370010869858007
Loading...

अविनाश ब्यौहार के नवगीत

नवगीत

भावनाओं का रूप
ले लिया
व्हाट्स एप ने!

चैटिंग से सब
बातें होतीं!
हिचक हिचक
गलबहियाँ रोतीं!!

गपशप से नाता
तुड़वाया
व्हाट्स एप ने!

नदिया की
पावनता खोई!
जार जार
नदिया है रोई!!

द्वारे द्वारे नदिया
ला दीं
आज टैप ने!
000000000

नवगीत

हम ठहरे
ईमान के टट्टू
उनके वारे न्यारे हैं!

खींच खाँचकर
जेब भरेंगे!
दुनिया से वे
नहीं डरेंगे!!

बेईमान की
जय बोले जो
वे अफसर को प्यारे हैं!

ब्यवहारिकता जरा
नहीं है!
लेन देन में
खरा नहीं है!!

काम उचक्के
की माफिक है
दिन में दिखते तारे हैं!
0000000000

नवगीत

कोलाहल भीड़ का
हो गया
पर्यस्त है!

निकलती सायरन
बजाती गाड़ी!
एक पक्ष है
बंद पड़ी दिहाड़ी!!

गली औ नुक्कड़ में
वर्दियों की
गश्त है!

अगरचे बाड़ खेत
को है खाये!
और बाग हाँथ
से छूटा जाये!!

डरा डरा मानव है
चुप्पी का
दश्त है!
00000000000

नवगीत

पूरब में
दिनकर मुस्काया,
भोर हुई!

आँगन में
गौरइया चहकी!
चलती हुई हवा
है महकी!!

खेतों ने हल
गले लगाया,
भोर हुई!

पगडंडी है
राहगीर हैं!
बरगद-पीपल
बहुत धीर हैं!!

फूलों पर शवाब
है छाया,
भोर हुई!
0000000000

नवगीत

नटखट सी
ॠतुऐं हैं
जाड़ा सुवेल!

सर्द सर्द
रातें हैं!
फूलों सी
बातें हैं!!

ठंड भी
ठिठुरती है
पूष को झेल!

झर रहा
तुषार है!
यौवन का
भार है!!

ओस से
धुली हुई
पिठवन की बेल!

00000000000

नवगीत

कुहरे में
डूब गये
सिहराते वन!

दिन फिरे हैं
कंबल औ
रजाई के!
स्वप्न साकार
ऊन के
सलाई के!!

साँझ लपेटे शाल
कर रही
है पूजन!

चना का होरा
औ मटर
की फल्लियाँ!
होंगी अनाज
के बोरों
की छल्लियाँ!!

करता है
कौंड़ा ही
ठंड का शमन!


00000000000

नवगीत

खड़े हुये हैं
लाइन में पर
सर्वर डाउन है!

लिपिक रहा
भौंहें सिकोड़ता!
प्यून भी इधर
उधर दौड़ता!!

नदी किनारे
बसा हुआ
छोटा सा टाउन है!

दफ्तर में रहती
भीड़ भाड़!
बात है बनती
तिल का ताड़!!

खड़ा हुआ हर
शख्स वहाँ पर
लगता क्लाउन है!

00000000000

नवगीत

नव वर्ष की डाल में
दिन का फूल खिला!

नव संवत्सर के
स्वागत में खुश घड़ियाँ!
खून से लथपथ
भोर न हो, न गड़बड़ियाँ!!

तिथि पत्रों-पंचांग को
अब शुभ लगन मिला!

तौबा है शिकवा शिकायतें
भूलों से!
पेंग बढ़ायेंगे सावन के
झूलों से!!

हो ख्वाबों का आँख में
अटूट सिलसिला!
000000000

नवगीत

पूष को
सूर्य किरण
रही है
बुहार!

जाड़े में
हैं जम गईं
रातें!
कंबल ऊनी
शाल के
नाते!

