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पुस्तक समीक्षा : निजता में समग्रता का आभास कराती कविताएं समीक्षक : तेजपाल सिंह ‘तेज’

अर्ध-विराम पूजा गंगानिया का पहला कविता-संग्रह है। प्रस्तुत संग्रह में कुल अड़तालीस कविताएं हैं पूजा ने मेडीकल माइक्रो बायोलोजी विषय से पी एच डी की डिग्री हासिल की है। पूजा के शैक्षिक स्तर को जानकर कुछ लोग सहसा प्रश्न खड़ा कर सकते हैं कि कविता और चिकित्सीय उपादान का कैसा सम्मिलन। उन्हें यह जान लेना चाहिए कि कविता कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण होता है। वास्तव में कवि की प्रतिभा यत्र-तत्र बिखरे अच्छे-बुरे अहसासों को संकलित करके एक व्यापक सृष्टि की रचना करती है। हर युग में कविता का कलेवर भी जैसे वक्त की तरह ही बदलाव लेकर आती रही है....पूजा गंगानिया की भी। कविता केवल कवि विशेष को ही नहीं अपितु समाज को नई चेतना भी प्रदान करती है

डा. पूजा ने जीवन के प्राथमिक चरण में जो कुछ भी देखा है, परखा है या फिर जो महसूस किया है, उसे ही अपनी कविताओं में ढाला है। विदित है कि कोई भी रचनाकार समय, समाज और परिवेश के परे होकर कोई रचना नहीं कर सकता... यह संभव ही नहीं। उसके मन- मस्तिष्क पर भीतर और बाहर के तमाम घात-प्रतिधात और उनसे उबरने के लिए संघर्ष की छाया सदैव छाई रहती है। पूजा की कविताओं में इस भाव के दर्शन स्पष्ट रूप से होते हैं। ...यथा- ‘सरसराहट’ शीर्षक से कविता का ये अंश...

सरसराहट-सी/ जो होती है मन में/तो मालूम होता है/खामोशियों को/ तोड़ने वाला एक तूफान/ आ खड़ा हुआ है/ कभी-कभी लगता है/ जाने यह तूफान/ कब मेरी/ सांसों को ले जाएगा/ और शांत होकर/ उसे उस मिट्टी में/ मिला देगा/ जिस पर बूंदें पड़ती तो/ सोंधी-सी खुशबू आती थी.....

यह भी कि कविता, कविता की शर्तों पर नहीं, अपितु जीवन की शर्तों पर ही रची जाती है। कविता कभी भी शब्दों और परंपरागत शर्तों की दासी नहीं रही ...आज भी नहीं है। कविता आदमी के इतनी करीब आ गई है कि जिन्दगी और मौत का अंतर भी अब इसे समझ में आने लगा है।... यथा- ‘उम्मीद’ कविता की ये पंक्तियां-

...जिंदगी से/ प्‍यार न था/ फिर भी/ सांस बचा रखी थी/ खुशी भूली/ फिर भी/ आस लगा रखी थी/ और यादें.../ धोखे की ही सही\ पर याद बचा रखी थी.....

शायद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कविता में कभी-कभी शब्द और खामोशी एक दूसरे में ऐसे उलझकर रह जाते हैं कि कभी शब्दों को खामोशी तो कभी खामोशी को शब्द मिल जाते हैं। डा. पूजा की कविताओं में भी यह संयोग बखूबी देखने को मिलता है। उनकी ‘अनोखा रिश्‍ता’ कविता जैसे इस ओर इशारा करती है:-

ये जिंदगी भी/ अजब रंग दिखाती है/ दर्द देती है/ किसी को और/ किसी और को रुलाती है/ ये सब रिश्‍ते हैं जो/ अपनी रिश्‍तेदारी निभाते हैं/ जब भी दो आवाज/ दौड़े चले आते हैं......

डा. पूजा का यह पहला- कविता संग्रह जरूर है किंतु कविताओं को पढ़ने के बाद पूजा के नवोदित होने का भान जहन से गायब हो जाता है। उनकी कविताओं में अलग-अलग रूप हैं, अलग-अलग रंग हैं, अलग-अलग अनुभव हैं, अलग-अलग विषय हैं और अलग-अलग पारिकल्पनाएं हैं.....यही पूजा की कविताओं का सौन्दर्य बोध है। यह भी कि उनकी इन कविताओं में उनकी निजता का भाव मुखर होकर उभरा है किंतु उनकी निजता केवल उनकी नहीं, अपितु उनकी निजता में समग्रता का आभास होता है। इस माने में, साहित्य जगत में उनका प्रवेश स्वागत योग्य है। कविता संग्रह का शीर्षक समूची कविताओं का प्रतिनिधित्व करता है।......इस हेतु उनकी पूर्णविराम की खोजनामक कविता को लिया जा सकता है:-

...शब्‍दों को रोक लो/ चाहे कितना भी/ पर जिंदगी पूर्णविराम/ की खोज में निकली जा रही है/

दुख है तो/ बस इस बात का/ जहां चाहो\ वहां पूर्णविराम नहीं आता...../ जालिम महत्‍वकाक्षांएं/ खत्‍म ही नहीं होती/ हर बार मिलती हैं अर्ध-विराम के साथ।....

उनका साहित्यिक सफर निरंतर नए-नए कीर्तिमान तय करे, ऐसी मेरी कामना है।

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पुस्तक का नाम : अल्प विराम

प्रकाशक : नोशन प्रेस

पृष्ठ : 112

मूल्य : 199/-

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