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व्यंग्य - अधिकारी विधाताय भवः - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

अधिकारी विधाताय भवः

पहले हमारा विचार था कि 'अतिथि देवो भवः' की तर्ज पर 'अधिकारी देवो भवः' लिख कर सबको ,खास तौर पर अपने अधिकारी को चकित ,हर्षित और विस्मित कर सकेंगे। लेकिन अब महसूस हुआ है कि वह हमारा निरा 'बौड़मपना' था।

अधिकारी की तुलना देव से नहीं की जासकती। देवों का क्या ,जरा फूल पत्ते और प्रसाद चढ़ाया ,भोग लगाया , "भाव-कुभाव अनख आलसहू" स्तुति बोलते हुए अगरबत्ती जलाकर चारों ओर घुमाई और देवता प्रसन्न।

अरे हाँ....देवताओं के प्रसन्न होने की बात से याद आया कि शिवजी बड़े विचित्र देव हैं ,'आशुतोष' हैं। उनके 'आशुतोषपने' से ब्रह्माजी भी उकता गए कि यह क्या ,शिवजी तो जरा नाम लेने पर ही प्रसन्न हो जाते हैं और लोगों का उद्धार कर देते हैं। ब्रह्मा जी आखिर पार्वती को अपना दुखड़ा सुनाते हैं कि हे भवानी तुम्हारा पति तो बावला हो गया है। अरे जिनके भाग्य में कभी कोई सुख था ही नहीं ,उन्हें स्वर्ग भेजते भेजते मैं तो तंग आ गया हूँ।"

( "बावरो रावरो नाह भवानी

..जिनके भाग्य लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निशानी ,

तिन रंकनि कौं 'नाक' सँवारत हों आयौ नकबानी।" )

सो राम भजो। जो आसानी से प्रसन्न हो जाए वह कैसा अधिकारी !! नाराज होना और जब तक मन चाहे, नाराज बने रह कर अपने मातहत को बेचैन बनाए रखना तो अधिकारी होने का पहला प्रमाण है और मौलिक अधिकार भी।

अधिकार से याद आया कि अधिकारी के अधिकार तो अनन्त हैं। राई को पर्वत और पर्वत को राई कर सकने जितने।

वे अपने 'मूड' के अनुसार (मनोदशानुसार) ही अपने कर्मचारी से व्यवहार करने के लिये पूर्ण स्वतन्त्र हैं . लेकिन ,'वह मूड हमेशा कर्मचारी के विचार-व्यवहार से तय होता है' --अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है। अधिकारी का 'मूड' तो अपने आप ही जाने कब किस वायुमण्डल से शिरीष की तरह ( बकौल आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी) 'रस' खींच लेता है और कर्मचारी पर उँडेल देता है।

वह रस तीखा भी हो सकता है और कड़वा ,कसैला या खट्टा भी . ( मधुर रस तो उसी तरह दुर्लभ होता है जैसे टी.वी. चैनल्स पर किसी स्तरीय धारावाहिक या फिल्म का प्रसारण )।

अच्छे मूड में अधिकारी आपको हाथी पर भी बिठा सकता है, पर इसके लिये खुश होने की कतई जरूरत नहीं है क्योंकि कब आपकी जगह हाथी के पाँव तले होगी किसी को कुछ पता नहीं।

मतलब कि कर्मचारी की डोर पूरी तरह अधिकारी के हाथ में होती है। वह जब चाहे आपको कठपुतली की तरह नचा सकता है . कुत्तों की तरह दुत्कार सकता है . अच्छा काम करने के बाद भी आपको अयोग्य ठहरा सकता हैं। किसी भी मुद्दे पर आपसे स्पष्टीकरण माँग सकता है। सी.आर. खराब कर सकता है। पाँच मिनट की देर के लिये पूरे दिन का वेतन काट सकता है। और सवाल करने पर आप पर कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही भी कर सकता है। और हाँ ,बहुत ही आवश्यक छुट्टी के लिये भी दो टूक मना कर सकता है।

जी हाँ छुट्टियाँ आपको शासन द्वारा दी गईं हैं और छुट्टी लेना आपका अधिकार है ,ऐसा सोचने की भूल, भूल कर भी न कर बैठें क्योंकि छुट्टी आपको अधिकारी की मर्जी के बिना हरगिज नहीं मिल सकतीं। फिर आपकी बेटी हास्पिटल में भर्ती हो या बड़ी प्रतीक्षा के बाद आपको किसी पर्वतीय स्थान पर भ्रमण करने का अवसर मिला हो ,अगर अधिकारी की दृष्टि बंकिम है तो मन मार कर रह जाने के अलावा आपके पास कोई चारा नहीं।

ज्यादा 'रिक्वेस्ट' करने पर आपको यह भी सुनना पड़ सकता है कि ---

"क्या आपको मालूम नहीं कि सरकारी नौकरी चौबीसों घंटे की होती है ?".