बाग में
मंडराते
अलि की
गुहार!

है पहाड़ों
पर कोहरा
घना!
पारा लुड़का
मौसम
अनमना!

खिल रहे
फूलों की
सूर्य को
जुहार!
0000000000000

नवगीत

ठंड की ऋतु का
अवसान हो गया।

सर्द हवा,
कुहरा है।
जाड़ा तो
दुहरा है।।

बस कुछ दिन का
मेहमान हो गया।

स्वागतम
ऋतुराज का।
सप्त स्वर में
साज का।।

फूलों का शर औ
कमान हो गया।
0000000000

नवगीत

पराये दुख दर्द भी
संलग्न हो गये।

कष्टों ने तिनके से
घोंसला बनाया।
पीड़ा का एक शहर,
कोलाहल छाया।।

आदमकद आईने तक
भग्न हो गये।

ऋतुओं का ही
पतझर भी
एक रूप है।
छाया थी जहाँ,
वहाँ कटखनी धूप है।।

मधुऋतु में हैं आम्रकुंज
मग्न हो गये।

00000000000

नवगीत-चले गुलेल

हो गया है
थाने का
अपराधी से मेल।

उजाले का
खून हो गया।
पहरु अफलातून
हो गया।।

जीवन लगता
है मानो
शतरंज का खेल।

कलियाँ हैं
रौंदी बाग में।
पड़ते हैं
छाले राग में।।

आहत करती
बतकही
जैसे चले गुलेल।

000000000000

नवगीतः गुलों की छाँव

बाग में
पड़ रहे हैं
तितली के पाँव!

फूलों में हैं
खुशबुऐं
आकर बसी!
बबूल की है
बाग से
रस्साकसी!!

तैरता है
हवा में
सपनों का गाँव!

बागों में
खिंचा है
गन्ध का वितान!
अलि की
गुंजन का
है कोई विधान!!

महकती है
जास्मिन सी
गुलों की छाँव!


000000000000

नवगीत

अफसर-बाबू
में साँठ गाँठ!

योजनायें सब
हैं लंबित!
बदअमली
महिमा मंडित!!

उन्हें बुके है
हमको डाँट!

सबसे बड़ा
रुपैया है!
घूसखोर
खेवैया है!!

हुई दफ्तर में
बँदर बाँट!
00000000000

नवगीत

कृष्ण पक्ष का,
शुक्ल पक्ष है।

फलीभूत
होती आशाऐं।
निष्फल होती
हैं कुंठाऐं।।

खुला झरोखा,
वही कक्ष है।

भाग्य हुआ
सूरज चमकीला।
रुंधा हुआ था
तार कंटीला।।

वो नौसुखुआ
आज दक्ष है।
00000000000

नवगीत

जाड़े औ
गर्मी में
फूले मदार!

शिव जी को
चढ़ते हैं
विल्व पत्र,
आक!
जिनकी कृपा
से तो मनशा
है चाक़!!

मंद मंद
पूर्व से
बहती बयार!

फैले चतुर्दिक
हैं कटुता
के जाल!
लोकतंत्र की
धेनु हाँक
रहे ग्वाल!!

खंड खंड
बँटा हुआ
है ये दयार!
000000000000

नवगीत

लंबे हैं
झूठ के साए!

थाना
कोर्ट
कचहरी है!
अंधी
गूंगी
बहरी है!!

जन गण मन
कौन अब गाए!

हाँथ कटे
कानून के!
नेह रख दिया
भून के!!

दुराचार
पंख फैलाए!


-000000000000

नवगीत

मंडराते खतरे
ज्यों चील
औ कौआ!

कतर ब्योंत है
आपसदारी में!
पूरे मौके हैं
रंगदारी में!!

जहरीले नाते हैं
मानो अकौआ!

छीना झपटी
फैशन हो गई!
मेल मिलाप
नागफनी बो गई!!

