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कहानी - तमाशा ( लोक कथा पर आधारित ) - विजय शंकर विकुज

दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद जब शाम को मनुआ थका-मांदा घर लौटता तो इमली का मुखड़ा देखते और उसके मीठे बोल सुनते ही उसकी सारी थकावट मानो फुर्र हो जाती। लगता जैसे शरीर में नई ताजगी का संचार हो गया हो। वहीं दिनभर अकलेपन की तकलीफ झेलने वाली इमली का चेहरा भी किसी ताजे फूल की तरह खिल उठता। उस घर में किसी खुशहाल दंपति का एहसास मुहल्ले - पड़ोस के सभी लोगों को हमेशा होता। लोग उनके आपसी प्यार और सहयोग की सराहना करते कि परिवार हो तो ऐसा ही हो। कभी कोई समस्या आती तो दोनों हंसकर उसे झेल लेते हैं और अपनी खुशी को लोगों में भी बांटते हैं। और इसी तरह मनुआ तथा इमली का दाम्पत्य जीवन सुख-दुख को झेलता हुआ मजे से गुजर रहा था।

मनुआ दिहाड़ी मजदूर था, कभी कमाता तो कभी फाका भी दिन गुजारना पड़ता। इसी तरह मनुआ और इमली के वैवाहिक जीवन के लगभग आठ साल गुजर चुके थे। वैवाहिक जीवन के इतने साल गुजर जाने के बावजूद दोनों संतान सुख से वंचित थे मगर इस बात को लेकर दोनों के जीवन में कभी कोई कड़वाहट उत्पन्न नहीं हुई, कोई मलाल नहीं था। व्यवहार में भी कोई परिवर्तन नहीं आया था। दोनों प्राणी तो बस यही जानते थे कि भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है।

सुख-दुख को झेलते हुए दोनों प्राणियों का प्रेम दिन पर दिन परवान चढ़ रहा था। वहीं एक ऐसा अभावग्रस्त परिवार जो निरंतर समस्याओं को झेलता हुआ शांतिपूर्ण जीवन गुजार रहा हो, अंततः लोगों की नजरों में खटक ही जाता है। भला किस परिवार में तू-तू मैं-मैं नहीं होती लेकिन मनुआ और इमली तो जैसे लड़ना-झगड़ना जानते ही नहीं थे।

उन दोनों का यह प्रेम और आपसी मेल आखिर लोगों को सहन नहीं हुआ। इतने वर्ष गुजर गये और दोनों में कभी लड़ाई - झगड़ा नहीं हुआ, ऐसा तो नहीं होना चाहिये। किसी न किसी बहाने दोनों को लड़वाना चाहिये ताकि मुहल्ले वाले भी एक बार तमाशा देख सकें। लोगों ने विचार किया को जो कभी नहीं हुआ, वह एक न एक दिन तो अवश्य होना चाहिये। यही सोचकर मनुआ और इमली के पड़ोसियों ने आखिर योजना बना ही डाली।

एक दिन मनुआ को मजदूरी पर जाने के बाद पड़ोस की कई महिलाओं ने मिलने-जुलने के बहाने आकर इमली को घेरा और बात ही बात में कहा, ' अरी बहना ! जानती हो, तुम्हारा पति छोटी जाति का है। वह तुम्हारी जात का नहीं है।'

'नहीं,' इमली ने अविलंब विरोध किया, ' ऐसा नहीं हो सकता। हमदोनों तो एक ही जाति के हैं। हमारी शादी तो देख-सुनकर हुई थी।'

औरतें तो उसे बहकाना ही चाहती थीं। उन्होंने फिर जोर देकर कहा, ' असलियत वह नहीं है जो लोग जानते हैं। अरे वह बड़ा ही मक्कार और चालाक आदमी है। विश्वास नहीं हो तो आज रात तुम उसका शरीर चाटकर देखना, नमकीन न लगे तो तुम्हारा झाड़ू और हमारी पीठ। बस, एक बार उसका बदन चाटकर देखना, सारी सच्चाई सामने आ जायेगी।'

इमली के मुहल्ले की औरतों ने अपनी बातों से उसे मानसिक रूप से उलझाकर रख दिया। उन औरतों की बातों पर आश्चर्य और अविश्वास करते हुए भी उसने निर्णय लिया कि वह रात में मनुआ के सो जाने पर उसका बदन चाटकर अवश्य देखेगी। आखिर एक बार चाटने में हर्ज ही क्या है ! और अगर वह सचमुच वही निकला तो वह उसे छोड़ेगी नहीं.......धोखेबाज कहीं का ! इतने दिनों तक प्रेम का नाटक कर रहा था ?

