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लघुकथाएँ - बबीता गुप्ता

(चित्र - सुरेन्द्र वर्मा की कलाकृति)


घरौंदा

टीनू का छुट्टियों में जन्मदिन पड़ता था,ममेरे,फूफेरे,चचेरे,भाई-बहिनों के साथ खूब धूम-धाम से जश्न होता.आज भी वही पार्टी जैसा माहौल के बीच दसवां बर्थडे केक काटा गया.सभी उपहार के साथ,मुबारकबाद दे रहे थे.टीनू ने जेबी अपने पापा को केक खिलाया तो उन्होंने उसे प्यार करते हुये एक लिफाफा उसे थमाया,जिस पर मोटे-मोटे अक्षरों में  लिखा था,टीनू का अपना घर. पढ़कर एकदम उछल पड़ी,उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था,सबको लिफ़ाफ़ा दिखाती,और कहती,देखो ,यह मेरा घर ,मेरा घर......

उसकी खुशी देख उसके पापा की आँखेँ भर आई,उस दिन का टीनू का रोता हुआ चेहरा,एक ही सवाल,क्या यह घर मेरा नहीं.

घर पर,हर साल की तरह छुट्टियाँ लगते ही टीनू की चाची,बुआ,मामी,मौसी अपने बच्चों के साथ आते ही घर का खाली पड़ा कोना भी हम बच्चों की कारस्तानियों से मरहूम नहीं रहता. दिनभर मटरगश्ती,गुटबाजी,लड़ाई-झगड़े,फिर कभी ना आने की कसम खाते हुये सोते,फिर अगली सुबह बीती रात के मिटाते अँधियारे को धवल करती नई प्रभात की किरणों जैसे हम सभी सब कुछ भूलकर नई योजना को अंजाम देने में एकजुट हो जाते.

ऐसा ही एक दिन चाचा का बेटा रोहन,टीनू से खेल-खेल में लड़ते हुये दादी से रोते हुये शिकायत कर दी.दादी से डांट पड़ने पर भी टीनू अपनी बात पर अडिग थी.आरोप-प्रत्यारोप के चलते बात यहाँ तक पहुँच गई कि टीनू ने उससे गुस्से में कह दिया, ‘जब मैं तुम्हारे घर आऊँगी,तो तुम्हारे सब खिलौने तौड़ देगी.’

इतना सुन दादी ,टीनू की पीठ ठोकते हुये तेज आवाज में डांटते हुये बोली, ‘रोहन का भी यह घर हैं.’

‘नहीं,ये मेरा घर हैं.’

‘शादी बाद ,ससुराल ही तुम्हारा घर होगा,समझी.’

दादी की बात पर रोटी हुई वो अपनी माँ कहने लगी, ‘मैं कभी भी शादी नहीं करूंगी.’

‘ये शादी की बात कहाँ से आ गई?’टीनू की माँ के साथ सभी उसका मजा लेकर हंसने लगे.

अपनी शादी ना करने की बात पर अड़ी टीनू से कारण पूछा,तो बताया, ‘दादी कह रही थी कि ससुराल तेरा घर होगा,यह घर रोहन का है

बात सुन उसकी बुआ समझाते हुये कहती हैं,’हम लड़कियां पराया धन होती हैं, देखो,अब मेरा घर ससुराल में हैं ,समझी.’

‘तो मम्मी का यह घर हुआ,फिर उस दिन दादी गुस्से में चिल्लाकर उनसे इस घर से निकल जाने को क्यों बोल रही थी?’

‘अरे,वो तो यूं ही कह दिया होगा,बहुत बोलती हो,जाओ खेलों.

टीनू को चुप करा दिया,पर उसके पापा का चेहरा चिंताग्रस्त हो गया,बात वह परंपरागत थी,पर ह्रदय में शूल-सी चुभ गई.मेरी बेटी के भाई नहीं हैं तो क्या यह घर उसका.......नहीं,उसका भी घर होगा.टीनू की चहकती आवाज से चौककर,उसे देखने लगे,वो खुशी से सबसे कह रही थी,देखो,यह हैं,मेरा अपना घर,मेरा अपना........ 

