नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

वक्त से होकर ख़फा खुद को अनाम करलूँ क्या, उनके कहने भर से ही खुद को तमाम करलूँ क्या। तेजपाल सिंह ‘तेज' की 12 ग़ज़लें

-एक-

​​

वक्त से होकर ख़फा खुद को अनाम करलूँ क्या,

उनके कहने भर से ही खुद को तमाम करलूँ क्या।

​​

कब तक बचूँगा मौत से, एक दिन जाना ही है,

डरके अपनी जान को उजड़ी दुकान करलूँ क्या।

​​

पाँवों में गो थकान है, होठों पे तिश्नगी,

ताज़गी सोचों की मैं यूँ ही तमाम करलूँ क्या।

​​

क्या किया, क्या न किया, बीते कल की बात है,

कल के किए पे आज को बेज़ा निसार करदूँ क्या।

​​

आग का न ‘तेज’ अब सूरज का खौफ़ है,

बस इसलिए दुश्मन को मैं मेहमान करलूँ क्या।

​​

​​

-दो-

​​

अब मुझे घर से कि हवालात से डर लगता है,

कि हरनफस सिरफिरे सवालात से डर लगता है।

​​

सच तो ये है कि अब मैं ही सिजदा नहीं करता,

ये भी सच है कि अब इनायात से डर लगता है।

​​

ज़िन्दगी ने इस कदर लूटा सुकूने-कायनात,

कि अब, जीने के ख़यालात से डर लगता है।

​​

मैं अपनी कमनसीबी का चर्चा करूं किससे,

अब तो यूं भी मुझे बयानात से डर लगता है।

​​

इक वो हैं कि हरिक बात को बातों में उड़ा देते हैं,

‘तेज’ को हर बात से, हालात से, डर लगता है।

<><><>

-तीन-

परबत जैसे नहीं बड़े हम,

लेकिन सीना तान खड़े हम।

​​

जीने के लालच में मानो,

मौत से हर इक सांस लड़े हम।

​​

सावन के मेघों के जैसे,

रफ्ता-रफ्ता रोज झड़े हम।

​​

रोज का मिलना भी क्या मिलना,

तन्हा बिस्तर बीच पड़े हम।

​​

चलते-चलते जीवन सिमटा,

मंजिल से पर दूर खड़े हम।

​​

‘तेज’ धूप में पलकें झुलसीं,

सांसें उखड़ीं मौन पड़े हम।

<><><>

<><><>

-चार-

परियों का फ़न जाने अब ,

जुल्फों के ख़म जाने अब।

​​

सारी उम्र निभाए रिश्ते,

रिश्तों का सच जाने अब।

​​

साँसे करने लगीं जुगाली,

उम्र का करतब जाने अब।

​​

अपनों का अपनापन जाने,

गैरों का रुख जाने अब

​​

उम्र ढली तो ‘तेज’ मुकम्मिल,

जीवन का सच जाने अब।

<><><>

<><><>

​​

-पाँच-

​​

परबत जैसे नहीं बड़े हम,

लेकिन सीना तान खड़े हम।

​​

जीने के लालच में मानो,

मौत से हर इक सांस लड़े हम।

​​

सावन के मेघों के जैसे,

रफ्ता-रफ्ता रोज झड़े हम।

​​

रोज का मिलना भी क्या मिलना,

तन्हा बिस्तर बीच पड़े हम।

​​

चलते-चलते जीवन सिमटा,

मंजिल से पर दूर खड़े हम।

<><><>

‘तेज’ धूप में पलकें झुलसीं,

सांसें उखड़ीं मौन पड़े हम।

​​

<><><>

​​

-छ:-

​​

पल-पल यूंही संवारा जीवन,

कदम-कदम पर हारा जीवन।

​​

उनका मीठा-मीठा लेकिन,

अपना खारा-खारा जीवन।

​​

मौत को आना है आएगी,

फिर-फिर लाख पुकारा जीवन।

​​

बोल न पाया रहा सुबकता,

हमने लाख दुलारा जीवन।

​​

मौत की चिट्ठी हाथ लिए है,

मानो है हलकारा जीवन।

​​

<><><>

​​

​​

-सात-

​​

देखकर भी वो आंखें तरेर लेता है,

देखना उसका भी है यूँ देखना कैसा।

​​

मनाता हूं तो वो मान भी जाता है,

रूठना उसका भी है यूँ रूठना कैसा।

​​

होश में रहता है वो पीकर भी बाअसर.

बहकना उसका भी है यूँ बहकना कैसा।

​​

वो समन्दर कि सहरा में डूब जाता है,

डूबना उसका भी है यूँ डूबना कैसा।

​​

जब भी बोलता है खूबतर बोलता है,

बोलना उसका भी है यूँ बोलना कैसा।

​​

<><><>

​​

-आठ-

​​

नाहीं खुदा ना बंदा मैं,

केवल एक परिंदा मैं।

​​

सबकी आंखों में चस्पा हूँ,

जैसे गोरख-धंधा मैं।

​​

कुछ भी नहीं सूझता मुझको,

आँखों वाला अंधा मैं।

​​

राजनीति के गलिहारों में,

वोट के जैसा चंदा मैं।

​​

जाने कब तक चल पाऊँगा,

बोझ लदा एक कंधा मैं।

​​

<><><>

​​

-नौ-

​​

दुनिया से जो जुड़ा-जुड़ा है,

खुद से पर वो जुदा-जुदा है।

​​

कल तक दुनिया पर हावी था,

आज वो खुद से डरा-डरा है।

​​

खुलकर हंसने वाले का भी,

गला आजकल भरा-भरा है।

​​

जीने की आपा-धापी में,

खुद ही यम का रूप धरा है।

​​

‘तेज’ लूटने वाला भी तो,

खुद ही जैसे लुटा-लुटा है।

<><><>

​​

-दस-

उनके चेहरे पे उदासी क्यूँ है,

उम्र उनसे यूँ ख़फा-सी क्यूँ है।

​​

वो जो कातिल है मिरी हस्ती का,

उसकी चौतरफ़ा हवा-सी क्यूँ है।

​​

वो जो चाहें है गुज़रना आखिर,

मौत उससे यूँ ख़फा-सी क्यूँ है।

​​

बात मेरी जो अर्श हो निकली,

उसकी नज़रों में ज़रा-सी क्यूँ है।

​​

माना कि वो हसीन है, ज़हीन भी,

उम्र पर अपनी वो छुपाती क्यूँ है।

जिसका कहना था कि बेवफा हूँ मैं,

उसकी आँखों में वफा-सी क्यूँ है।

  <><><>

​​

-ग्यारह-

​​

आँखों आँखों आस तो है,

कुछ कुछ थका रिवाज तो है।

​​

भूखी नंगी आबादी के,

हाथों आज किताब तो है।

​​

उम्मीदों की तंग गली में,

मंहका कोई गुलाब तो है।

​​

सत्ता के श्यामल चेहरे से,

उट्ठा तनिक नकाब तो है।

​​

घनी आँधियों के आँगन में,

जलता कोई चिराग तो है।

​​

<><><>

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.