कि "अरे जितना कमा रहे हो उतना तो निभाओ नौकरी से वफादारी करो।"

कि "ना छुट्टी अभी तो नहीं मिलेगी।"

कि "अच्छा ,अभी दिमाग मत खाओ बाद में आना।"

और सावधान, अगर अधिकारी कुपित हो गया तो आपकी मौजूदगी में ही आपको गैरहाजिर मान सकता है। और बाकायदा वेतन काट सकता है।

कुछ समझे कि इससे निष्कर्ष क्या निकला ?

यही न कि 'नौन तेल लकड़ी' की तिकड़म में अधिकारी की भूमिका किसी विधाता से कम नहीं है। इसलिये बन्धु ! अगर चैन से नौकरी करनी है तो अधिकारी को जैसे भी बन सके अनुकूल बना कर रखो। अपनी हड्डियों को नरम और लचीली बनाओ। खास तौर पर रीढ़ की हड्डी को।

हालांकि जैसा पहले ही कहा है कि अधिकारी को अनुकूल रखना देवाराधन जैसा आसान बिल्कुल नहीं है। आपकी पूजा अर्चना ठुकराई भी जा सकती है फिर भी अपने बॅास के सामने 'छोटा बने जो ,वो हरि पाए ' का ही शाश्वत भाव रखो। देर-अबेर पर्वत पिघलेगा ही इस सकारात्मक दृष्टि को धुँधली मत पड़ने दो और अपने बॅास को सदा "प्रनतपाल भगवन्ता" (तुलसीदास) मानो। याद रहे कि हर छोटा-बड़ा अधिकारी मौलिक रूप से 'प्रनत-पाल' ही होता है। (यह बात अलग है कि कुछ तो अपने 'प्रनत' को भी धराशायी करने से नहीं चूकते .पर यह आपके याद रखने की बात हरगिज नहीं है )

और हाँ अधिकारी के लिये 'तन मन धन सब तेरा ,.तेरा तुझके अर्पण ' जैसा समर्पण भाव भी अनिवार्य है।

याद रहे , अगर सेवा सफल होगई तो फिर आप निर्विघ्न नौकरी कर सकते हैं। अधिकारी के अलावा कोई 'ऐरा गैरा नत्थू खैरा' आपकी ओर वक्रदृष्टि नहीं फेंक सकता। गारंटी है एक सौ एक परसेंट।

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ

मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,

ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)

2 टिप्पणियाँ

  1. हार्दिक बधाई गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी ! आपने आज समाज में अधिकारियों द्वारा जो कुछ हो रहा है अपने आलेख में कुशलता के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की है | मैं ज्यादा कुछ नकहते हुए आचार्य हजारी प्रसाद जी के वाक्य 'रास खींच लेता है और उसे कर्मचारियों पर उदल देता हैँ ' मेरा मानना है कि यह वाक्य आदरणीय आचार्य जी के समय की बात हो सकती है क्यों कि रचनाकार अपने समय की काल परिस्थिति ,समय में घटने वाले सभी विन्दुओं को अपने साहित्य में उकेरने का कार्य करता है | आज काल परिस्थिति में बहुत परिवर्तन बेसक हुआ दिखने लगा है | फिर भी अधिकारियों की कारगुजारी जग जाहिर होती समाज को दिखती नजर आने लगी है | आये दिन कोई न कोई रेंज हाथ पकड़कर हवालात में भेजने के बाद भी कुछ अधिकारी सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे हैं ऐसा क्यों और कैसे हो रहा यह तो वे ही बता सकते हैं अथवा जागरूक जनता | हम यहाँ बधाई देते हुए इतना ही कहेंगे कि " वह रस खीचकर थोथा कूड़े की भाँती कर्मचारी को परोस देता है "| जिसे लिए कर्मचारी ना हाँ और न नहीं करने की हिम्मत जुटा पाता |

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  2. रचना को ध्यान से पढ़ने और अपने अमूल्य विचार देने का आभार .

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