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हास्य-व्यंग्य - ए जी,ओ जी,लो जी,सुनो जी….! डॉ प्रदीप उपाध्याय,

ए जी,ओ जी, लो जी, सुनो जी वन टू का फोर,फोर टू का वन जैसा कारनामा तो लखन ही कर सकता था लेकिन नहीं जी !अब तो यह खुले बाजार हो चला है। हर किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे के नाम के साथ जी। नाम के साथ जी लगाना मजबूरी है या दिल से निकलने वाला सम्मान का भाव !मुझसे किसी ने पूछा ।तो मैंने तो यही कहा कि भाई,यह तो शिष्टाचार है भले ही वह लायक हो या न हो। लिहाज रखने के लिए तो नाम के साथ जी जरूरी है।

लेकिन वे सहमत नहीं हुए, बोले-यह जी तो जी का जंजाल बन गया है। माना कि टू जी,थ्री जी ने परेशान कर रखा था लेकिन उनको इस बात का तो ध्यान रखना था कि इनका अर्थ लाभ पाने के चक्कर में सामर्थ्य लाभ खो देना पड़े ,ऐसा जी किस काम का!यही हाल अभी फिर से जी का हो रहा है। हमने कहा-जी से परहेज तो नहीं होना चाहिए। हमारी तो घराली(घरवाली) ही सुबह-शाम हमें ए जी,ओ जी, लो जी,सुनो जी करती रहती हैं लेकिन हमने आजतक कभी इस बात पर न तो बुरा माना ,न परेशान हुए और न ही इस बात पर गौर फरमाया कि इस जी में कहीं कटाक्ष है या मान-सम्मान या फिर आदर-सत्कार का भाव!वैसे तो हमने जब-जब उनसे कहा कि-प्रिये,ये क्या तुम हमें ए जी,ओ जी कहती रहती हो,हमारे नाम से सीधे क्यों नहीं पुकारती , तो वे यही कहती हैं कि अरे हुजूर, मर्यादा का तो हमें ध्यान रखना पड़ता है,कैसे नाम से पुकार सकती हैं। रिस्पेक्ट नाम की भी कोई चीज है कि नहीं!

इस वार्तालाप के बाद अब हमें  इस ए जी, ओ जी में भी संशय होने लगा है। क्योंकि मार्केट में यह स्पष्टीकरण भी चल ही रहा है कि जैश ए मोहम्मद के प्रमुख यानी आतंकी सरगना मसूद अजहर को  राहुल गांधी जी द्वारा कहा गया सम्बोधन मसूद अजहर जी कांग्रेस पार्टी की नजर में तंज है। वैसे तो पूर्व में भाजपा के केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद जी भी एक आतंकवादी के नाम के साथ जी का प्रयोग कर चुके हैं। हालांकि इसे भी उन्होंने कटाक्ष ही बताया था। इस मामले मे कांग्रेसी दिग्गज दिग्विजय सिंह जी भी आदर देने में कहाँ पीछे रहे हैं। उन्होंने ओसामा जी और हाफिज़ सईद साहब कहकर आतंक के पर्याय लोगों को मान देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। वैसे भी आरोप लग जाने से ही तो कोई अपराधी नहीं हो जाता!

बहरहाल, अब जी लगाकर मान दिया जाता है या कटाक्ष किया जाता है, यह आज के हालात में विचारणीय हो गया है। किसी समय माननीयों-सम्माननीयों के नाम के साथ जी के प्रयोग में उन्हें साम्प्रदायिकता की बू आती थी लेकिन आज तो देश के, समाज के और कानून के दुश्मन भी जी हो गए हैं तब प्रश्न यही है कि क्या इस मामले में अब समाजवाद आ गया है। अगर यह तंज है तो प्यार से, दुलार से,मान से होने वाला जी कैसा होगा! कहीं ऐसा तो नहीं कि पत्नी मर्यादा के नाम पर या डर के कारण ए जी,ओ जी करती फिरती हैं तब ऐसे में लगता है कि कुछ तो मजबूरियाँ उनके आसपास भी मंडराती होंगी जो मान देने के लिए तंज का बहाना बनाकर उनके नाम के साथ जी लगाते हैं।

डॉ प्रदीप उपाध्याय,16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.

व्यंग्य 5324985912390841185

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