कहानी - टापू वाला गांव -संदीप शर्मा

SHARE:

सीत्तू और ठुनिया ने अपने मचान से दूर दिन पर दिन जमीन को लीलती झील के बढ़ते आकार में गोल चांद की रोशनी को बिखरते देखा। परेशानी की लकीरें उनके ...

सीत्तू और ठुनिया ने अपने मचान से दूर दिन पर दिन जमीन को लीलती झील के बढ़ते आकार में गोल चांद की रोशनी को बिखरते देखा। परेशानी की लकीरें उनके कसकुट रगों की त्वचा में खिंचती चली गई। उनकी आंखों में एक खौफ दिखने लग पड़ा था। सीत्तू आग के अलाव में मोटा लक्कड़ डालते ही बुदबुदाया , ‘‘ठूनिया भाई , ये झील चोरों की तरह हमारी ओर सरक रही है ,देख वो बड़े बांस को अपने गर्भ में छुपा चुकी है , ये सब कुछ खा जाएगी,मुझे लगता है कि हमें कुछ ही दिनों में अपना मचान भी उठा कर और पीछे ले जाना पड़ेगा। इस साल की बरसात पता नहीं अब क्या-क्या जुल्म ढाएगी। ऊपर से इस बार बरसात ने कसम भी खा ली है कि वह हमें उजाड़ कर ही दम लेगी।’’

ठुनिया अंधेरे में दूर धौलाधार की बर्फ की चादर से परिवर्तित चांद के प्रकाश को बड़ी देर से देख रहा था। वह बोला , ‘‘देख भाई सीत्तू, ईश्वर ने जो चाह लिया हो वो करके ही छोड़ता है, जो हो रहा हो उसे न तू रोक सकता है और न मैं , देख तो जरा धौलाधार के विशाल शिखर को , उसे कोई चिंता नहीं है डूबने की , कोई झील कभी उसे न डूबो पाएगी, झीलें तो खुद उसके विशाल पत्थरों में खुद के रास्ते ढूंढती है, नदियां उसे काटने का प्रयास स्वप्न में नहीं सोच सकती। हमारे इन छोटे मैदानों और टीलों का यही दुर्भाग्य है कि उन्होंने पहले तो इस नदी को जाने को रास्ता दिखाया होगा , और अभी यही नदी झील बनकर उन रास्तों के निशान मिटा कर अहसान फरामोशी निभाएगी। अब देखते हैं ये अहसान फरामोश बन चुकी जीवनदायिनी नदी और झील का मिलन हमें कौन से लोक की दुनिया में ले जाएगा, यह फिर हमारे लिए यहीं नरक की बस्ती सजा देगा। ऐसा भी हो सकता है कि यही झील सब कुछ खाकर जब तृप्त हो जाएगी तो फिर शांत और उदार बन जाएगी। वैसे तो यह नदी कभी रूकती नहीं पर उसको नदी से झील बनाने के इन्सानी प्रपंच ने उस नदी को जरूर अपराध बोध से भर दिया होगा। आओ चले झील के बढ़ते आकार का निरीक्षण कर और एक निशान लगा आएं।’’

दोनों उठे ओर झील के किनारे पर रूककर तट पर कुछ फीट की दूरी पर पत्थर रखने लगे। दो - दो पत्थर कोई पांच छः फुट की दूरी पर तट से अपने मचान की ओर रखने लगे। अंधेरा आसमान व उसमें गोल चांद अपनी रोशनी में मदमस्त उनके कारनामों को देखकर मुस्करा रहा था। कुछ ही पल में फिर वही चांद कुछ काले बादलों में अपना मुंह छिपा बैठा। दूर धौलाधार के बीच से बिजली कड़की ,इस आवाज ने रात के साए में भटकते इन दो इन्सानों के दिलों में खौफ की मद्धम लौ जगा दी। वे अपने मचान की ओर भागे। अभी कोई दो कोह का सफर था। फिर से बिजली कड़की ,यह जैसे उनके शरीरों को सवाह कर देना चाहती हो। दोनों ने लंबे पग भरे।

सीत्तू धड़ाम से किसी पत्थर से टकराकर ज़मीन पर गिर गया। वह चिल्लाया , ‘‘ रहम करो ख्वाजा पीर ,क्या तुम मुझे भी अपना नवाला समझ रहे हो ,बख्श दो !’’ वह तेजी से कराहता हुआ उठा और फिर दोनों मचान पर पहुंच कर अपने तिरपाल को मचान पर ठीक करने लगे। तेज हवा की एक आंधी आई , उनका मचान का बंधा तिरपाल ऐसे फड़फड़या जैसे वह भी पानी की गहराई से डर रहा हो , उसे तो अभी बरसात के थपेड़ों से लड़ना था। झील के बढ़ते आकार के ये पहरेदार बारिश की बौछारों में मचान पर चढ़कर तिरपाल को जकड़े बढ़ती झील की ओर टकटकी लगाकर देखे जा रहे थे।

