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हीरानन्द सोज एक अफसाना निगार - मनजीत सिंह

हीरानन्द सोज 20वीं सताब्दी के एक सुलझे हुए और तरक्की पंसद शायर और मशहूर अफसाना निगार की हैसियत से जाना जाता है। वैसे तो इनकी रूचि अफसाना लिखने में ही रही है। इसका बुनियादी तौर पर भी अफसाना निगार ही है। उनके जीवन में प्रसिद्धि और यश आया है वो केवल ओर केवल शायरी से ज्यादा आया है। वो हमेशा नज्म, शायरी, कविता अफसाना, नसर आदि में बुलबुल की तरह चहचहाते रहे है। उनकी पहली किताब ‘नक्शगर‘ 238 सफों की है जो साया हुई है इस किताब के जरिये वो कहते है कि ‘ मैं हीरानन्द सोज जो अफसाना निगार होने का दावेदार हूं इस साहित्यिक विधा में प्रमाणित स्तर हासिल करने के लिए दो अफसाना संग्रह ‘ कागज की दीवार और साहित्य समंदर और सीप साया हुई मगर फिर भी न जाने क्यूं साहित्यिक क्षेत्रों के बतौर शायर पहचान रखता है। दरअसल मेरा कोई काव्य संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है। मुमकिन इस की वजह मेरे नाम के साथ जुडा हुआ उपनाम हो या वो काव्य रचनाएं जो समय समय पर साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है रेडियो में प्रसारित होती रही है। मुशायरों में जगह-जगह शिरकत भी इसकी वजह हो सकती है।

हीरानन्द सोज का सम्बंध साहित्य के उस क्षेत्र से हो रहा है जहां पर उर्दू जबान व साहित्य की वरिष्ठ हस्तियां संसार के अस्तित्व में आई है यानी इनकी पैदाईश मियावांली जो कि पाकिस्तान में है श्री टेकचन्द के यहां हुई। हीरानन्द सोज ने शिक्षण प्रशिक्षण मियांवाली से ही प्राप्त किया 10वीं कक्षा के पश्चात ये तकनीकी प्रशिक्षण के लिए लाहौर चले आए और यहीं के साहित्यिक वातावरण में रच बस गए। इनके बाद इन्होंने रेलवे में नौकरी कर ली और विभिन्न स्थानों पर निवास करते हुए अन्त में स्थाई तौर पर फरीदाबाद में स्थापित हो गए। यहीं 8 जनवरी 2002 को इंतकाल हो गया। मिंयावाली की सरजमींन से त्रिलोकचन्द महरूम जगन्नाथ आजाद मुहम्मद फिरोज शाह सलीम अहसान मुहम्मद अजमल नियाजी फारूख रोखडी और गुलजार बुखारी जैसी महान हस्तिया पैदा हुई। हीरानन्द सोज जहां उर्दू जबान व अदब के प्रेमी व आशिक थे। तो वहीं उन्हें अपनी मादरी जबान सराईकी पर भी गर्व था। वो सराईकी जबान में भी शेर कहते थे इनका काव्य संग्रह ‘सूरज मेरे आवाकूब‘ में प्रकाशित होकर अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ इस काव्य संग्रह में जहां गजलें अपने काव्य परिपक्वता और विषय की भिन्नता तथा जबान की मिठास सुन्दरता आकर्षण गीत-संगीत का अहसास कराती है। और बहुत सी इमेजरियां पाठ के मन मस्तिष्क पर छा जाने की शक्ति रखती है तो वहीं दूसरी ओर इनकी नजमें भी अपना सानी नहीं रखती है इस तरह हम कह सकते है कि हीरानन्द सोज को जहां गजल लिखने का सम्पूर्ण दक्षता प्राप्त है तो वहीं वो उत्कृष्ट व परिपक्व नज्म कहने वाले भी है। इसी के साथ इन्होंने हम्द और नअत में भी लेखनी चलाई कुल मिलाकर सोज साहब किसी भी साहित्यिक विधा में कलम चलाते हो उनके काव्यशास्त्र में हल्केपन का अहसास नहीं होता है । जबान का रचाव मेंहदी रंग की तरह दिखाई देता है। जिसमें भावना का उफान जीवन का रहस्य और इस रहस्य तक जीवन का अर्थ निहित होता है। इनके यहां गदरी साहित्य चेतना व दृष्टिकोण पाया जाता है। काव्य की रंगीनी विभिन्न सुसज्जित महफिलों की सैर कराती है। पाठकों को आनन्द की अनुभूति होती है तो वहीं सोज साहब के काव्य में पाठक को ज्ञान विज्ञान की रोशनी से भी ओत प्रोत होता है। इन्होंने युक्त और मुक्त कविताएं और गजलें दोनों साहित्यिक ढांचों में अपनी लेखनी की कौशलता दिखाई। इनकी नज्मों का सबसे विशेष गुण यह है कि जहां वो करूणा की व दुख की बात करते है। तो इसमें केवल प्रीतम का दुख व करूणा शामिल नहीं होती बल्कि इनका दुख व करूणा समकालीन भावनाओं का चित्रण बन जाए तो समझिए के फनकार की चेतना परिपक्व और समृद्ध हो चुकी है इसका विजन सीमित नहीं है बल्कि इनकी कल्पना व चिन्तन ब्रह्मांड की सीमाओं से निकलकर असीमितता फनकार को पृथक अस्तित्व प्रदान करती है और प्रसिद्धि के उच्च शिखर पर ही है इस सन्दर्भ में कुछ शेर नमूने के तौर पर प्रस्तुत करता है।

