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होरी खेलत रघुवीरा - होली की कविताएँ

मंजुल भटनागर

फागुन की बयार

आँखों में रंगों के बादल हैं
अबीर बन बह चला मन कहीं दूर
उड़ने लगे फूल हवाओं में
मन टेसू हुआ जाता है.

सपने हैं कि धुआँ सा है कुछ
कलियाँ चहकी हैं गुल दावरी की
दिल की हर डार पर
गुलमोहरी रंग फैल गया
मन अमोघ नंदन वन हुआ जाता है


ग़ज़ल कहती घूम रही  हवा है
कृष्ण राधा से बावरे ग्वाल बाल लगे
समझे खुद को हीर रांझा या फरहाद
कुछ शायरी करते से लगे

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बरस गए हैं मेरी आँखों में
हज़ारों सुरमई सपने
महकने लगे हैं टेसू कुछ नए कुछ पुराने
मन हो चला सुर्ख गुलाब सा

सपनों की कलियाँ है हर मन में
दिल की हर डाल पर
फूट रही है नव पंखुड़ियाँ
और ये उपवन
नन्दन वन सा हुआ जाता है

कृष्ण राधिका भी वृज में
झूम रहे
मादक सा तन और जज्बाती है मन
भांग भी घुट रही, अपूर्व है स्वाद
रूह को भी  गुलदावरी किया जाता है

बेला चमेली इत्र सी सुगंध लिए टहल रहे
बरसी बदली है फिज़ा में
रंग गई चुनरी राधा की
ये प्रेम की बारिश है  या फागुन की बयार है
या फिर होली का त्योहार?

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रतन लाल जाट


(1) कविता- होली बस नाम की होली है

ना कहीं नजर आते हैं
अब पलाश-टेसू के फूल केसूए
ना कोई बाला बनाती है
अब गोबर के गड़कुलिए
होली बस नाम की रह गयी है
नहीं है वो शरारतें-शिकायतें
रंग बदल गये हैं
अबीर गुलाल केमिकल हो गये
लोगों के दिलों में नहीं है
अब कोई प्यार-मोहब्बतें
कई शैतान और हैवान हैं
जो रंग की जगह एसिड छिड़कते
लेकिन क्यों ना जले
अब तक होली की आग में
नफरत, ईर्ष्या और घृणित काम सारे
मानवता मरने चली है
बहुत कुछ बदल गया है
होली बस नाम की होली है

- रतन लाल जाट


(2) कविता- "वह"

वह बेचारा
बहुत ही गरीब
और अभावग्रस्त-लाचार है।
उसे जब देखो तब
हर कोई कुछ न कुछ
कहता-सुनाता है।
वह न जाने
क्या-क्या संज्ञाएँ
प्राप्त करता है।
नीच, अछूत और
पापी तक की उपाधि
स्वीकार करता है।
न कोई विरोध
न कभी सफाई
बस, सिर झूकाये दिखता है।
न किसी की झूठी प्रशंसा
न किसी की चापलूसी
दिल का बहुत ही साफ है।
उसे इस बात की सन्तुष्टि है कि
कभी पर्दे के पीछे
घिनौने खेल न खेले हैं।
न कभी सफेदपोश बनकर
मुँह पर अपने कालिख पोतने जैसा
कोई काम किया है।
इतना कुछ होने के बाद भी
इस बात का उसे
दिन-रात मलाल है।
रिश्वत देनी पड़ी,
दुश्मनी चुकानी पड़ी
और घृणा का पात्र बनना पड़ा है।
दिन-रात काम से फूर्सत नहीं
कि सपने में भी बुरा सोचे
फिर भी ताना-फटकार पाता है।
मुँह पर उंगली धरे सोचता
आखिर कब इन्साफ होगा
शायद खुदा भी नहीं जानता है।