जब से ब्यास नदी पर बांध बनने के बाद झील ने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया था तबसे टापू वाले गांव का सब कुछ तहस नहस हो चुका है। गांव चारों ओर से पानी से घिरना शुरू हो गया था। लोग बारी - बारी झील के बढ़ते पानी की रखवाली करने लग पड़े थे। गांव पानी में डूबेगा या नहीं या तो झील पर निर्भर था या फिर बांध वालों की मर्जी पर। पर बांध में पहली बार पानी भर रहा था। टापू वाले गांव के लोगों के मनों में एक आस थी कि शायद गांव बच जाएगा।

सीत्तू बोला , ‘‘भाई ठुनिया! क्यों भाग चलें टापू की ओर या फिर यहीं भीगते रहें ,सारा शरीर जवाब दे चुका है।’’ ठुनिया थोड़ा सोचकर बोला , ‘‘भाई ,जिस पहरेदारी के लिए हमारी बारी आई है , वह तो करनी ही पड़ेगी और पूरा गांव हमारे भरोसे चैन की नींद सो रहा होगा।’’ सीत्तू ने उदासी को ओढ़कर जैसे प्रहार किया , ‘‘क्या खाक चैन की नींद ! कितनी रातें सो पाएंगे , दिख नहीं रहा वह झील का राक्षस कैसे अपने दांतों को तीखा कर रहा है उसके शिकार ज्यादा रातें चैन की नींद नहीं सो सकते। उनको कह दो कि जल्दी में अपनी चैन की नींद में बचे खुचे सपने ले लो ,फिर उदास रात के सपनों का संसार उनकी परिधि के इर्द -गिर्द फैल जाएगा।’’

ठुनिया बोला , ‘‘ सीत्तू! अब जहां हमारा अस्तित्व पानी की सतह की मोटाई पर निर्भर है और कभी इस सुंदर मैदान पर सुनहरे स्वप्नों की खुशबु फैली थी। चीड़ के पेड़ , खेरों के पेड़ जंगली धूप से अपने आप को बचाकर हमारे लिए व अन्जान परिंदों के लिए मौसम बदलने का न्योता देते थे। चरागाहों में जानवरों के शरीर उछल कूद मचाते थे। वे अब कहां अपनी रूहों के लिए बसेरा बनाएंगें। ये झील उन सब रूहों को अपनी अथाह गहराई में डूबोकर ,मारकर उनके शरीरों को पचा पाएगी।’’

सीत्तू ने उसे झटका ,‘‘अब बस भी करो ठुनिया , छम - छम बारिश की मोटी बूंदों के संग तुम क्या आंसूओं की बरसात भी चाहते हो।’’ काले आकाश के बीच काले बादलों में अपना सारा जल उठेलने को ज्यादा जल्दबाजी नहीं की। सुबह तक जितना जल था , बरसता रहा , सुबह सुधा की बेला तक फिर दोनों झील के राक्षस के शरीर को नापने दौड़े । सब के सब पत्थरों के निशान पानी की सतह के नीचे दुबक चुके थे। ठुनिया के मुंह से निकला , ‘‘क्षमा ख्वाजा पीर, ये जुल्म मत करो ,अब तो कुछ ही दिनों में तुम्हारे बच्चे डूब जाएंगे। रहम मेरे मालिक!’’ फिर दोनों मन की सारी खोखली उम्मीदों को वहीं छोड़कर गांव की ओर लौट चले।

बांध वालों ने बांध का पानी किसी भी शर्त पर न छोड़ने का फैसला किया है , यह खबर जैसे ही टापू वाले गांव वालों को बांध वालों की बोट में आए दो आदमियों ने घर - घर जाकर दे दी वैसे ही शाम होते ही सब के सब गांव के मुखिया सीता राम के घर इक्ट्ठे हो गए। ‘‘अगर पानी बढ़ता रहा तो फिर गांव तो डूब ही जाएगा। बरसात थम नहीं रही है।’’ सीता राम ने एक ही बात बोली , ‘‘भाईयों ,अब फैसला करना बड़ा मुश्किल है ,जब बांध वालों ने फैंसला कर लिया है तो अब हमें सिर्फ भगवान ही बचा सकता है ,अगर गांव एक बार छोड़ दिया तो फिर सभी हंसेंगे और नहीं छोड़ा और सब डूब गए तो फिर हमारी जिद्द हमारे प्राण ले लेगी। अब आप ही बताओ हमें क्या करना होगा।’’ गांव का रुलिया बोल पड़ा ,‘‘कुछ नहीं होगा हमें ,सारी नावें तैयार है , अगर पानी बढ़ता गया तो उसी वक्त बच्चों ओर औरतों को उठा कर चल पड़ेंगे। एक बार परीक्षा तो देनी ही होगी , शायद भगवान भी हमारी हिम्मत को परख रहा होगा। मुझे तो यह भी लग रहा हे कि बांध वाले हमें झूठ - मूठ ही डरा रहे हैं।’’