आदमी लगने लगा
है कोई हौआ!
00000000000

नवगीत

लौस
रेहन
में है!

कामना है
प्रवासी!
चाल सब
है सियासी!!

कल्ला
बेहन
में है!

तमस करे
है तर्जन!
किरन के
लिए वर्जन!!

रोष
जेहन
में है!
000000000000

नवगीत

उम्मीद पर करने लगी
संवेदना हस्ताक्षर।

हैं ख्वाब आँखों के
पखेरू हो गये।
विश्वास के पर्वत
सुमेरू हो गये।।

आशा अंगूठा छाप थी
अब हो गई है साक्षर।

पल्लव को हरियाली
रही है दुलार।
छलक पड़ा ऋतुओं का
मौसम से प्यार।।

चमकीले हैं मोती जैसे
चौपाई के अक्षर।
0000000000

नवगीत

रिश्वत लगती
है जूठन।

दुष्टों में
सन्यास दिखा।
आँसू ढुलके
हास दिखा।।

नैतिकता में
क्यों टूटन।

मानवता अब
घायल है।
बटमारी तो
कायल है।।

हट्टे कट्टे
हड़फूटन।
0000000000

नवगीत

लोग करुणा हीन हैं
मानो मवेशी!

बन्द हुआ लोगों का
आपस में भेंटना!
आजकल का रिवाज
है रुपैया ऐंठना!!

छोड़कर दो चार घर
पड़ रही पेशी!

घने वृक्षों सा हैअपराध
फल फूल रहा!
जो आपादमस्तक था
वो अब धूल रहा!!

आयातित की पूंछ
घूरे में देशी!
000000000

नवगीत

सूरज ने
धूप से कहा
मौसम रंगीन
हो गया।

अब चलने लगी हैं
चुलबुली हवाऐं।
आपस में पेड़
जाने क्या बतियायें।।

मधुप जो है
फूल पर झुका
जुर्म संगीन
हो गया।

रोज रोज होती
पुनर्नवा भोर है।
झलका सन्नाटे में
कोई शोर है।।

ऋतुओं का आलम
है कि पतझर
दीन हीन
हो गया।
0000000000

नवगीत

रहजन ही बना
खेवैया है।

करता है
तमस बरजोरी।
मेघ करे
धूप की चोरी।।

उधार के बदले
सवैया है।

बबूल बचे हैं
फूल गए।
बादल बरसना
भूल गए।।

हुआ अब बेकार
रवैया है।

कुप्रथाओं से
उपजा सोग।
क्या करते
मुट्ठी भर लोग।।

सब कुछ अफसर को
मुहैया है।

सपनों ने
सन्यास ओढ़ा।
पड़े बुरे वक्त
का कोड़ा।।

केंचुली को बीन
बजैया है।
0000000000

नवगीत

जीवन
आपाधापी है!

अलापेंगे
अपनी राग!
हुई ब्यर्थ की
दौड़ भाग!!

वैभवशाली
पापी है!

चुप अखबारों
की सुर्खी!
खुशियों की
होती कुर्की!!

यार हुआ
संतापी है!
0000000000

नवगीत

बाहर कदमों
की आहट!

खुला जंगला
भोर हुई!
प्रेयस् हुआ
हिलोर हुई!!

कुत्तों की
है गुर्राहट!

किरण दरीचे
से झाँके!
धूप दोपहर
को टाँके!!

सख्ती में
है नरमाहट!
000000000000

गीत

इतनें प्रदेश हैं
कश्मीर हो गया!

देश का एक
अंग नहीं है!
फागुन है पर
चंग नहीं है!!

पुष्पहार ढलकर
जंजीर हो गया!

लंबी है भय
की परछाँई!
बिना कान की
जन सुनवाई!!

वस्त्र की जरूरत है
छीर हो गया!
-00000000000


अविनाश ब्यौहार
जबलपुर

कविता 7628364272028518042

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव