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पुस्तक समीक्षा - रिश्तों की बुनियाद - लेखक : डाक्टर श्री संजय दानी

पुस्तक समीक्षा

रिश्तों की बुनियाद

लेखक  : डाक्टर श्री संजय दानी

विमोचन : 4 फरवरी 2019

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन अमीन पारा चौक पुरानी बस्ती रायपुर

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लेखक परिचय : डा. श्री संजय दानी ,नाक कान गला रोग विशेषज्ञ हैं | प्रेक्टिस के बाद के समय को वे साहित्य लेखन में व्यतीत करते हैं | वे गजलकर ,कथाकार और उपन्यासकार की हैसियत से अब तक इस किताब के अतिरिक्त ४ और पुस्तकों को आकार दे चुके हैं | इनमें दो गजल संग्रह एक कथा संग्रह और ऐ उपन्यास आगरा पन्द्रह किलोमीटर के नाम से प्रकाशित हैं |वे वैचारिक धरातल पर एक सुलझे हुए रचनाकार हैं | जमीन से जुडी घटनाएं ,समाज से मिले -पाए हुए अनुभव की धरातल, उनकी रचनाओं में यत्र-तंत्र कमोबेश बिखरी हुई रहती है | गजल वे पूर्ण निष्ठा के साथ बहर- मीटर को ख्याल  में रखकर रचनारत मिलते हैं |

पुस्तक ले आलेख में स्थानीय रचनाकारों ने अपनी -अपनी बात इसमें प्रकाशित कहानियों पर की है | इनमें सर्वश्री रवि श्रीवास्तव भिलाई ,मुकुंद कौशल दुर्ग तथा श्रीमती सरला शर्मा दुर्ग के समीक्षात्मक टिप्पणी शामिल है |

लेखक ने, बचपन के कहानी  पढ़ने के शौक से साहित्य के मर्म को समझने की बात की है | अपने वैचारिक धरातल की  छुट-पुट मनोरंजक किताबों के पढ़ने के आनन्द से,  कैसे गंभीर साहित्य लेखन का आधार बनाया ,स्प्ष्ट किया है,जो स्वागतेय है |

रिश्तों की बुनियाद ,इस संग्रह की सात कहानियों में लेखक ने मानवीय मूल्यों में, आज हो रहे क्षरण की लंबी पड़ताल-विवेचना की है | समाधान भी ढूंढा है ,और तत्परता से सभी कहानियों को उस मोड़ तक ला छोड़ा है, जहाँ हम, नायक पात्र-चरित्र के प्रति संवेदना रखने या सोचने को मजबूर हो बैठते हैं| कहानी में यही दर्द का  परोसना ,मार्मिकता के स्तर को छूने की कोशिश करना, लेखक को आम से हट कर ख़ास बनाने का उपक्रम करती हैं |

हर कहानी किस्सा शैली में लिखी गई है | वाचक-परंपरा का निर्वाह करती ये कहानियां, कहीं  रेशमी रिश्तों  के खोखले बुनियाद को पाटने का काम करती ज्यादा नजर आती है |

मसलन पहली कहानी किस्मत अपनी अपनी " तीन भाइयों,नीलम , पुखराज व मोतीलाल   की कहानी है ,बड़ा पिता के कारोबार में लिप्त दूसरा पी एस सी क्लियर कर के बड़ा इंजीनियर और पावर प्लांट के प्रोजेक्ट में तल्लीन | दोनों भाइयों के पास धन संपदा वैभव तीसरे ने  स्वेच्छा से शिक्षकीय कार्य को चुन कर सदैव अपनी ब्याहता के उलाहना का पात्र बनता रहा |

नीलम की मौत पर सारा समाज जुट गया ,तीन माह बाद मोतीलाल दिवंगत हुए तब उनकी पत्नी को अंत्येष्टि में कम लोगों के जुटने  का अनुमान सालता रहा | उनको अपने पति के बड़े लेखक होने का गर्व कभी आकर्षित नहीं किया | लड़के को हिदायत दे कहती, कि सभी यार दोस्तों को अंत्येष्ठि में हाजिर होने का आग्रह करना | ये है रिश्तों की बुनियाद | उधर पुखराज के पावर प्लांट को मुख्यमंत्री की मौजूदगी में आरंभ होना था, पर इस अकस्मात् अवसाद भरे शिक्षक व प्रतिष्ठित लेखक के अवसान ने उनका कार्यक्रम बदल दिया | जहाँ कम मौजूदगी का अनुमान था वहां सारे शहर का हुजूम हाजिर था |

कहानी  शुभ-लाभ में पण्डित पुत्र के कार्य में ग्रह -नक्षत्र की दखल बता अपनी कहे को मनवाने की बात है जिसमें कदम कदम पर क्षति होते दिखती है |

जियो और जीने दो ,दो भाइयों में जमीन की तकरार छोटे भाई का मुनि के प्रभाव से ह्रदय परिवर्तन , कोर्ट केस वापस लेने का निर्णय, छोटे भाई को उपेक्षित जगह पर कम कीमत की मिली जमीन का सरकारी प्रोजेक्ट के कारण भाव का बढ़ना और इसी प्रकार बड़े भाई की लालच में हथियाये जमीन की कीमत का ग्राफ गिरना ,इस तनाव में दूसरे कारोबार पर असर फिर कर्ज के बोझ तले दबते जाना | छोटे भाई की उद्धारक भूमिका, समाज की एक मजबूत बुनियाद को उकेरती नजर आती  है |