सीता रात बीच में बोला , अरे! बांध वालों पर विश्वास नहीं कर सकते , वे भी अपनी जगह पर मज़बूर है अगर वे बांध का पानी छोड़ते है तो भी बाढ़ आ सकती है और कई जानें जा सकती है और इधर पानी रोककर सिर्फ हम 20 परिवारों को जान का खतरा है पर उनके अनुसार तो हमें चेतावनी भी दे दी गई है ये तो सिर्फ हमारी जिद्द है , कल हम डूब कर मर गए तो उन्हें कोई न पूछेगा। हमें सोच समझ कर फैसला लेना होगा। हमारी हालत जाल में फंसी मछली की तरह हो गई है अगर ज्यादा देर जाल में फंसी रहेगी तो भी मरेगी और अगर किसी ने छुड़ा कर ज़मीन पर फैंक दिया तो भी मरेगी।’’ अभी ये सारी बातें हो ही रही थी कि झील की ओर से भागता हुआ रुलिया का छोटा बेटा नहलू आ गया। वह बारिश में पूरी तरह से भीगा था। वह आते ही बोल पड़ा,‘‘ आप चाहे कुछ भी फैंसला करें , मैं अपना घर छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगा , चाहे झील मेरे घर को निगल जाए और साथ में मुझे भी निगल जाए।’’ उसकी आंखों में गुस्सा, बहादुरी और साथ में एक पक्की जिद्द नजर आ रही थी।

बाहर बारिश मूसलाधार रूप में बदल चुकी थी। बिजली घोर गर्जना के साथ चमकी और सबके चेहरे पर एक ही साथ चमकी। दीए की रोशनी में बैठे सब चेहरों को किसी आने वाले संकट का न्यौता देकर चली गई। रुलिया एक दम से उठा ओर चलते हुए बोला , ‘‘मैं जा रहा हूं गांव छोड़ कर। इससे पहले कि झील में ज्वार आ जाए , मैं पूरे परिवार को साथ लेकर जा रहा हूं , तुम लोग भी मान जाओ , कोई नहीं बचेगा यहां ।रुलिया अंधेरे में बहुत दूर निकल गया और उसके बाद बड़ी देर तक इस अभागी महफिल में खामोशी छाई रही। नहलू ने खामोशी को तोड़ा, ‘‘देखो जी , चाहे मेरा बाप सब को अपने साथ ले जाए , मैं न जाऊंगा, मेरा वादा है आप सब से । मेरी लाश अगर कहीं तैरती हुई मिल जाए तो उसे जलाना नहीं,जिन मछलियों को हम पकड़कर पूरे इलाके को खिलाते थे वे ही खाएंगी मुझे। तुम सब देख लेना।’’ अभागी महफिल में फिर से खामोशी छा गई। फिर सब अपने-अपने रास्ते निकल गए।

नहलू की बातें सच्ची होतीं हैं। सबसे काबिल नौजवान है वह पूरे गांव में। बांध बनने से पहले दरिया में सबसे पहले नाव वही डालता रहा है मछली पकड़ने के लिए। वैसे तो गांव के लोगों का मुख्य काम खेती बाड़ी ही रहा है पर ज़मीने बहुत कम हैं। पूरे गांव के पास बीच - बीच में मछलियों को पकड़ने का काम भी खूब चलता । मछलियों की मार्किट भी खूब चलती पास के कस्बे में और साथ में चार नए पैसे भी हाथ में आ जाते इसलिए मछलियों से कमाई का मोह गांव के मर्दों को छोड़ पाता। वैसे भी उनके बुर्जुग भी यही करते आए हैं तो फिर वो क्यों न करें ये काम । दूसरा इस घाटी में दरिया भी सुस्त पड़ जाता है , पानी फैल जाता है और मछलियों को खूब पालता पोसता है।

नहलू की बातों पर किसी को शक नहीं। एक बार उफनते दरिया में कूद गया था वह किसी दूसरे गांव के लड़के को बहने से बचाने के लिए और बचा कर ही लाया था। कोई दो कोह पर लगा था वह किनारे। दूसरे दिन नाव में घर लौटा था। उस वक्त तो रुलिया ने उसे मरा समझ लिया था। पूरा गांव तो उसको कहां - कहां ढूंढ आया था।

