
ये धागा कितना कच्चा हो गया पता ही न चला ।।

4

अमीरे शहर की आजकल आसमां पर निगरानी बहुत है ।
यह सब देख मछलियों की आंखों में है हैरानी बहुत है ।।

मुफलिसी और बेवफाई दोनों ने मिलकर कमर तोड़ दी,
वरना आजमाइशों को अभी हमने जबानी बहुत है ।

उसे गैरों के संग देखकर भी हमने माफ कर दिया ,
तुम्हारे इस आशिक में कुछ बातें खानदानी बहुत हैं ।

महज किस्सा सुनते ही सब बेतहाशा होने लगे,
वरना अभी इस किस्से की कहानी बहुत है ।

पूरी महफिल व्हाट्सएप, फेसबुक में उलझी रही ,
वरना उस शायर की ग़ज़लें रूमानी बहुत है।

अभी तो बस हम जन्नत की रेकी करने जा रहे हैं,
  यहां फिर से लौटेंगे अभी हमने बाकी की जिंदगानी बहुत है।

   5

वो आज होली के दिन मेरा इंतजार करती होगी ।
  इन सतरंगी रंगों में वो मेरा दीदार करती होगी ।।

ना जाने आज उसके गालों पे कितने रंग लगे होंगे ,
पर आज मेरी याद में अपनी आंखें गुलाल करती होगी ।

उसकी यादें मेरी तन्हाईयों से मेरे लिये सरगोशी करके,
मैं आज कहां हूं कैसा हूं कुछ तो सवाल करती होगी ।

कभी मैंने भी उसके हसीन गालों पर लगाया था रंग,
  ये तस्वीर देख रंगीन माहौल में खुद को बेहाल करती होगी ।

सुना है की अब वह किसी शहजादे के संग बहुत खुश है,
पर आज का दिन तो वो मेरे लिए दुश्वार करती होगी ।

होली से न जाने कितनी यादें जुड़ी हैं हम दोनों की ,
आज के दिन सिर्फ मुझसे और मुझसे प्यार करती होगी ।

उसी के लिये मैं मुद्दतों से मुन्तज़िर बनके बैठा हूँ पर,
आज होली के इस पर्व पर वो मेरा भी इंतज़ार करती होगी ।
            
                        प्रमोद पाण्डेय

नाम- प्रमोद पाण्डेय
जन्म तिथि- 28 अगस्त 1993
शिक्षा- स्नातक बी. ई. (ई.सी.)
वर्तमान में माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में
एम.एस. सी. (फ़िल्म प्रोडक्शन ) में अध्यनरत

सम्मान- अखिल भारतीय साहित्य परिषद (इकाई-विराटनगर ) के द्वारा
साहित्य सारथी पुरुस्कार से 2018 में सम्मानित

  अनेक पत्र -पत्रिकाओं में कहानी,लघु कथाओं का प्रकाशन ,पेपरों में स्वतंत्र रूप से लेख लेखन,भारतीय सिनेमा में गीत, कथा,पठकथा और संवाद लिखने में प्रयासरत ।

पता
ग्राम - सूरजपुरा ,पोस्ट- कुमराइ
तहसील- गढ़ाकोटा ,जिला - सागर (म.प्र. )
पिन कोड- 470232

ईमेल- pramodpp0835@gmail.com

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