- रतन लाल जाट


(3) कविता- कौन जिम्मेदार

माँ-बाप तड़प रहे
बच्चे हँस रहे
दोनों परेशान है
कौन जिम्मेदार है
बच्चे इधर-उधर
रास्ता भटक रहे
अभिभावक बेखबर है
हाथ में उनके जहर है
फिर भी सोच रहे
पीढ़ी तरक्की कर रही है
कौन दोषी है
पता लगाना मुश्किल है
अन्याय करने वाले से
बड़ा गुनाहगार सहने वाला है
आगे की नहीं सोचते
देखके भी नहीं देखते
इसीलिए सब गड़बड़ा गया है

- रतन लाल जाट


(4) कविता- चेहरा

सिर्फ देखने मात्र से
कोई चेहरा कभी
नहीं होता है सुन्दर
क्योंकि मैंने देखे हैं
कई सुन्दर चेहरे
और उनके पीछे
छुपा हुआ रहस्य
जिस पर हमेशा
पर्दा किया जाता है
लेकिन कभी तो
वो दिन आ ही जाता है
जब पर्दा उठ जाता है
तो पैरों तले की जमीन
अचानक खिसक जाती है
सब दाँतों तले उंगली दबाये
सन्न रह जाते हैं
किसी की हालत
काटो तो खून नहीं
यकीन नहीं होता है
सुन्दर चेहरे के राज पर

- रतन लाल जाट


(5) कविता- जल्दी आ जाओ

संयोग से
एकदिन तीन-चार साल के
एक बच्चे से
किसी काम की मजबूरी वश
एक माँ को दूर जाना पड़ा
तो पिता ने बड़ी आसानी से
कह दिया कि
जाओ बच्चे को मैं देख लूँगा
थोड़ी ही देर बाद
नानी याद आने लगी कि
कैसे रोटी का छोटा-सा कोर
नन्हें मुँह में दूँ
और कैसे इसे सू-सू कराऊँ
और कैसे कपड़े बदलूँ
इसी बीच बच्चा रोने लगा
और बहुत प्रयास करने पर भी
जब कुछ न हुआ
तो केवल एक यही उपाय बचा
तुरंत मोबाइल निकाला और
पत्नी को कहा कि
जल्दी आ जाओ
तुम्हारा काम मैं कर लूँगा


(6) कविता- रस्मोरिवाज

हमारे बड़े बुजुर्गों ने
बनाये हैं जो रस्मोरिवाज
वे यूँ ही नहीं है
केवल रूढ़ि या बकवास
इनके पीछे बहुत कुछ है
मेलजोल, मनोरंजन के साथ
अपनेपन का एहसास आदि
छुपे हुए हैं कई राज
चाहे शादी-विवाह हो
या तीज-त्योहार का नाच-गान
जो हमारे लिए बहुत ही
महत्वपूर्ण हैं आज
क्योंकि इनसे ही हम
पशु या रोबोट के बजाय
केवल और केवल हो सकेंगे
सचमुच के इन्सान

- रतन लाल जाट


(7) कविता- किसान की मेहनत

बच्चे की तरह फसल की
पाल-पोस करता
जब बड़ी हो लहराती
तो बड़ा खुश होता
एक किसान देखता है
जब अपने खेत-खलिहां
इसमें ही अपना जीवन देखकर
इसपे ही सर्वस्व प्यार लूटाता
सारी दुनिया भूलकर
दिन-रात रखवाली रखता
अंत में फसल पककर
उपज घर आ जाती यहाँ
तब कितने ही टूट पड़ते हैं छिनने को
और वो बेचारा
एक-एक दाने को
मोहताज हो जाता

- रतन लाल जाट


(8) कविता- संगत का असर

कहावत है कि
सफेद रंग के कुत्ते के साथ
काले रंग का कुत्ता
रहता है तो
रंग नहीं बदलता
लेकिन गुण-लक्षण
जरूर बदल जाते हैं
इसे सच होते
कई बार मैंने देखा है
अयोग्य संग योग्य बेकार हो जाता है
चोर-बेईमान के साथ नेकी नहीं मिलती है
इसी तरह अच्छा-बुरा होना
भविष्य बनाना या बिगाड़ना
संगत पर ही निर्भर करता है
पत्थर पारस संग मिल
सोना बन जाता है
लेकिन क्या पत्थर
पारस के संग रहता है

