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तार-बेतार - लघुकथाएँ - तनु श्रीवास्तव

जीवन की परीक्षाएं

बोर्ड की परीक्षाएं थी सभी छात्र अपनी अपनी उत्तर पुस्तिका में व्यस्त थे शिक्षक चहलकदमी कर पारखी नजरों से छात्रों का अवलोकन कर रहें थे ।
तभी घण्टी की आवाज़ के साथ शिक्षक के दो घण्टे पूरे होने की घोषणा करते ही एक ग्रामीण परिवेश से जुड़े छात्र ने खड़े होकर पुस्तिका जमा कर बाहर जाने की अनुमति मांगी,सभी छात्र हतप्रभ हो उसे देखने लगे ।
शिक्षक ने कड़क कर कहा,,पेपर पूरा करो तीन घण्टे से पहले बाहर नहीं जा सकते।
"नहीं, मुझे जाना है गुरुजी ,कृपया मुझे प्रधानाचार्य से मिलने की अनुमति दे।"

"क्यों जाना है। इस समय पेपर देने से ज्यादा जरूरी काम क्या हो सकता है जो तुम पेपर छोड़ कर जाने को तैयार हो।" शिक्षक के कहते ही उपस्थित सारे छात्र उसको मूर्ख समझ हँस दिए ।

" है ,गुरुजी मेरे पेपर देने से ज्यादा जरूरी,,,मुझे जाने दीजिए आपके पैर पड़ता हूँ।"
तबतक मुख्य परीक्षा निरीक्षक भी शोर सुन कक्ष में आ गए उन्हें देखते ही वह छात्र बोला,, गुरुजी कृपया मुझे जाने दे आज दूसरी पाली में मेरी बहन की भी यू.पी.बोर्ड की बारहवीं की परीक्षा है। आखिरी पेपर है ,घर से पच्चीस किलोमीटर दूर,मुझे ही उसको लेकर जाना है घर पर और कोई भी नहीं है। नहीं जाऊंगा तो उसका पेपर छूट जाएगा। वो बहुत होनहार है। मेरा क्या मैंने तो उत्तीर्ण होने के अंक तक का पेपर कर लिया है।
कक्ष में सन्नाटा पसर गया था ।
तनु श्रीवास्तव
लखनऊ

तार-बेतार

आज जब माँ का फ़ोन नहीं आया तो बेचैन हो उठी वह और पिछली बातें सोच पछता रही थी।
माँ भी ना इन दिनों माँ कुछ अजीब सी बातें करने लगी थी पता नहीं कहाँ के तार कहाँ जोड़ देती,,,कभी पुरानी ननिहाल की बातें,, वो भी आधी सच आधी भूली-बिसरी मनगढ़ंत,,कभी ददिहाल की बातें ,,जिसको आज के परिवेश से जोड़ने की नाकाम कोशिश करती,,वह झुंझला उठती, क्या माँ क्या बात करती हो। उस समय इतनी आधुनिकता कहाँ थी तुम भूल जाती हो।
" नहीं बेटा मुझे सब याद हैं कुछ दर्द के साथ बोलतीं माँ।"

"ठीक है तो मुझे मत बताओ कह वह फ़ोन काट देती।"

अगले दिन फिर वह नियत समय पर फोन करती,,,,और उठाते ही डरते-डरते कहती देख गुस्सा मत होना आज कोई पुरानी बात नहीं करुंगी,, "तुझसे ही बात कर लेती हूँ तेरी छोटी बहन के पास तो समय ही नहीं है बच्चें छोटे है उसके अभी। "माँ जानती थी छोटी उससे अधिक धैर्यवान है पर,,

और फिर वही पुरानी बातें,,, वह घबरा कर जल्दी फोन रखने के लिए कोई बहाना बना देती।

सोमवार मंगलवार को तो उसने माँ का फ़ोन गुस्से में उठाया ही नहीं था। और आज बेचैन हो बात करने के लिए फ़ोन उठाया तो रात के दस बज चुके थे। माँ सो गई होगी। सोच परेशान हो उठी वह।
तभी छोटी का फोन आ गया,,,हेलो कहते ही वह बोली क्या बात है दी कुछ परेशान हो।
मैंने जवाब ना देखकर पूछा,,आज तेरी माँ से बात हुई क्या ?
" हाँ अभी-अभी तो हुई माँ बहुत उदास लग रही थीं बस हाल चाल ही पूछ पाई कि ये गोलू महाशय नाराज हो गए इनकी बातें खत्म ही नहीं होती सिर्फ इन महाशय के बेतुके प्रश्नों के उत्तर दो, इनसे ही तार-बेतार की बातें करो।
दीदी ! क्या हम लोग भी माँ को अपनी बेतुकी बातों से ऐसे ही झुकाते थे, हा हा हा ।"

हां, शायद कह फोन काट वह जल्दी से माँ को फोन मिलाने लगी उनसे बे-तार की बातें करने के लिए।
तनु श्रीवास्तव
लखनऊ

लघुकथा 6673837015360870139

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