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विदाई

शीतल की शादी में उससे बड़े दोनों भाईयों ने ,केवल दस्तूर के नाते,समाज की आलोचनाओं से बचने के लिए पत्नी-बच्चों सहित विवाह के चार दिन पहले आकर रीति-रिवाजों में शामिल हुये. पूरे परिवार को साथ देख शीतल की माँ ,सुलोचना का तो जैसे मुरझाए तरु में भावनाओं,समवेदनाओं का खाद पानी मिल गया,बच्चों के नजदीक होने के एहसासों भरी प्राणवायु से  मन झ्ंक्रत हो उठा,वही शीतल के पीत पर्ण चेहरे पर ,कांतिमय मुस्कराहट से उजास हो गया.धूमधाम से विवाहोपरांत,विदाई की घड़ी आ गई.सखी-सहेलियों से विदा ले,माँ के गले लगकर रो पड़ी.माँ के अकेले रह जाने की चिंता थी,पर संतोष इस बात का था सब कुछ आनन्दमयी माहौल मे सम्पन्न हो गया.आखिर में भाई-भाभियों से मिलते समय अपनी याचनाभरी निगाहों से जैसे कहना चाह रही हो कि अब,घर से विदा मत होना.भतीजी-भतीजे को ढेर सारा प्यार कर उसने अपने पर्स से कागज निकालकर,सौंपते हुये कहा, ‘ये तुम तीनों के लिए अपनी बुआ की तरफ से छोटा-सा उपहार.’

पास में खड़े बड़े भाई ने पूछा, ‘ये क्या शीतल?’

‘कुछ नहीं,बस,’और गाड़ी में बैठ गई.

बच्चों के हाथ से कागज से कागज लेकर पड़ा तो चेहरे पर आत्मग्लानि छा गई.अपराध बोध से सिर झुक गया,भाई-बहिन की ऐसी अनूठी विदाई देख,नाते-रिश्तेदार द्वारा,आश्चर्यमिश्रित शीतल के साथ-साथ,बेटे-बहुओं के संस्कारी होने का गुणगान सुन,सुलोचना को उस दिन की याद हो आई,जब शीतल के पिता,रामशरन ने शादी के विवाह खर्च को लेकर उनसे सहयोग करने की उम्मीद की,दो दोनों बेटों ने अपनी-अपनी ग्रहस्थी का रोना रोकर ना केवल अपना पल्ला झाड लिया,बल्कि घर बटवारे की मांग की,तो रामशरन गुस्से से लाल-पीले होते हुये,अपना फैसला सुना दिया, ‘अब,इस घर के दो नहीं ,तीन हिस्से होगे.’

पिता की बात से तिलमिलाएं बेटे बहुओं ने,रोज-रोज की चिक-चिक से किराये के घर में रहने लगे.

अपनी आस टूटने से आघात,,रामशरन की ज़िंदगी भी कुछ दिन की मेहमान रही.

अकस्मात जीवन मे आई इस सूमानी ने माँ-बेटी को दुख की बाढ़ बहती नदी में ,बिना पतवार के नाव को छोड़ दिया.पर तितर-बितर हुई लहरे तट किनारे मिलकर उफान के साथ आती हैं और अपने साथ बहुत कुछ छोड़ जाती हैं,उम्मीद बांधने के लिए.      

एक दिन अलमारी में बिखरी फ़ाईलों ,किताबों को जमाते हुये उसे किसी फाईल में बंद लिफाफा मिलने पर बेटी को दिया,तो खोलकर पढ़ने पर उसके चेहरे के गम-खुशी के मिले-जुले भावों को देख,पूछा,तो उसने बताया, ‘पिताजी ने अपनी वसीयत में मुझे भी हिस्सा दिया हैं.’

बात सुन,सुलोचना को रामशरन की कही बात याद हो आई,जब वो सुलोचना की पढ़ाई पर खर्च करने का विरोध करती तो,हमेशा कहते, ‘मेरे दो नहीं,तीन बेटे हैं,और फिर ये तो बिटिया का कानूनी हक हैं.’

‘देखना कही ये जमीन का टुकड़ा भाई-बहिन के बीच दरार का कारण ना बन जाए.’यादों में खोई सुलोचना ,शीतल की आवाज से जागी,वो कह रही थी, ‘अब सब ठीक हो जाएगा माँ.’फूल से मुरझाए चेहरे पर खिली मुस्कान के अंदर छिपी उधेड़ बुन को वो तब समझ नहीं सकी,पर आज सब कुछ आ गया. विदा होती गाड़ी में बैठी शीतल न सब कुछ विदा कर दिया.

लघुकथा 3464229291612993656

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