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लघुकथाएँ - डॉ. नन्द लाल भारती

(चित्र - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा की कलाकृति)


सकारात्मक सोच के सिपाही

  ताप्तीगंगा ट्रेन के पहिये छिवंकी (प्रयागराज यानि इलाहाबाद) स्टेशन पर पूरी तरह थमे भी न थे कि इसी बीच आततायी किस्म की महिला पैसेंजर खलनायक की तरह प्रवेश की  और  मि. एण्ड मिसेज प्रसाद पर बिफर पडी,और उनका सामान फेंकते हुए सीट खाली करो सीट खाली करो चिलाते हुए गालियां देने लगी। महिला आतातायी का साथी भी बीस ही था।।  मि.कामताप्रसाद बोले इकतीस नम्बर की सीट हमारी है। महिला आततायी  बोली तुम्हारी उम्र का लिहाज कर रही हूँ वरना............ मि.प्रसाद शराफत के जनाजे पर अचम्भित थे, महिला तैश में अपनी गुण्डयी का नंगा प्रदर्शन कर रही थी। पैसेंजर खान भाई के हस्तक्षेप से आततायी महिला की सुअर चिघाड़ तनिक थमी परन्तु कोच नम्बर पांच में अशांति पूरे सफर फैली रही ।

खान भाई दाढी खुजलाते हुए धीरे से बोले इलाहाबाद का कागजी दफन का क्या हुआ गुडिया राज हो गया शायद आततायी महिला का नाम गुडिया राज था। इसी बीच किसी पैसेंजर ने कहा नहीं बाबू प्रयागराज। मि.प्रसाद बोले मोहब्बत की जगह नफरत मकसद तो न था । मिसेज प्रसाद बोली रंजू के पापा आप प्यार बांटते चलो,जीवन यात्रा मे गुण्डा, गुण्डी  शरीफ हर तरह के लोग मिलते हैं। बिल्कुल सही कह रही हो पर प्रयागराज की हिजड़े जैसी महिला पैसेंजर याद रहेगी। प्रयागराज पाप धुलने का तथाकथित नाम है,खूनी यादें खंखार कर हिजड़े जैसी महिला के नाम थूक दीजिये मिसेज प्रसाद बोली । हाय रे इलाहाबाद की तहजीब को बदनाम करने वालों काश तुम मोहब्बत बांटते तो घर बाहर शान्ति रहती मि.प्रसाद बोले । खानभाई दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले वाह रे सकारात्मक सोच के सिपाही ।


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एवमस्तु

कैसे हो चुन्नीलाल रघुनंदन जी पूछे ..... ?

बस जीवित लाश ढो रहा हूँ ।

चुन्नीलाल क्या कह रहे हो कैसी लाश.... ....?

खुद की लाश मृत अरमानों की लाश ।

क्यों दर्द के समन्दर मे डूबे पड़े हो ?

बाबू जिसका बेटा पत्नी के मोहपाश और सास-ससूर की अंधभक्ति में मां बाप को सौतेला साबित कर दे ।मां बाप का परित्याग कर दे। वही मां बाप जिस बेटे का भविष्य संवारने के लिए पानी पीकर जीये पर बेटे को हर तकलीफ़ से बचाकर रखे।उसी बेटे को उसके सास ससूर लूट रहे हैं तो ऐसे मां बाप की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हो रघुनंदन ।

बेटी के रिश्ते की आड़ मे बेटी के मां बाप ने तुम्हारे सपनों की दुनिया का जनाजा निकाल दिया रघुनंदन बोले।

मन्नीलाल अपना मौन तोड़ते हुए बोले चुन्नीलाल के समधी-समधन को हजार गुना दर्द तो मिलेगा ही पर उनके वारिस भी इस प्रकोप से सात पीढियों तक नहीं उबर पायेंगे।

ऐसा श्राप न दो,तुम तो दुआ करो मेरे बच्चों को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की मिले,बड़ी उम्र मिले, सदा स्वस्थ और खुशहाल रहे । परमार्थ का कार्य करें परमात्मा सद्बुद्धि दें ।चुन्नीलाल बोले ।

एवमस्तु............ रघुनंदन बोले ।

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डां नन्द लाल भारती

लघुकथा 2139406164123305832

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