कहां कबूल था शहरों का शोर-ओ-शर-मुझको,

शिकम की आग ने रखा है बांध कर मुझको

मेरे जमीर ने कोसा है इस कदर मुझको

कि अपने आप से लगने लगा है डर मुझको

वो जानता था सफर उसको रास कितना था

मगर वो घर से निकलकर उदास कितना था

शायद मुझे जीने का सलीका नहीं आता

हकगोई को इनाम समझता हूं अभी तक

सोज साहब छोटी और बडी दोनों बहरों में लिखते थे इनका अनोखापन यही है कि वो अपने काव्य में भर्ती की चीजें इस्तेमाल नहीं करते थे यह वजह है कि पाठक इनकी रचनाओं को पढ़कर मचल जाता है उछल जाता है। अचम्भित हो जाता है। रूक कर थोडी देर सोचता है। कि सोज साहब ने क्या बात कह दी यानी वो आदमी शायरी से लोगों को चौंकाने उछलने और सोचने पर मजबूर करते है।

सोज साहब का कलाम आजादी के रणबांकुरों को सच्ची श्रद्धांजलि देने वाला है सोज साहब आजादी के दोर में अव्वल दर्जे के गजलकार थे हीरानन्द सोज 20वीं सदी के उन महत्वपूर्ण कलमकारों में से एक थे जिन्होंने एक ओर उर्दू जबान का सेवक व दूसरी ओर गजल व नज्म दोनों तरह की शायरी में अपनी प्रतिभा उच्च अभिव्यक्ति के श्रेष्ठतम विचारों से अपने जौहर दिखाकर उर्दू जबान को बढावा दिया। उनकी नज्मों में राजनैतिक सामाजिक चेतना विद्यमान थी जिसमें धार्मिक सहिष्णुता है उसमें मुल्क और खास तौर पर दिल्ली-गंगा-जमुनी तहजीब की अमिट छाप है यह वह दौर था जब हिन्दुस्तान को आजाद कराने के लिए जंगे-ए-आजादी का जमाना पूरे उफान पर था।