- रतन लाल जाट


(9) कविता- गलतफहमी

वहम
दो दिलों में
बढ़ा देता
दूरियाँ है
वहम
कारण है बड़ा
मनमुटाव और
बर्बाद होने का
यही बसा घर
उजाड़ देता
यही खुशियाँ
राख कर देता
किसी को कुछ नहीं
हासिल कभी होता है
सिवाय पश्चाताप के

- रतन लाल जाट


(10) कविता- मन पर वश

मन चंचल है
शातिर है
नहीं मानता
किसी की ये
आत्मा से लड़ता
उसे दबाने की
हर बार कोशिश करता
यदि आत्मा
इसके आगे
घुटने टेक देती
तो फिर यह मन
इन्सान को इन्सान
नहीं रहने देता
उसे दौड़ाता
राह भटकाता
दानव बना
उसे भागीदार
नरक का बनाता
इसीलिए मन पर
सदा वश रखो
और सुनो
आत्मा की आवाज़
इसी में है सबकी भलाई
और सुखद ज़िन्दगी

- रतन लाल जाट


(11) कविता- अमीरी के आगे

मैंने देखा है
अमीरी के आगे
लोगों को झुकते
सलाम करते
लूटते और
दुःखी होते
लेकिन नहीं देखा
कभी गरीब के घर
किसी को आते-जाते
उसका हाल पूछते
चाहे वो हजार दुआ दे
जीवन भर एहसान माने

- रतन लाल जाट


(12) कविता- प्रकृति में संगीत

इन्टरनेट, टीवी
और मोबाइल पर
जब देखो तब
हाजिर हो जाता है
जो चाहो वो
इनमें सबसे पसंदीदा
गीत-संगीत है
अलग-अलग राग-रंग
भाषा, विषय और शैली
बच्चों से लेकर
बूढ़ों तक के लिए
सबके लिए
अंतिम हथियार बन बैठे हैं
लेकिन इनको नहीं मालूम
यह संगीत रहता कहाँ है
इसका बीज हमारी
इसी प्रकृति में बसा हुआ है
पक्षियों का कलरव
बरसात की टिप-टिप
नदियों की लहरें
झरनों की धारायें
सनसनाती हवाएँ
रउड़ते झींगुर रात में
नाचता मोर
कूकती कोयल
सबमें संगीत है
जो चला आ रहा है
निरन्तर विज्ञान से पहले
और बाद तक

- रतन लाल जाट


(13) कविता- गलती

जो खुद करता
वो दूसरों को
नहीं करने देता
जो खुद चाहता
उसे औरों को
न चाहने देता
जो खुद की पसंद है
वह सिर्फ मेरी ही पसंद रहे
मुझे अच्छा लगे
वो सबको भाये
मैं जो करूँ
लोग खामोश हो देखें
मैं हर कहीं घूमूँ
वो कहीं ना जाये
मैं जीवित रहूँ
चाहे सब मरे
गलती मेरी माफ हो
औरों की नेकी पर
कभी कोई तारीफ़ ना हो

- रतन लाल जाट


 
(14) कविता- कविता ही काफ़ी नहीं है

आतंक का कहर हो
या हो शहीदों का बलिदान
महँगाई और भ्रष्टाचार
साथ ही कन्या भ्रूण-हत्या
इसी तरह बलात्कार
मर्डर-सुसाइड जैसे
ढेर सारे विषय हैं
जिन पर कवि रचते हैं
कई रचनाएँ
जिनसे समाज
अपने आपको
देख सके दर्पण में
और कुछ सीखें
लेकिन बदलाव
कवि, पाठक
और समाज के परस्पर
जगने और उठने के बाद
हाथों में कलम के साथ
कुदाली और तलवार भी
उठाना आवश्यक है
या कहें कहना ही मुख्य नहीं
कुछ करना भी जरूरी है
सिर्फ़ कविता लिखना ही काफी नहीं है