राजकुमार कहानी में अमीर बाप के बिगड़ैल लड़के से रिक्शा चालक के एकमात्र कमाऊ  बेटे की मौत हो जाती है| उसे मानवीय संवेदना का रंच मात्र अहसास नहीं होता | पैसो के दम से मामला निपटाने की बात कहता है | खुद्दार मगर गरीब ,बाप को यह नागवार गुजरता है | समय अंतराल बाद उसी बिगड़ैल का एक्सीडेंट उसे मौत के कगार पर ला छोड़ता है, जिसे रिक्शे वाले की मदद से बचाया जाता है | नर्स बताती है कि  यह शख्स हर दुर्घटना पर निगरानी रखता है उसे अस्पताल पहुंचाता है | उसकी मदद पाकर कई लोगों की जान बच सकी है| बिगड़ैल जब उसे देखता है तो पहचान जाता है | उसके हलक सूख चुके होते हैं | वह संकल्प लेकर उस मददगार के अभियान को नया व्यापक स्वरूप देता है | यूँ संवेदना की बुनियाद कभी सूख नहीं सकती ...?

रिश्तों की बुनियाद शीर्षक कहानी में पारिवारिक मन मुटाव से उत्पन्न परिस्थियों में कैसे पति-पत्नी का एक दूसरे से विमुख होना और फिर कुम्भ में परिस्थिति जन्य संयोग से मिलाप होने की गाथा है | इसे पढ़ते हुए किसी फ़िल्म स्क्रिप्ट की तरह सीन फ्रेम दर फ्रेम बनते नजर आते हैं | दरअसल इसमें पूरी फ़िल्म कॉन्टेंट में तब्दील होने लायक मटेरियल है | रिश्ते कहाँ अपने आप बनते और बिगड़ते हैं इसकी खूब कल्पना लेखक की कलम ने आरंभ से अंत तक की है | समूची कहानी कसे हुए कथ्य की वजह से पठनीय है |

एक और कहानी, जो आज की न्याय व्यवस्था पर चोट करती है उसका कथ्य यूँ है की रामभरोसे की जमीन पर म्यूनिसपल काबिज होकर बगीचा बनवा देता है | इस पर हुए खर्च की राशि को आडिट की नजर से बचाने कूट योजना बनती है | बात न्यायालय तक पहुंचती है

| रामभरोसे के साथ अन्याय अपनी सीमाएं लांध रही होती है तब प्रकरण में कहीं गलती का अहसास होता है उसे जमीन के बदले मुआवजा बतौर दस हजार आजीवन देने का हुक्म होता है | रामभरोसे को अपने शहर में न्यायालय की कम पड़ती जगह की वजह से पता चलता है कि उनको पाँच एकड़ जमीन की जरूरत है ,वह सुप्रीम कोर्ट में  आवेदन करता है कि वह अपनी जमीन को न्यायालय परिसर बनवाने के लिए दान में देने का इच्छुक है, बशर्ते न्यायालय का नाम रामभरोसे न्यायालय रखा जावे | कोर्ट उसके प्रस्ताव को मंजूरी देता है मगर न्यायालय परिसर जिसमें उसके नाम का उल्लेख है उसे देखने के लिए वह अपनी समस्याओं से घिरा मर जाता है |

कहानी अपने दंश में तीक्ष्ण है | आज के न्याय पर व्यंग की चोट करती है |

इस किताब की अंतिम कहानी प्रायश्चित शीर्षक की है | एक सेठ केवल अपने मूल और ब्याज के अतिरिक्त किसी संवेदना से शून्य है एक किसान को गाय खरीदने को कर्ज देता है | नियम और शर्त होती है की नियमित अंतराल में मूल और ब्याज की रकम आंशिक लौटाई जाए | इसमें गफलत होने पर गाय को छुड़ा ले जाने का अधिकार सेठ को होगा | किसान कुछ किश्तों में देरी करता है तब सेठ शर्त के अनुसार गाय छुड़ा ले जाता है | सेठ लो मुफ्त के दूध पीते यह ख्याल नही आता की जिस गाय को छुड़ा लाया है उसकी बछिया बिना दूध के मर चुकी है | उधर गाय की तबीयत में निराशाजनक बिगाड़ होने लगती है| अब सेठ को उसे ठाठा बाँध के खिलाना अखरता है | उससे पीछा छुड़ाने की तरकीब में वह अपने सप्ताह भर के अन्यत्र प्रवास से लौटने हुए जहर खरीद लाता है | रात के अँधेरे में गुड़ में, प्रवास के दौरान  अपने साथ लाये जहर मिला के खिला देता है | इस बीच उसकी गाय तन्दरुस्त होके, नियमित दूध देने लगती है जिसे घर के सब लोग पीने लगते है |यह बात उसे मालूम नहीं होती  सुबह सेठ की नींद खुलती है तो घर में सन्नाटा पसरा होता है | पश्चात उसे सब जानकारी चरवाहे से मिलती है जो गाय को घुमाने ले जाने के लिए आता है | पुलिस उसे तहकीकात और सबूत के आधार पर गिरप्तार कर ले जाती है | सेठ प्रायश्चित के नाम पर गाय उस किसान को वापस दे देता है | जब किसान ब्याज और मूल की रकम अपने गाय के दुहे दूध लिए  जेल पहुंचता है तब वह केवल दूध रख कर रकम माफी बतौर  लौटा देता है |साथ ही  किसान से अनुरोध करता है कि गाय के अगले प्रसव का पहले दिन का अमृत दूध उसे दे जिससे उसके पाप का बोझ कुछ काम हो सके |

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     श्री संजय दानी जी की कहानियां कहीं न कहीं रिश्तों की बुनियाद पर सशक्त ढंग से टिकी हुई लगती है | संग्रह पठनीय है

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर जोन  १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़

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