बरसात ने इस वर्ष अपने पूरे हिसाब किताब कर डाले हैं। ठुनिया व नहलू अपने घरों में दो - चार रोटियां खाकर झील की ओर बढ़ते है आज नहलू और ठुनिया की बारी है झील के बढ़ते राक्षस के मोटे पेट को नापने की । नहलू की एकाग्रता का बिंदु उसे उस आखिरी भयावह दृश्य की ओर केंद्रित कर रहा था, जब सब कुछ इस निर्दोष जल के बीच समा जाएगा। वह सोचते हुए चल रहा था। वह ठुनिया से चलते-चलते बोला,‘‘ दोष झील का नहीं और न ही उस दरिया का है,दोष तो उन मानवीय आकांक्षाओं का है जो दूरदर्शी सोच के आकाश में किसी के हिस्से की जमीन भी अवशोषित कर लेती है। हमारा भी यही हाल है जिस जमीन ने हमें हमारे हिस्से की खुशियां बांटी थी वह खुद अपना अस्तित्व खो रही है। हमारी विडंबना यही है कि हमसे हमारी जमीन छीनी जा रही है।’’ दोंनों झील के किनारे पहुंचे।

ठुनिया ने झील के करीब पहंचते ही नहलू को इशारा किया देखो, ‘‘नहलू! क्या तुम इसी झील के स्वार्थ की बात कह रहे हो न? देखो इसने अब जमीन पर आखिरी निशान को निगल लिया है। इस हिसाब से तो आठ - दस दिनों में पानी हमारे टापू को निगल जाएगा। तुम्हें जो सोचना है वह जल्दी में कर लो। ये झील हमारे लिए पराए सपनों की रात बन जाएगी।’’

नहलू बोला,‘‘देख ठुनिया, मैंने गांव में अपनी इच्छाशक्ति के अनुसार यह ऐलान कर दिया है कि मैं गांव के अपने घर को छोड़ कर नहीं जाऊंगा ,चाहे तो मुझ झील के तल में नवजीवन के चक्र का हिस्सा बनना पड़े और मेरा निर्णय अब अटलता से जिद्द में तबदील हो चुका है। मेरे इस इरादे से अब मुझे कोई डिगा नहीं सकता। तू रा पुराना यार है ,मुझे लगता है कि तू मेरे मन की बात समझ चुका होगा।’’ ठुनिया बोला , ‘‘यार तो हूं मैं तेरा, पर तेरी जैसी न तो मुझमें सोच है और न ही किसी निर्णय तक पहुंचने का सामर्थ्य। तू जो भी करेगा , तेरी आत्मा तुझसे गलत नहीं करवा सकती ,तू इन पानी की लहरों से अठखेलियां करने वाला अदम्य साहसी है , मैं तो सिर्फ किनारों पर बैठ कर खुद को सिमटा - समेटने वाला इंसान हूं मेरी मन में गतिशीलता का अभाव है और तू कभी न खामोश रहने वाला परिंदा जो हर दिन अपनी सरहदें खुद बनाता है। अब मैं क्या बोलूं ।’’नहलू जोर से हंस दिया।

दोनों ने बची हुई ज़मीन पर नए निशान लगाए और अपने मचान के निकट आग जला कर नींद के इंतजार में अपना वक्त आग की लपटों में डालते रहे। खिर वह दिन आ गया। काले बादलों की बारात ने टापू वाले गांव को बाजे गाजों से सुबह उठा दिया। मूसलाधार बारिश ने पिछले तीन दिनों से गांव के घटनाक्रम में जबरदस्त परिवर्तन ला दिया था। झील अपनी बाहों को गांव के घरों के नजदीक पहुंचा चुकी थी।

गांव खाली हो चुका था। अब गांव में सिर्फ नहलू था । गांव वालों ने इन मूसलाधार बारिश में अपने घरों के सामान को समेट कर दूर सुरक्षित ऊंचाई वाले कस्बे जहां मात्र कुछ घर थे में अपने डेरे लगा लिए थे। कुछ अपने रिश्तेदारों की सवेंदना के साए में पल बिताने लग पड़े थे और कुछ अन्जान दूसरे गांव के लोगों को रहमो कर्म का मौका प्रदान कर रहे थे। सरकार ने गांव को जो ज़मीनें बांटी थी वो दूर प्रदेश में मिली थी । इस टापू वाले गांव के लोगों में से कोई दूर प्रदेश में नहीं गया बस इधर - उधर विस्थापित हो गए। जो जिद्द गांव न छोड़ने की थी वह भी पानी में डूब गई थी।