- रतन लाल जाट


(15) कविता- इन्सान है या शैतान

हवा में जहर
पानी में गन्ध
दिल में पाप
मन में हैवान
होंठों पर झूठ
आँखों में चापलूस
अपनों में अलगाव
नहीं रिश्तों का मान
धोखा, लूट और स्वार्थ
हत्या, आत्महत्या का आतंक
पता नहीं इन्सान
इन्सान है या शैतान

- रतन लाल जाट
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दोहे  रमेश के होली पर

 
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सच्चाई के सामने ,…...गई बुराई हार !
यही सिखाता है हमें, होली का त्यौहार !!

दिखे नहीं वो चाव अब, …..रहा नहीं उत्साह !
तकते थे मिलकर सभी, जब फागुन की राह !!

होली है नजदीक ही, बीत रहा है फाग !
आया नहीं विदेश से ,मेरा मगर सुहाग !!

पिया मिलन की आस मे, रात बीतती जाग !
बैठ रहा मुंडेर पर,……… ले संदेसा काग !!

छूटे ना अब रंग यह, छिले समूचे गाल !
महबूबा के हाथ का,ऐसा लगा गुलाल !!

सूखी होली खेलिए, मलिए सिर्फ गुलाल !
आगे वाला सामने , कर देगा खुद गाल !!

पिचकारी करने लगी,… सतरंगी बौछार !
मीत मुबारक हो तुम्हे, होली का त्यौहार !!

देता है सन्देश यह ,…. होली का त्यौहार !
रंजिश मन से दूर कर,करें सभी से प्यार !!

करें प्रतिज्ञा एक हम,होली पर इस बार !
बूँद नीर की एक भी, करें नहीं बेकार !!

छोड पुरानी रंजिशें ,….काहे करे मलाल !
इक दूजे के गाल पर,.आओ मलें गुलाल !!

सूना-सूना है बडा, …..होली का त्योहार !
ओठों पे मुस्कान ले, आ भी जाओ यार !!

दिखी नहीं त्यौहार में, शक्लें कुछ इस बार !
थी जिनकी मुस्कान ही, पिचकारी की धार !!

मेरा उनके गाल पर,ज्यों ही लगा गुलाल !
रिश्ते बिगड़े हो गए, पल में पुन: बहाल ! !

रही हमेशा देश को, यही मित्र उम्मीद !
खेलें होली साथ में, हरिया और हमीद !!
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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"


काव्य मंच पर होली


काव्य मंच पर चढ़ी जो होली, कवि सारे हुरियाय गये,

एक मात्र जो कवयित्री थी, उसे देख बौराय गये,

एक कवि जो टुन्न था थोडा, ज्यादा ही बौराया था,

जाने कहाँ से  मुंह अपना, काला करवा के आया था,

रस श्रृंगार का कवि, कवयित्री की जुल्फों में झूल गया,

देख गोरी के गाल-गोरे, वह अपनी कविता भूल गया,

हास्य रस का कवि, गोरी को खूब हसानो चाह रहो,

हँसी  तो फसी  के चक्कर में, उसे फसानो चाह रहो,

व्यंग्य रस के कवि की नजरे, शुरू से ही कुछ तिरछी थी,

गोरी के कारे - कजरारे, नैनों में ही उलझी थी,

करुण रस के कवि ने भी, घडियाली अश्रु बहाए,

टूटे दिल के टुकड़े, गोरी को खूब दिखाए,

वीर रस का कवि भी उस दिन, ज्यादा ही गरमाया था,

गोरी के सम्मुख वह भी, गला फाड़ चिल्लाया था,

रौद्र रूप को देख के उसके, सब श्रोता घबडाय गये,

छोड़ बीच में सम्मेलन, आधे तो घर को धाय गए,

बहुत देर के बाद में फिर, कवयित्री  की बारी आई,

हाथ जोडके बोली वो, प्रिय संयोजक और कवि "भाई",

"भाई" का सुन संबोधन, कवियों की उतरी ठंडाई,

संयोजक के मन -सागर में भी, सुनामी सी आई,

अपना पत्ता  कटा देख, संयोजक भी गुस्साय गया,

सारे लिफाफे लेकर वो तो, अपने घर को धाय गया,

बिना लिफाफा मिले कवि के, तन-मन में ज्वाला धंधकी,
घर की खटिया टूटी तब ही, नींद खुल गई उनकी||

