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व्यंग्य - राजनीति के डायमंड मेडलिस्ट - डॉ. नीरज सुधांशु

भिक्षां देहि से लेकर, एक हाथ ले व एक हाथ दे की समृद्ध परंपरा हमारी अनमोल विरासत रही है प्रायः इस ताकीद के साथ कि दाएं हाथ की हरकत का बाएं तक को पता न चले। लेन-देन की प्रक्रिया कई प्रकार से संपन्न की जा सकती है। बिन मांगे मोती मिले –जो मुश्किल से ही मिलते हैं की तर्ज़ पर, दूसरा करबद्ध होकर मांग लेना जो भीख की श्रेणी में आता है व तीसरा छीन लेना यानी डाका डालना।

हमारी इस परंपरा के तीनों प्रकारों को हमारे माननीय नेताओं ने नए आयाम देकर बखूबी निभाया है।- राजनीति में लेन-देन की ऋतु कम से कम पांच वर्ष में ज़रूर आती है। वैसे ये कभी कभी बिफोर टाईम आकर धरना देकर भी बैठ जाती है। इस ॠतु के पदार्पण के साथ ही सर्दी में भी गर्मी का अहसास होने लगता है।

ये इस खेल के महारथी हैं। ये लेने में विश्वास रखते हैं, रेसिप्रोकल वाला फॉर्मूला इनकी समझ से परे है क्योंकि इनकी चंबल उल्टी बहती है न! ये लें इसके लिए जनता भी एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देती है। वह तो त्याग की प्रतिमूर्ति है, देने का काम बखूबी करना जानती है।

अपने बहुमूल्य वोट के साथ ही अटूट आस्था व विश्वास बिना शर्त नेताओं को सौंप देना तो जनता का ही काम है। अपना पूरा भौगोलिक क्षेत्र जिसका नेता जैसा चाहे उपभोग करे, वह फिर पूछने की हकदार भी नहीं रहती।

रैलियों के नाम पर अपने खून की आखिरी बूंद तक बहा देना और शहीद कहलाना पसंद करना जनता का समर्पण कहलाता है।

कभी आपदाओं के नाम पर तो कभी चंदे तो कभी प्रिय नेता के जन्मदिन के नाम पर अपने खून पसीने की कमाई नेता जी के कोष में सहर्ष दान दे देना जनता की भावनात्मक उदारता है फिर वो उसका हिसाब भी नहीं मांगती , नेता भले ही आपस में एक-दूसरे से हिसाब मांग लें।

अपना सर्वस्व यानी कि तन, मन धन सहर्ष देने के बाद बदले में नेता के पास परंपरा निभाने के लिए झोली में होते हैं ढ़ेर सारे अदृश्य आश्वासन।

वे तो बेचारे वीतरागी हैं। उनके पास अपना कुछ नहीं होता- वे तो जनता का दिया खाते हैं, जनता का दिया पहनते- ओढ़ते हैं, जनता के धन से विदेश यात्राएं करते हैं व जनता के ही शीष पर विराजमान होते हैं।

लब्ब-ओ लुआब यह है कि ये दमड़ी के दरिया में ऐसा दंगल मचाते हैं कि हर कोई दांतों तले उंगली दबा लेता है। इस खेल में ये डायमंड मैडलिस्ट हैं।

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डॉ. नीरज सुधांशु

आर्य नगर, नई बस्ती, बिजनौर-246701

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