नैहलू ने अपने बड़े भाई, बूढ़े मां-बाप को दूर अपनी जाति के लोगों के पास धार वाले गांव में पहुंचाया और एक पुराने छप्पर जो रूलिया के किसी पुराने यजमान का था उसमें ठिकाना बना लिया। रूलिया भी अपनी जवानी में घराट चलाकर बुढ़ापे तक पहुंचा था। नैहलू अपने बाप से बोला,‘‘ मैं अब कुछ रूपये-पैसे का इंतजाम करने निकल रहा हूं, जल्दी कुछ ले आऊंगा। कहीं नए घराट का ठिकाना मिलेगा, तो वह भी करूंगा,बस मुझ पर विश्वास रखना,लोगों की कही सुनी बातों पर मत आना। यह पुराना छप्पर हमें कुछ वर्श आसरा दे ही देगा।’’ बड़े भाई के पास गया तो कुछ ऐसी बातें करता रहा- ‘‘तुम बड़े हो मुझसे, पर मुझसे एक बात का वादा करना, जिंदगी सदा चलायमान है, मेरे न होते हुए भी चलेगी, अभी मुझे बस एक उड़ान उड़ने जाना है, आशा है कि मैं अपने अर्न्तमन में उठे ज्वार को शांत कर पाऊंगा। मैं दुखी हूं पर जिंदगी में हमें इस मुसीबत से निकल कर बहुत आगे निकलना है।’’

मां के पास गया तो बूढ़ी मां उसकी आंखों में पकते ज्वालामुखी को पहचान कर उससे बोली, ‘‘नैहलू! तुम्हारी जाति के भीरू रक्त में इतना प्रतिरोध अच्छा नहीं ! कहीं दूर जाओ और चार पैसे कमा कर आओ ताकि हम अपना बसेरा बसा सकें कब तक दूसरे के अहसान तले बिता पाएंगे।’’

नैहलू ने अपनी बूढ़ी मां के चरणों को छुआ और बोला,‘‘बस इस जीवन के लिए मुझे माफ कर दे माई, मैं फिर लौटूंगा, मुझे माफ करना मेरी बूढ़ी मां, मैंने तुम्हें बहु का चेहरा भी नहीं दिखाया, मैंने तेरी हर उम्मीद को उजाड़ा है बस आखिरी बार मुझ से अब कोई उम्मीद न रखना बस मुझे माफ कर देना।’’ नहलू की मां ने सोचा कि गांव के डूबने के दुख से यह ऐसी बहकी हुई बातें कर रहा है। कोई काम करने लग पड़ेगा तो फिर ठीक हो जाएगा।

नहलू ने सीत्तू और ठुनिया को पास के कस्बे में ढूंढा। ‘‘मैं एक बार फिर से आखिरी रात उस अपने गांव में बिताना चाहता हूं चलो मेरे साथ, किश्तियां भी है, मुझे तुम लोगों से बहुत सी बातें करनी हैं। एक रात बिताने से क्या होगा, अभी पानी घरों में नहीं भरेगा, हम तो पानी का बहाव देखते आए हैं एक दिन में कोई 10 फुट ही आगे बढ़ता है।’’ सीत्तू और ठुनिया नहलू की बात मान गए। सोचा चलो आखिरी बार डूबते गांव का मंजर ही देख लें। नहलू अपनी किश्ती पर अलग से चला। कोई घंटे भर में वे गांव में थे। पानी घरों के आंगन तक पहुंच चुका था।

डैम वालों की बोट ने गांव का आखिरी निरिक्षण किया। गांव में पहुंच कर जोर - जोर से आवाजें लगाई। बोट से दो आदमी उतरे। खाली घरों में कोई नज़र नहीं आया। नहलू ,सीत्तू और ठुनिया उनकी आंखों में धूल झौंक कर कभी एक खाली घर में तो कभी दूसरे खाली घर में छिप - छिपाते रहे पर वे किसी की नज़र में नहीं आए। तीनों ने खाली घरों की छत्तों के नीचे रात बिताने का फैंसला किया। तीनों बालपन के लंगोटिए यार हैं। तीनों ने इधर - उधर से लकड़ियों को समेटा और आग जला कर बैठ गए। ठुनिया ने सबसे पहले बात शुरू की। मैं कहता हूं, ‘‘नैहलू तू एक बार फिर सोच ले ,हमारे पास वक्त नहीं है मुझे लगता है कि आज रात पानी गांव को निगल जाएगा। हमारे बच्चे इंतजार कर रहे हैं , मैं और हंसिया तेरी जिद्द के आगे नतमस्तक होने नहीं बल्कि तुम्हें वक्त की नजाकत को समझाने आए हैं ,जब हमारी जिंदगी में भटकाव लिखा है तो फिर हमें भटकना ही है, पूरे टापू गांव के लोग टूटे तिनकों की तरह बिखर गए है। कोई ढूंढने से भी नहीं मिल रहा है सब भविष्य की चिंता में दूसरों के रहमे कर्म पर जिंदा हैं।