सोज साहब के तीन अफसानों के संग्रह प्रकाशित होकर प्रसिद्ध हुए जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है तीसरा अफसाना संग्रह ‘जंगल जंगल शहर‘ भी अनोखे अनुभव व अवलोकन का अहसास कराता है। जिस तरह उनकी शायरी में गहरी साहित्यिक चेतना पाई जाती है तो अफसाने भी पाठकों को चौंकाते हैं। उनकी अफसानवी जीवन का अर्थ और कशमकश दिखाई देता है। जब जीवन का अर्थ कशमकश काव्य अंश में घुलमिल जाए तो समझिये कि मनोवैज्ञानिक तकाजे स्वयं मिश्रित हो जाते हैं। इनके यहां विशेषतया सामाजिक मनोविज्ञान का बडा हस्तक्षेप पाया जाता है। कुछ अ फसानों में तो बिल्कुल ही अछूते विषय देखने को मिलते है। इसका अनुभव व अवलोकन तथा ध्यान अहसास व अनुभूति का त्रिकोण नई दिशा निश्चित करता है। ऐसी दिशा जहां फनकार की परिधि व्यापक से व्यापक होती चली जाती है। इसके अफसाने मन मस्तिष्क पर देर तक अपना प्रभाव छोड़ने की क्षमता रखती है। इनके अफसाने में वही रचाव और जचाव नजर आता है। जो इनकी शायरी का विशेष गुण है हीरानन्द सोज का एक अलग अस्तित्व और अनोखा पहलू यह है कि वो किसी विचारधारा किसी आन्दोलन या कियार बात से प्रभावित नहीं हुए और न ही इन्होंने सीमा बंधनों में रहकर साहित्य की रचना की बल्कि वो अपने मनमौजी स्वभाव के अर्न्तगत सम्पूर्ण जीवन लेखनी चलाते रहे शायरी हो या उनका अफसाना लेखन इन्होंने किसी भी साहित्यिक विधा में पाबन्दियों या विचारधारा को सामने नहीं रखा जैसे कि बुनियादी तौर पर पंजाबी थे और ये पंजाबियत इनकी अफसानों में देखने को मिलती है। स्पष्ट सी बात है कि हर फनकार अपने वातावरण समाज सभ्यता और परिवेश का पोषित होता है अपने आस पास से ही वो वस्तुसामग्री प्राप्त करता है जिसे कृतित्व के रूप में पृष्ठ पटल पर उतार देता है। सोज साहब ने भी ऐसा ही किया और होता भी यही है कि शायद प्रकृति का तकाजा भी है मशहूर शायर सत्यपाल आनन्द सोज साहब के अफसाना लेखन के बारे में यूं लिखते हैं कि

बहरहाल हीरानन्द सोज जिन्दगी के बारे में एक स्पष्ट और सकारात्मक सोच रखते हुए भी प्रगतिशील जैसे किसी राजनैतिक जीवन दर्शन से जुडे नहीं। उसमें समकालीन चेतना तो है परन्तु इस चेतना की आंखों पर किसी राजनैतिक सोच की परत चढी हुई नहीं है। इससे यह तात्पर्य नहीं है कि इसका चैतनिक काफिला एक अनजानी दिशा पर यात्रा कर रहा है।

दिशा की निश्चितता इसकी उजली और सकारात्मक सोच की ऋणी है जो यथार्थ की उस परम्परा से उपजी है। जिसे आज से 70 साल पहले मुंशीचन्द और दूसरे सामाजिक यथार्थवादियों ने बढावा दिया था यह सोच हीरानन्द सोज के सभ्य स्वभाव और जीवित रवैये की धूप और हवा में पलकर जवान हुई यह सकारात्मक सोच पूंजी भी है। और अनुभव भी हर अनुभव परम्परा की उपजाऊ भूमि से फूटता है।

दर्द आशना दिल्ली जो एक शहर था पोस्टमार्टम फरिश्ते बीते लम्हों का आजाब फिर सलीब ऐसे अफसाने हैं जिनमें सोज साहब के अफसानियत को भली प्रकार देखा ओैर समझा जा सकता है। यूं तो इनकी और भी बहुत से अफसाने हैं। जो पाठकों को चौंकाते हैं। अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इनके अफसानों की गिनती एक अच्छे अफसानो में की जाती है। जैसा कि उपर सत्यपाल आनन्द ने कहा कि हर अनुभव परम्परा की उपजाऊ मिटटी से फूटता है और यह अनुभव हमें इनके अफसानों में अच्छी प्रकार से दिखाई दे रहा है, जहां अफसानों में पंजाबीयत और सराईकी साहित्यिकता मिलकर एक दर्शन को जन्म देती है। ऐसा दर्शन जो फनकार और फनकार की जिन्दगी से जुडा भिन्न चिंतन व मनन पर आधारित होता है। जो व्यक्तित्व से ही सार्वभौमिकता के स्त्रोत फूटते हैं, जो अनुभव व अवलोकन की बुनियाद पर भी अर्थपूर्ण बन जाते हैं। सोज साहब का मामला ऐसा ही था।

