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रोचक निबंध मुमकिन नामुमकिन डा. सुरेन्द्र वर्मा

बहुत कठिन है यह तय कर पाना कि क्या मुमकिन है, और क्या नामुमकिन। एक व्यक्ति के लिए जो संभव होता है वही किसी अन्य व्यक्ति के लिए असंभव हो जाता है। मोटे रूप से यह कहा जा सकता है कि किसी बात का मुमकिन या नामुमकिन होना बहुत कुछ देश, काल, परिस्थिति और व्यक्ति पर निर्भर होता है। ऐसे तमाम लोग हैं जो नामुमकिन को मुमकिन बना देते है। लेकिन ऐसे लोगों की कमी भी नहीं है जो पहले से ही नामुमकिन कहकर, बल्कि कहना चाहिए, नामुमकिन होने का बहाना बनाकर, काम शुरू ही नहीं करते। आराम बड़ी चीज़ है। जहां तक हो सके काम से कन्नी काटिए। हो भी रहा हो तो काम को नामुमकिन करार कर दीजिए। मौज कीजिए।

बेशक कुछ बातें अपने आप में नामुमकिन होती है। लेकिन यह शायद पूरा सच नहीं है। वस्तुत; उन्हें संभव बना पाने के लिए शायद हम दृढता से लगे नहीं रह पाते। एक बुद्धिमान व्यक्ति और मूर्ख में बड़ा फर्क यही है कि बुद्धिमान व्यक्ति केवल उन्हीं चीजों को प्राप्त करने की कोशिश करता है, जिन्हें प्राप्त करना वह संभव समझता है। लेकिन मूर्ख व्यक्ति उस नामुमकिन को प्राप्त करने के लिए दौड़ लगाता है, जहां जाने से कोई भी बुद्धिमान डर के मारे कांपता है।

वैसे, कहते हैं, नामुमकिन एक बुरा शब्द है। जो लोग इसे अक्सर दोहराते हैं, उन्हें यह कोई अच्छा फल प्रदान नहीं करता। ज्यादह्तर इसका परिणाम बुरा ही होता है। नेपोलियन ने एक बार कहा था ‘नामुमकिन’ सिर्फ मूर्खों के शब्दकोष में पाया जाने वाला शब्द है। वह (नेपोलियन) इस मूर्खतापूर्ण शब्द को सुनना कभी पसंद नहीं करता था।

असल में तो नामुमकिन कुछ भी नहीं होता। बस रास्ता भर तलाश करने की ज़रुरत है। नामुमकिन को, निश्चित तौर पर, मुमकिन बनाया जा सकता है। यदि आपमें पर्याप्त संकल्प और इच्छा-शक्ति है तो आप निश्चित ही सही रास्ता तलाश ही लेंगे। किसी भी कार्य को पहले से ही ‘असंभव’ बता देना उसे करने की कोशिश ही न करने का एक बहाना-भर है।

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। क्रिया रूप में कुछ लोग ‘अकर्मक’ होते हैं, कुछ कर्मक (पढ़ें, कर्मठ)। दुनिया की सारी परेशानियां इन कर्मठ लोगों की वजह से ही हैं। कुछ न कुछ सही-गलत करते ही रहते हैं और बस, पता-भर लगाते रहते हैं कि क्या मुमकिन और क्या नामुमकिन है। ये लोग, मुमकिन तो मुमकिन, जो नामुमकिन है, उसे भी मुमकिन बनाने की दिशा में लोगों को उकसाते रहते हैं। इसे हम यों भी समझ सकते हैं। पहले वाले वर्ग में वे लोग आते हैं जो ‘पलायनवादी’ हैं। उन्हें आप ‘नामुकिनवादी’ भी कह सकते हैं। नामुमकिन बता कर वे अपने निर्धारित काम से पलायन कर जाते है। इसके विपरीत ‘मुमकिन-वादी’ पलायन नही करते। लड़ने की कूबत रखते हैं।

नामुमकिन एक नकारात्मक शब्द है। सकारात्मक सोच के लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते। नामुमकिन कहने की बजाय वे ‘मुमकिन’ को ‘कठिन’ बताते हैं। अपना अपना नज़रिया। अरे, सीधे सीधे नामुमकिन ही कह दो, या फिर, करके दिखाओ। घुमाकर नाक पकड़ने का क्या मतलब ?

नामुमकिन को मुमकिन बना देने की कूबत पर कुछ लोग अपनी डींग भी हांकते हैं। इन्हें अपने पर भरोसा नहीं होता। लेकिन डींग हाँकने की अपनी पाक-हरकत से बाज़ नहीं आते। क्या पता सामने वाला बातों में आ ही जाए !

मुमकिन – नामुमकिन का सनातन द्वैत है। चलता ही रहता है। अन्य विरोधी पक्षों की तरह इनके बीच समन्वय की गुंजाइश कम ही होती है। “थीसिस-एंटीथीसिस –सिंथेसिस” का सूत्र यहाँ काम नहीं करता। या तो “मुमकिन’ होता है, या फिर ‘नामुमकिन”। समझौता असंभव है। मुमकिन नामुमकिन नहीं होता और नामुमकिन मुमकिन नहीं होता। वजूद दोनों का फिर भी कायम रहता है।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, प्रयागराज -२२१००१

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