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लघु कथा- फ़र्क़ - डॉ परवीन महमूद

भाई ने दो साड़ियों को दिखाते हुए कहा दीदी एक साड़ी आपके लिए है। और एक साड़ी आपकी होने बाली भाभी के लिये है। अभी कुछ दिन पहले ही उसकी सगाई हुई थी आज वो उससे मिलने जा रहा था । मैंने हाथ  पोंछते हुए जैसे ही साड़ियों को खोला ही था कि भाई ने पीछे से आकर दोनों साड़ियों की तरफ इशारा करते हुए कहा दीदी ये आपके लिए है और ये उनके लिए है। उस वक़्त मुझे भाई के प्यार में फ़र्क़ समझ में आ गया था। क्योंकि दोनों साड़ियों के दाम में बहुत फ़र्क़ था ये मेरा वही भाई था। जिसे मैंने माँ की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया था। बचपन में खिलौनों की जगह  छोटे भाई बहन मिले थे खेलने के लिए।

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