हमें जब सरकार ने दूर प्रदेश में ज़मीन के टुकडे़ बांट दिए है, तो फिर हम यहां क्यों रहें। पंछी भी अपने नए घोंसले हर साल बनाते हैं , हम भी बना लेंगे।’’ नहलू की आंखों में आग की चमक में फिर एक रोशनी कौंदी । वह बोला ,‘‘ अब मेरा आखिरी फैसला भी सुन लो, मैं इसी टापू पर अपनी जान देने वाला हूं ।झील की गहराई में अपने सब उफनते व अपरिवर्तशील परम्परावादी विचारधारा की जल स्माधी लूंगा और चाहता हूं कि कोई मेरी इस इच्छा को रोक न पाए। इसलिए भाईयों यहां से चले जाओ। सुबह तक यह गांव डूब जाएगा, और जब पूरा गांव डूब चुका होगा तब भी तुम किसी इंसान से मेरा जिकर मत करना। अगर मैं आखिरी वक्त तक डटा रहा तो इस दुनिया को सिर्फ यह बता पाऊंगा कि कभी किसी परिंदे से उसका चमन न छीनो ,चाहे वर्तमान में मनुश्य नित नए प्रयोगों के साथ मानवता को बेहतर बनाने ,जीवन को सुविधाओं से भर देने में जुटा है, मैं सब समझता हूं मेरे भाईयों , पर मेरी जिद्द मेरी सांस्कृतिक व पारम्परिक आत्मा की जिद्द है । इसके अलावा हम झीर जाति के लोग और क्या सोच पाएंगे। ये हमारे बुर्जुगों का दुस्वप्न ही होगा कि उन्होंने इस जीवनदायनी नदी के किनारे अपने गांव बसाए होंगें। तब तो उन्हें आभास क्या उनके विचारों में भी न होगा कि उनके वंश के बरगद को सींचने वाले इस तरह नदी से दूर भगा दिए जाऐंगे।

ठुनिया बोला, ‘‘ये कैसे हो सकता है नैहलू, तुम मरने का इरादा बता रहे हो और हम तुम्हे यू ही मरने दे, क्या भगवान हमें माफ कर पाएगा, हम तुम्हें ऐसा नहीं करने देंगे। चलो यहां से चलते हैं। पानी हमारे पैरों तक आ गया है।’’ नैहलू बोला, मैं बार - बार कह रहा हूं कि मैं यह डूबता गांव नहीं छोडूंगा। मैं इससे आगे न कुछ सोच पाउंगा और न सोच पा रहा हूं।’’

ठुनिया और सीत्तू अपने भीरू शरीरों में इस नई सत्ता के महाराज के आगे नतमस्तक करते हुए एक आखिरी किश्ती में सवार होकर अपनी मन की शक्ति को अंधा समझ कर डूबते टापू वाले गांव से दूर निकल गए। दोनों की आंखों में आंसू छलछला रहे थे। दोनों कैसे दोस्त हैं जो अपने यार को भी नहीं मना पाए। दोनों ने एक दूसरे से विचार किया।

ठुनिया बोला, ‘‘अगर हमने शोर मचा दिया तो भी नैहलू कहीं झील में छंलाग लगा देगा।’’ सीत्तू बोला, ‘‘ वो आ जाएगा,सनकी है न, हमें डरा रहा है, जब पानी घरों में भरेगा, तो आ जाएगा, उसकी बातों में सिर्फ सनक है, ऐसे भला कौन डूबना चाहेगा। हमें फिर भी उसके घर वालों को बता देना होगा। ठुनिया बोला, ‘‘अरे ये तो पगलाया ही है उनको परेशान करेंगे वो बैचारे वैसे भी इस वक्त विस्थापना के दुख में आंसूओं की झडियां लगाए हैं बूढ़े मां- बाप इस पागल के लिए कहां दौडे़गें इतनी बरसात में और वो भी उस उजाड़ टापू पर, हर जगह कोहराम मचा है। मैं तो कहता हूं, बस देखना सुबह तक वह आ जाएगा। हम आज यहां रात को यही झील किनारे ही सोएंगे, अभी अंधेरा हो गया है तू कस्बे से कुछ खाने को ले आ। देखना वह सुबह तड़के ही आ जाएगा नहीं आया तो हम सबको बता देंगे।’’