कुल मिलाकर यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि हीरानन्द सोज जीवन भर सेवक की तरह उर्दू जबान व उर्दू साहित्य की निःस्वार्थ सेवा करते थे वो 20 वीं सदी के बेहतरीन कलमकार थे जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।

इनका पद विशेषत हरियाणा के हवाले से सम्पूर्ण सत्यता है कि इन्होंने उस परम्परा को संजोये रखा जिसने मूल्यों की सुनिश्चितता होती है। जिन लोगों ने सोज साहब को देखा है और जो उनसे मिले हैं, वो सब बताते हैं कि सोज साहब बहुत ही विनम्र स्वभाव और सदाचार की मूर्ति थे, जिस व्यक्ति से मिलते थे, प्रसन्नता से मिलते थे। या यूं कहिए कि इनका खमीर ऐसी मिटटी से उठा था, जहां मानवता जन्म लेती है। साथ ही इन्होंने उस परम्परा को भी कायम रखा जिसकी बुनियाद गंगा-जमुनी तहजीब पर खडी है यानी जहां वो एक श्रेष्ठ और अलग शैली के शायर व महान अफसाना निगार थे तो वहीं महान व्यक्ति भी थे लेकिन अफसोस की बात है कि जीते जी तो इसकी साहित्यिक सेवाओं को सब विद्वानों सराहा मगर न जाने क्यूं हिन्दुस्तान की मिटटी कैसी है कि समय गुजरने के साथ-साथ हम अपने बडों को क्यूं भुला देते है जरूरत है हमें ऐसे फनकारों पर काम करने की जिनके पीठ पीछे डाल दिया गया है या जान बूझकर उपेक्षित कर दिया गया नहीं वो दिन दूर नहीं जग हम अपनी विरासत सभ्यता और पूंजी को गंवा देंगे। सोज साहब परम्परागत शायरों की तरह इस जंग के मात्र दर्शन न होकर अपने कलम के जरिये इस जंग में शामिल हुए। हीरानन्द सोज के अफसाने को समझने के लिए उनके मिजाज और उनकी साहित्यिक पृष्ठ भूमि पर नजर डालना जरूरी होता है इनके अफसाने कौम के दिल में एक नया जोशो-खरोश पैदा करती है। सोज की अफसानवी साहित्यिक का एक हिस्सा रही है जिसने देश दुनिया के दिलों में मुहब्बत महजबी सहिष्णुता देशभक्ति की भावना कुर्बानी त्याग और जिन्दगी के अर्थ को अफसानों में ढाला है यहीं काम सोज साहब ने किया है और सोज साहब की नज्म और गजलों ने भी यही काम किया है कुल मिलाकर कहा जाए इसने जीने का सलीका अपनी नज्म गजल अफसानों में बेहतरीन तरीके से बताया है इनके अफसाने व नज्म का फैलाव बहुत दूर तक रहा है कौमी जिन्दगी का हर रंग इसमें निहित है सोज पे उस समाज में आंखें खोली जिसमें हिन्दू और मुसलमानों में सच्ची मुहब्बत थी नैतिक मूल्यों के प्रति सजग रहने वाले सोज का सम्पूर्ण जीवन अनुशासनमयी और व्यक्तित्व प्रभावशाली था वक्त के प्रति हमेशा पाबंद रहते थे उसने बाहरी दिखावे को कभी पास नहीं दिया। आज हम उसे याद करते है और कहते है कि चिडिया चुग गई खेत वाली कहावत सही बैठती है इस साहित्य पूंजी को हमने खो दिया आज हम उसे श्रद्धांजलि देते हुए नमन करते है।

मनजीत सिंह पुत्र श्री भूप सिंह

गांव भावड तह. गोहाना जिला सोनीपत

एम. ए. उर्दू पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला।

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