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बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष"
206, टाइप-2,
आई.आई.टी.,कानपुर-208016,
000000000000

किशनू झा "तूफान"

रंग रूठकर बैठे हैं ,
पीडा़ भरी गुलालों में।
कौन गुलाल लगायेगा,
अब उसके सूने गालों में ।
किसने पीडा़ पूछी बोलो,
उस तुतलाती बोली से ।
रो रो कर यह पूछ रहा है,
घर शहीद का होली से ।


मां का आंचल सूना है ,
बापू भी चुप रहते हैं।
पापा कब आयेंगे बच्चे,
बडी़ आस से कहते हैं ।
दर्द किसी ने ना पूछा ,
नीर बहाती डोली से ।
रो रो कर यह पूछ रहा है,
घर शहीद का होली से ।



आंगन सूना सूना लगता,
घोर उदासी छायी है ।
देश बचाकर उन बेटों ने,
अपनी जान गवायी है।
किसने  पीडा पूछी  है ,
कुमकुम बिंदिया रोली से।
रो रो कर यह पूछ रहा है,
घर शहीद का होली से ।



सभी दिशायें मौन खडी़ हैं,
अम्बर भी खामोश खडा़।
द्वार दर्द से रोता  है,
सारा आंगन बेहोश पडा़ ।
बिखरे रंग से चीख निकलती,
घर में बनी रंगोली से ।
रो रो कर यह पूछ रहा है,
घर शहीद का होली से ।


   
                          
                   
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प्रिया देवांगन "प्रियू"


गुड़िया की होली
( सार छंद )
**************
छमछम करती गुड़िया रानी ,
घर आँगन में आई ।
अपने हाथों रंगे लेकर ,
सबको खूब लगाई ।।
हाथों में पिचकारी लेकर ,
दादी को  भीगाई ।
दौड़ दौड़ कर गुड़िया रानी ,
सब को रंग लगाई ।।
मम्मी ने पकवान बनाई ,
पापा भांग मिलाये ।
बच्चे बूढ़े सभी जनों ने ,
झूम झूम कर  गाये ।।

प्रिया देवांगन "प्रियू"
पंडरिया
जिला - कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
Priyadewangan1997@gmail.com
000000000000


संजय कर्णवाल


झूमते खिलते फूलो को जब सबने देखा,कहने लगे आया है बसन्त।                                                   
इन नजारो मे, इन बहारो में नई खुशिया ,नये रंग  लाया है  बसन्त।।
नई बहारे,नई ताजगी फैली है चारो ओर।
देखो ज़रा तुम खिलखिलके हँसता है भोर।
मस्त होकर गाए काली कोयल,
झूम झुमके चारो ओर नाचे मोर।।
धरती को नया रंग दिया है, हरे घास की चादर ने।
दसो दिशाओं में फैली लाली,नया रूप लिया शामो शहर ने
2   ,,रंग,,   
सभी रंग शामिल है बसंत क़े रंग में
मन खुशियो से भर जाता है  बसंत के संग में
कुदरत का नायाब तोहफा
जो हमको मिला है आनंद के लिए
ये मौसम खुशियो के आते जाते रहे
अपना जीवन खुशियो में जिए
बहारो ने शामो  को रोशन किया है

हवाओ पे चढ़ा है कैसा नशा है
कोई जानता ही नहीं हसीं रंग बने कितने
मोती भरे लाखो  सागर में प्यारे जितने।
3,,,नई  बहारे
बसन्त जो नई बहारे लेकर आता है हर बार जीवन में   ।