नहलू को पता था कि वे पक्का उसका इंतजार कर रहे होंगे। वह वापिस नहीं गया तो उन्होंने शोर मचा देना हैं। वह किश्ती पर बैठा और किनारे की ओर निकल चला। कोई घंटे भर में उसने जैसे ही किनारे पर किश्ती को लगाया, वैसे ही ठुनिया और सीत्तू एक मछुआरे के झोपड़े में जैसे उसका इंतजार करते नजर आए। दोनों के चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई जैसे उन्होंने सब कुछ पा लिया है। सीतू ने नहलू को गल्ले लगा लिया, ‘‘चल भाई, अब तू सही सलामत आ गया है अब तुझसे कोई और बात नहीं करनी, चलो अपने अपने घर चलते हैं, हमारे घर वाले परेशान होंगे, रात भर हम भी यहीं सोए रहे। हमें तेरा इंतजार था। किश्तियां किनारे पर पेड़ों से बांध कर कस्बे की ओर निकल गए तीनों ने कस्बे की दुकान पर चाय पी और फिर तीनों एक दूसरे को अलविदा कहकर अपने - अपने विस्थापित घरों की ओर निकल गए।

नहलू भी अपने घर के रास्ते की ओर कोई चार - पांच कोह आगे निकल गया। पूरा दिन वह इधर उधर भटकता रहा। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी। अब तो उसने सबको भरोसा दिला दिया था कि वह उन डूबते घरों से निकल आया है। शाम होने तक वह भटकता रहा। फिर जैसे जी सूर्य डूबा उसने अपने कदम उस ओर बढ़ा लिए जहां उसकी नाव बंधी थी। जब अंधेरा सिर पर छाने लगा तो उसने उजाड़ पगडंडियों के इधर - उधर देखा कि कोई आस पास नहीं है और किश्ती पर फिर से डूब रहे अपने टापू वाले गांव की ओर निकल गया।

वे क्षण नहलू के अंधेरे होते आसमान और ज़मीन के बीच एक धागे जैसी पतली पगडण्डी बनाना शुरू कर चुके थे जिन पर नहलू को संतुलन बना कर चलना था। अंधेरे में नहलू के मन ने ऐसी शांति तलाश कर ली थी कि झील की सतह के उपर बने सपाट समतल मैदान के ऊपर निशब्द हवा की लहरों में भी कोई प्रतिध्वनि की गुंज नहीं थी जो उसका अंतिम क्षणों में सहारा बनने का अहसान कर जाती।

दो रातें नहलू ने कमर तक चढ़ आए पानी की सतह के उपर उड़ती हवा के दम पर बिता डाली थी। सब कुछ पानी में तैरता जा रहा था। दिन के उजाले में नहलू ने स्लेटों के छप्पर पर बैठे बिता लिए थे। झील के पानी की नीली लहरें अगर आईना बना पाती तो नहलू को उसकी सोच की शायद प्रशंसा जरूर करती , और शायद ऐसा भी हो सकता था कि ये लहरों उसकी उत्कंठा को पिघलाने की कोशिश भी करती। झील की उभरती और पल पल बढ़ती सतह अपने अभिमान के नशे में चूर थी।

नहलू का मन कर रहा था कि कमर तक चढ़ चुके पानी में नाक बंद करके वह डुबकी लगा दे और जब आत्मा शरीर से निकल जाए तो फिर वह जल्दी से अपना फर्ज निभा दे पर इस बौने से शांत जल की तुच्छ गहराई में कैसे खुद को डूबो ले। यहां एक ओर तो अभी भूखे प्यासे और इंतजार करना होगा और कहीं डैम वालों की बोट फिर से गांव की डूबती तस्वीर देखने को आ जाए तो वह अपने हठ की बलि चढ़ जाएगा। वह ज्यादा नहीं सोच पा रहा था। उसने सिर्फ वही सोचा - बचपन से लेकर जवानी और अपने जिंदगी के उन सुनहरी पलों को तलाशा जो वह इस जमीन पर बिता पाया है उसने अपने मन को दूर धौलाधार की उंचाई से भी ऊंचे आकाश की घाटियों में प्रकाशित शिखरों पर बैठे अपने देवता को तलाशा। उसने मन को पानी के बुलबुले की तरह हलका करके मृत्यु का असामान्य सानंद स्वीकार कर लिया और जो वह कर चुका है उसे एक स्वप्न की तरह महसूस किया। नींद तो पानी में डूबने के बाद खुलेगी,जब उसकी आत्मा शरीर से निकलकर उस बुलबुले में समा कर फिर से पानी की सतह पर तैरने लगेगी तो वह परम शांति की ओर रूख करेगी, वह कुछ पल बुलबुले का अस्तित्व बनाने का प्रपंच करेगी और फिर पल में ही हवा के एक निम्न स्तर से वायु में समा जाएगी।

