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प्रजातंत्र से भीड़तंत्र की ओर - दीपक दीक्षित


राजतन्त्र की अवधारणा (जहाँ राजा अपने मंत्रियों से सलाह कर प्रजा के हित में फैसले लेता था और राजा का चुनाव नहीं होता था बल्कि ये स्थान या तो विरासत में मिलता था या तलवार के जोर पर हथियाना पड़ता था) से प्रजातंत्र (जहाँ जनता चुनाव कराती है की कौन राज्य करेगा) की ओर बढ़ना हमारी विकास यात्रा में एक शुभ संकेत था ।

इसमें मंत्रियों के समूह का चुनाव राजतन्त्र की व्यवस्था के अनुसार ही रखा गया और चुनाव के लिए एक व्यवस्था बनाई गयी। राज्य का काम नियम बनाने तक सीमित कर दिया गया और इन नियमों का पालन कराने के लिए कार्यपालिका और दंडविधान निर्धारित करने हेतु न्यायपालिका बनाई गयी।

कालांतर में प्रजातंत्र के इन तीन स्तम्भों में मीडिया नामक चौथा स्तम्भ भी सहज ही जुड़ गया जो तकनीक और विज्ञान के प्रभाव से अधिकाधिक शक्तिशाली होता गया।

लड़ाइयां अब तलवार की बजाय दिमाग से लड़ी जाने लगी हालाँकि हथियारों की होड़ में हमने इतने हथियार जमा कर रखे हैं कि इस दुनिया को कई बार नेस्तनाबूत किया जा सकता है।

सरकार के लिए शक्ति समीकरण अब इस बात से निर्धारित किया जाने लगा कि कौन कितने वोट हथिया सकता है और मीडिया (हाउस) की शक्ति इस बात से निर्धारित होने लगी कि कौन कितने लोगों को अपने उत्पाद बेच सकता है।

वोट हासिल करने के लिए चुनाव से पहले पार्टियों ने अपनी बात कहने के लिए सभाएं करना शुरू किया जिसमें येन केन प्रकारेण भीड़ इकठ्ठी की जाने लगी। पैसे देकर और बरगलाकर लाई गयी भीड़ की जबरदस्ती बुलवाई गयी हुंकार को राजनेतओं ने अपनी शक्ति समझने की भूल की और भीड़ जुटाने का यह व्यवसाय तेजी से तरक्की करने लगा। यही नहीं भीड़ का एक वीभत्स रूप हमें विधायकों द्वारा सदन की कार्यवाही में व्यवधान डाल कर सदन का ही स्थगित करने के रूप में देखने को मिला।

अब तो भीड़ की इस ताकत का उपयोग नामी गिरामी नेताओं की तर्ज पर छुटभैय्या और स्थानीय नेता भी करने लगे है। भीड़ इकठी हो जाय तो व्यवस्था कुछ देर के लिए पंगु हो जाती है जिसका फायदा उठाकर उत्तेजित लोग मनमानी कर डालते है। मुकदमों के बोझ से दबी और चींटी की चल से चलती हुयी न्यायव्यवस्था को अपराधी मनमाने ढंग से भटकते है और इस प्रक्रिया में पीड़ित अक्सर किसी न किसी मोड़ पर दम तोड़ देता है।

भीड़ द्वारा किये गए इस कथित न्याय से पूरी व्यवस्था दूषित होने लगी है। ऐसा लगता है हम प्रजातंत से अब भीड़तंत्र की ओर बढ़ने लगे हैं।

दीपक दीक्षित

लेखक परिचय

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा एक साँझा संकलन ‘हिंदी की दुनिया,दुनियां में हिंदी’ (मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद) प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

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