हँसती गाती चली आती है, बहार की बयार जीवन में    नया जोश लाती है
ये जिंदगी खिलखिलाती है
इन  प्यारी प्यारी वादियों।
फूल खिलते  है,
और सब मिलते हैं
मन की खुशियों से

4,,,
आईं हैं बहारें बसन्त बनके
महके है नजारे बसन्त बनके
रंगों रंगों के फूल खिले हैं  गुलशन में
एक दूसरे से पंछी मिले हैं गुलशन में
हर तरफ मौजों के किनारे बसन्त बनके
पेड़ो की शाखा फूलो की डाली
हो गई इस मौसम में मतवाली
हर पत्ती पत्ती निहारे बसन्त बनके
मौजे किनारों से जैसे मिली हो
नई नई कलियां खुलके जैसे खिली हो
कोई मन से पुकारे बसन्त बनके

5
शबनम फूलो पे चमकती मुस्काती रही
संग फूलो का पाकर खुदको दमकाती रही
कुछ पल ही सही प्रीत का संग तो मिला
इतना प्यारा, न्यारा जो अपना रूप खिला
आई किरण जो बनके सोना चमकने लगी
तितलियां भी इस आलम में बहकने लगी

6 बसन्त की बहारें में लायी उमंगें
जिझर देखो उधर ही खिले फूल रंग बिरंगे
ऐसी आई बहारें नये रंग में
सज गई डालियां नये ढंग में
रंग बिरंगी तितलियां झूमे कलियों पे
भौंरे भी मस्त हुए इनकी गलियों में
खुशबू भरी पवन सुहानी गुनगुनाये तराने
महके मन का कोना कोना आये दिन सुहाने

7
ये ऋतु आई है लेकर पैगाम नये
दिन रात नये और सुबह शाम नये
फूलो का मुस्काना, बुलबुल का गाना
मन को भाता है लगता है मौसम सुहाना
हर छटा निराली लगती है चारों ओर
मस्ती में कूके कोयल,मग्न होके नाचे मोर
मन करता है रुक रुक जाऊ
मीठे स्वर में कोई गीत गुनगुनाऊँ


8,,
हम सब प्रसन्न होते हैं, बसन्त के आलम में
ढेरों सपने मन में संजोते हैं बसन्त के आलम में
गाए तराने नित मिल-जुलके जीवन में
आए नई ताजगी सबके तन मन में

ऐसे ही अरमान सजाते हैं हम तो
पक्का विश्वास जगाते हैं हम तो

9
आयी बहारें जो गुलशन में
नये रंग भरे जीवन में।
चिड़ियों का चहकना कोयल का गाना
महकी बहारें मधुबन में
फूलो का मन्द मन्द मुस्काना
डाली का झुक जाना
बसन्त का आ जाना
फसलों का लहराना
यही आहट है खुशियों के आने की
नया कोई गीत गुन गुनाने की

10,,
धरती पर फैल गई हरियाली
नव यौवन से झुक गई डाली
नये रूप में फैली आसमान में लाली
चारों तरफ एक छटा निराली
सारे चमन से महक रही है खुश्बू
दौड़े दौड़े यूँ ही घूमे भौरे हर शू
तितलियां कलियों पर डोल रही है
मन की भाषा जैसे बोल रही है
यही बात है बसन्त के आ जाने की
हर तरफ नये नये रंग दिखाने की ।

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द्रोणकुमार सार्वा


*रँगीली होली*
होली लाये प्रेम का,सन्देशा जन मन भरे
हर्षित मन झूमें, लगे मधुमास हो
धरती के सारे रंग,भाव बन सजे ऐसे
जैसे इस बार होली,अपनी ही खास हो..

लाल लगे माथे,शौर्य का प्रतीक बन
पौरुष पराक्रम ,विजय श्री भाल हो
केसरिया त्याग का सन्देशा,जग जन को दे
संयम वैराग्य तप,अपने ये ढाल हो
धरती की अंगड़ाई,हरे की हरियाली फैले
लहराये तृण-तृण,वसुधा का साज हो...