इन सब बातों से उसे एक आनंद का अहसास होने लग पड़ा था। वह भूख का चिंतन भी नहीं कर सकता क्योंकि भूख तो जीवन दायनी प्रंपचों का निर्माण करती है और वह तो मृत्यु को अपनी ओर आकर्शित कर रहा है। जीवन और मृत्यु के बीच की छोटी रेखा के बीच समाए समस्त उतार चढ़ाव, भाग्य,पुरूषार्थ व अनिश्चितता के साथ जो भी आज तक घटित हुआ, उस रेखा के वह अब अंतिम बिंदु पर पहुंच चुका है तो फिर उसका चिंतन तो समय की बर्बादी है, और उसके पास समय कम है तो फिर वह किस बात का चिंतन करे।

उसने हर चिंतन को भी नीचे फेंक दिया। बस उसके फेंकने से उठी लहरों के प्रवाह से जिस छप्पर पर वह बैठा था उसकी कच्ची ईंटों की दीवारों को एक धक्का दिया और फिर उसे लगा कि जैसे उसके नीचे एक तेज हलचल शुरू हो गई है। वह घर भी ढह गया जिस पर अब तक उसका अस्तित्व टिका था। अब उसके बाजुओं की परीक्षा और मौत का फासला ही बचा था। वह अंधेरे को सहारा बनाकर बस तैरता रहा, तब तक जब तक उसके शरीर और मस्तिष्क का सामंजस्य नसों का संदेश भेज कर उसकी हिम्मत को जिंदा रख सकता था।

वह तैरता रहा और फिर अंधेरा ही उसका गवाह था, चांद तब तक दूर किसी कोने से यह सब देख रहा होगा, पर वह मदद नहीं कर सकता था, उसकी ज़मीन इस जिद्दी के किसी काम की नहीं थी। जब सूर्य की पहली रश्मि ने उस सपाट झील के ऊपर अपनी शतरंज की बिसात बिछाई थी तब तक वह फूलकर किसी कोने की ओर बहना शुरू हो चुका था। उसको अब आत्मचिंतन से भी छुटकारा मिल चुका था। डैम वालों ने खतरे के निशान का इतंजार करके फिर कुछ समय के बाद पानी छोड़ दिया था। टापू वाले गांव के कुछ पिघले हुए अवशेष अब कुछ दिनों के बाद दिखाई देने लग पड़े थे। अगले वर्ष डैम वालों ने खतरे के निशान को कुछ फुट नीचे कर दिया था। टापू वाले गांव के कुछ और जिद्दी लोग इधर -उधर की पहाड़ियों से उतरकर टापू वाले गांव की और लौट रहे थे। नैहलू अपना फिर से टापू पर बस चुका गांव देखने नहीं लौटा है। गांव वालों को बस अब तक इतना ही पता है कि वह कहीं दूर निकल गया है।

--


लेखक-संदीप शर्मा

कृश्णा नगर, मकान न 618, वार्ड न 1,हमीरपुर,हिमाचल प्रदेश

पिन 177001


जीवन परिचय

नाम : संदीप शर्मा

शिक्षा : मास्टर इन बिजनिस मैनेजमैंट,पी. एच. डी. (रिसर्च स्कालर)

व्यवसायः शिक्षक, विज्ञान,डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल, हमीरपुर (हि.प्र.) में कार्यरत।

प्रकाशन : दो कहानी संग्रह ‘अपने हिस्से का आसमान’ व ‘अस्तित्व की तलाश’ प्रकाशित।

निवासः हाउस न. 618, वार्ड न. 1, कृश्णा नगर, हमीरपुर।हिमाचल प्रदेश 177001

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी - टापू वाला गांव -संदीप शर्मा
कहानी - टापू वाला गांव -संदीप शर्मा
https://2.bp.blogspot.com/-HVHUlamZxR0/XHTtQV7-igI/AAAAAAABNCY/jWnnwGrZyPYMVx2Atbcm9Cs0pAjFE8pOgCK4BGAYYCw/s320/Sandeep%2B%2BPHOTO%2B1%2B%2528Phone%2529-783359.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-HVHUlamZxR0/XHTtQV7-igI/AAAAAAABNCY/jWnnwGrZyPYMVx2Atbcm9Cs0pAjFE8pOgCK4BGAYYCw/s72-c/Sandeep%2B%2BPHOTO%2B1%2B%2528Phone%2529-783359.jpg
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/02/blog-post_97.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2019/02/blog-post_97.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content