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व्यंग्य आलेख - सुबूत की मांग - डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

न्यायालयों का सारा काम सुबूतों के आधार पर होता है। सुबूतों के आधार पर ही फैसले किए जाते हैं। लेकिन अब सुबूतों की मांग अन्य क्षेत्रों में भी धड़ल्ले से उठाई जाने लगी है। बिना सुबूत के कोई कुछ मानने को ही तैयार नहीं है। इसकी मांग अब वैयक्तिक, राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में ज़ोरों-शोरों से की जाने लगी है। हर कोई हर बात का प्रमाण चाहने लग गया है। स्वयं-सिद्ध तो कुछ रहा ही नहीं। आदमी को अपने वजूद के लिए भी सुबूत जुटाने की आवश्यकता पड़ने लगी है।

उस रोज़ एक व्यक्ति के थप्पड़ मार दिया गया। कमज़ोर था, सो लौट कर तो मार नहीं सकता था। साफ़ मुकर गया, मुझे थप्पड़ लगा ही नहीं है। बोला सुबूत दो। सुबूत के तौर पर बेचारे को एक थप्पड़ और खाना पड़ गया। तब कहीं जाकर माना। फिर भी ऐंठ नहीं गई। कहने लगा, थप्पड़ का सुबूत थप्पड़ नहीं होता। यह बेईमानी है।

सुबूतों की अलग ही दुनिया है। सुबूतों के साथ हमारा व्यवहार बहुविध होता है। जैसा अवसर, वैसा सुबूत। कुछ प्रत्यक्ष सुबूत होते हैं कुछ अप्रत्यक्ष। कुछ सुबूत मांगे जाते हैं, कुछ चाहे जाते हैं। सुबूत दिखाए जाते हैं, लाए जाते हैं। सुबूत दिए जाते हैं, सुबूत लिए जाते हैं। सुबूत का लेन-देन होता है। सुबूत जुटाए जाते हैं। सुबूतों का अभाव स्वीकार्य नहीं है। भले ही न हों तो गढ़ ही क्यों न लिए जाएं ! सुबूत चाहिए।

सुबूत एक ऐसी चीज़ है कि जिसके अभाव में तो राजनीति की ही जा सकती है, जिसके रहते हुए भी राजनीति करने की संभावना कम नहीं होती। जिसे राजनीति करना है वो तो करेगा ही; सबूत या ना-सुबूत। सो सुबूतों से डरने की आवश्यकता नहीं है। सुबूत हैं तो उनके साथ खेलिए, उन्हें तोड़ दीजिए, मरोड़ दीजिए। किसी न किसी तरह उन्हें अपने पक्ष में कीजिए। अक्लमंद आप हैं, सुबूत नहीं।

सुबूत सच्चिदानंद स्वरूप हैं। निराकार, सर्वशक्तिमान हैं। अनंत, निर्विकार, न्यायकारी हैं। वे ही सखा और वे ही सहायक हैं। इन्हीं की शरण में जाने से हमारा कल्याण है, हमारी जीत है। सुबूत हमारी शक्ति हैं, हमारा बल हैं। सुबूत माँगते रहिए। सामने वाला जब तक उन्हें जुटाए, चुप न बैठिए। आप को जो करना है करते रहिए। सुबूतों के अभाव में आप अपना काम रोकिए नहीं। सबूतों का क्या है, वे तो देर-सवेर जुड़ ही जावेंगे। नहीं तो जोड़ लिए जावेंगे। इत्मीनान रखिए।

आदमी अपने आपमें एक विश्वसनीय प्राणी है। पहले सहज ही उसपर विश्वास कर लिया जाता था। अब वो बात नहीं रही। इंसान विश्वसनीय नहीं रहा, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन विश्वास के साथ कहीं न कहीं, पूंछ की तरह, उसमें संदेह भी जुड़ गया है। आदमी अब प्रश्न करने लग गया है। उसके वजूद के लिए यह ज़रूरी हो गया है। “आई डाउट देयरफ़ोर आई एक्ज़िस्ट”। मैं संदेह करता हूँ, इसका अर्थ ही यह है कि ‘मैं हूँ’। यदि वह संदेह न करे तो भला अपनी उपस्थिति को वह कैसे साबित करे ? असली मुद्दा तो यहीं है।

दुनिया में दो तरह के आदमी हैं। काम करने वाले और सुबूत माँगने वाले। सुबूत माँगनेवाले सुबूत माँगते रहते हैं। जो काम करने वाले हैं वे काम करते रहते हैं। सुबूत आखिर काम हो जाने के बाद ही तो जुटाए जाते हैं। काम अहम है। वही करना है। माँगने वाले सुबूत की मांग करते रहेंगें। उनका काम ही सुबूतों की मांग करना है। आप कौशल से अपना काम कीजिए – कर्मसु-कौशलम। कर्म का कौशल इसी में है कि जो कार्य किया गया है, उसे प्रमाणित न किया जा सके। उसके लिए सुबूत न जुटाए जा सकें। जो जुटाना चाहते हैं वे तलाश करते रहें सुबूतों को। किसने रोका है उन्हें ?

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०/१, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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  1. सुबूत मतलब प्रमाण, प्रूफ। सही कहा मांगने वाले मांगते रहेंगे और काम करनेवाले काम करते रहेंगे। यह प्रश्न जेहन में आता है कि क्यों चाहिए सुबूत? विश्वास नहीं तो मत करो भरोसा, शिकायत कर लो, जी भर लो अजी किसने रोका है?

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