इसी तरह पड़ोस के साथी मजदूरों में एक ने मजदूरी पर साथ में जाते हुए मनुआ को टोका, ' अरे भईया ! जानते हो तुम्हारी घरवाली डायन है।'

'क्या ?' मनुआ चौंक पड़ा। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने तुरंत कहा, ' तुम सब झूठ बोल रहे हो या मजाक कर रहे हो। आज हमदोनों को साथ रहते आठ साल हो गये। ऐसा कुछ रहता तो क्या मुझे पता नहीं चलता। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।'

'तो क्या हम सब झूठ बोल रहे हैं ?' एक दूसरे मजदूर साथी ने गंभीरता से कहा, ' तुम विश्वास करो या न करो लेकिन हमने सच्चाई देखी है, हम सभी ने।'

'क्या देखा है ? बोलो-बोलो, ' मनुआ बैचैन हो उठा।

इस बार दूसरे मजदूर साथी ने कहा, ' यही कि रात में जब तुम सो जाते हो तो वह मंतर पढ़ती है, तुम्हारा बदन चाटती है। विश्वास नहीं होता है तो आज रात सोने का बहाना करके तुम खुद ही सारी सच्चाई जान लो। डायन बहुत ही खतरनाक होती है। हमलोग तो तुम्हारी भलाई की बात ही कर रहे हैं। वह तुमसे प्रेम का दिखावा करके तुम्हें धोखा दे रही है।'

मनुआ को उसके साथियों ने ऐसा प्रभाव में लिया कि उसने उसी रात सारी सच्चाई जानने का फैसला कर लिया। वह सोचने लगा कि क्या इतने सारे लोग झूठ बोल सकते हैं। नहीं, आज रात वह सोने का बहाना करके अवस्य देखेगा कि इमली क्या है। डायन बहुत खतरनाक होती है।

शाम के मनुआ थका-मांदा घर आया। एक-दूसरे को देखते ही दोनों का प्रेम फिर उमड़ आया लेकिन लोगों की बातें याद आते ही दोनों भीतर ही भीतर सतर्क हो गये। दोनों सोचने लगे, क्या इतने लोगों की बातें झूठ हो सकती हैं ? नहीं, एक बार जांच करके देखने में हर्ज ही क्या है। दोनों ने अपने मन की बात का रत्ती भर भी एहसास एक-दूसरे को नहीं होने दिया। प्रेम से बोलने-बतियाने, खाना खाने के बाद दोनों सोने की तैयारी में लग गये। खाट बिछते ही मनुआ बिस्तर पर पसर गया। थोड़ी देर इधर-उधर करवट बदलने के बाद वह सोने का बहाना करके नाटक से पर्दा उठने-उठाने का इंतजार करने लगा। इमली भी इंतजार में थी कि मनुआ सो जाये तो वह अपना काम शुरू करे।

रात गहराने के साथ जब इत्मीनान हो गया कि मनुआ गहरी नींद में गाफिल हो गया है तो वह तैयार हो गयी। वह धीरे से मनुआ के करीब जाकर उसका बदन धीरे से चाटने लगी। पसीने से चिपचिपाये मनुआ के बदन को चाटते ही वह थू-थू कर उठी। मनुआ भी अपना नाटक खत्म कर उठ बैठा और इमली का झोंटा पकड़कर चिल्ला उठा, 'डायन ! तू डायन है।'

इमली ने उसका हाथ झटककर उसे धकेला और चीख उठी, 'तू छोट जतिया है, मक्कार है। तूने मुझे धोखा दिया है।'

और दोनों एक-दूसरे को छोट जतिया और डायन कहकर चीखने-चिल्लाने और झगड़ने लगे। थोड़ी ही देर में वे गाली-गलौच पर उतर आये। उनके झगड़ने की आवाज रात के सन्नाटे में मुहल्ले में दूर-दूर तक गूंज उठी। उनके घर के आसपास अंधेरे में छिपे लोग मुस्कुरा उठे। उनकी मुराद पूरी हो गयी थी। पति-पत्नी में लोगों ने आखिर फूट डलवा ही दी थी।

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विजय शंकर विकुज

द्वारा - देवाशीष चटर्जी

ईस्माइल (पश्चिम), आर. के. राय रोड

बरफकल, कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के निकट

आसनसोल - 713301

ई-मेल - bbikuj@gmail.com

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