विद्या का प्रकाश फैल,तिमिर अशिक्षा का  हरे
चहुँ ओर ज्ञान पीले, रंग का पैगाम हो
नीले सज पुरुषार्थ,मान बढ़ जाये
विश्व गुरु फिर अपना, हिंदुस्तान हो.....

श्वेत सजे मन की ,पवित्रता का भाव लेके
चहुँ ओर शांति,स्वच्छता सद्भाव हो
रंग सारे मिल जाये,दूर हो विषमताएं
विश्व शांति,सद्भाव का,पूरा अब अरमान हो.....

शुभकामनाएं आप सभी को
         
     द्रोणकुमार सार्वा
        मोखा(गुंडरदेही)
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डॉ ओमप्रकाश गुप्ता

ह्यूस्टन में होली

ह्यूस्टन में आनंद भयो है, होरी को रंग बरसे ।

राम कृष्ण दोउ खेलें होरी, देख-देख मन हरसे ।।

                                        ह्यूस्टन में आनंद भयो...

                                                                                                                                                   

होरी खेलें गोकुल वासी, खेलें मथुरा - कासी ।

राधा-कृष्णा खेलें होरी, घट घट के जो वासी ।।

राम सिया भी खेलें होरी, संग अयोध्या वासी ।

हम भी खेलें होली भैय्या, मिलकर ह्यूस्टन वासी ।।

                                        ह्यूस्टन में आनंद भयो...


ह्यूस्टन की जो देखी होली, भोले शंकर आए ।

संग भवानी को लेकर के, डमरू खूब बजाये ।।

देख के ह्यूस्टन रंग-बिरंगा, गणनायक ललचाए ।

रिद्धि-सिद्धि संग लेकर, वे ह्युस्टन दौड़े  आए ।।

                                   ह्यूस्टन में आनंद भयो...


देखी ह्यूस्टन की जो होली, बरसाना ललचाया ।

संग अयोध्या को लेकर,  वृन्दावन भी  आया ।।

जगन्नाथपुरी भी चली आईं, संग द्वारिका लाईं ।

तीरथ सारे ह्यूस्टन आए,  रंग जाओ मेरे भाई ।।

                                        ह्यूस्टन में आनंद भयो...


मिलकर प्रेम से खेलो होली, ह्यूस्टन के सब भ्राता ।

नाता जोड़ो राम से भैय्या, जीवन रंग का दाता ।।

होली की देता तुम्हें बधाई, भरो प्रेम पिचकारी ।

प्रेम से खेलो 'ॐ' से होली,  हो जीवन सुखकारी ।।

                                        ह्यूस्टन में आनंद भयो...

              डॉ ओमप्रकाश गुप्ता, ह्यूस्टन, होली २०१९ 
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सचिन राणा हीरो

"" होली ""

एक होली आज भी है, एक होली वो भी थी,
अब साथ नहीं है जो, तब हमजोली वो भी थी,
उसके गाल गुलाबी को तब रंगों से हमने रंगा था,
उसके होठों के गुलकंद को, अधरों से जब चखा था,
उसके यौवन का रंग हम पर कुछ ऐसे चढ़ गया था,
प्रीत भरे नयनों में जैसे कोई काजल भर रहा था,
उसके गोरे बदन पे रची, एक रंगोली वो भी थी,
एक होली आज भी है, एक होली वो भी थी,
मन जब पावन होता है, सारा उपवन अपना लगता,
प्रेम अगन में जो जलता, खारा पानी भी मीठा लगता,
जिन हाथों से स्पर्श किया उसे, उनमें खुशबू आज भी है,
होली की नटखट यादों का , मेरे गीतों में साज़ भी है,
बरसों बीते जिन बातों को, क्यूं उन पर आंख भिगोनी थी,
एक होली आज भी है, एक होली वो भी थी,
अब साथ नहीं है जो, तब हमजोली वो भी थी,

सचिन राणा हीरो
कवि एवं गीतकार
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