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पुस्तक समीक्षा - पानी का पेड़ - जीवन से संवाद करतीं कविताएं -विजय शंकर विकुज

कविता हूं मैं

मेरी स्मृति में मनुष्य तुम सदियों से हो

अगर तुम मुझे अपनी यादों में बसा लो

तो वचन देती हूं मैं तुम्हें

उन पापों से अब भी बचा लूंगी

जिनसे होती हैं सभ्यताएं नष्ट।

दिनेश कुमार शिल्पांचल के उन कवियों में हैं जिनकी कविताएं हर जगह जीवन से प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से संवाद करती दिखाई देती हैं। जीवन से साक्षात करती दिखाई देती हैं। जीवन में उतरकर आदमी के व्यवहार और संवेदनाओं की शल्य क्रिया करती नजर आती हैं। आदमी की आंखों को खोलती हैं। उनके संग्रह ‘पानी का पेड़’ की कविता एक दिन की सीख, मेरा वह मित्र, पेड़ों की उपस्थिति में, माटी, बटन, सूतली, अफ़साना और हकीकत, इच्छा, गुंडे, कविता हूं मैं, पानी-पानी, चुप्पी, चेहरा जैसी अन्य कविताओं को पढ़ते हुए आदमी खुद को टटोलने को बाध्य हो जाता है और उसे जीवन का वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य साफ नजर आने लगता है।

संग्रह की पहली कविता ‘एक दिन की सीख’ में बच्चों को सुख-दुख को लेकर मां की शिक्षा में उसकी जीवनभर की अनुभूतियों का निचोड़ है। इस कविता की दृष्टि बहुत ही सूक्ष्म है जहां जीवन की संवेदनाओं और व्यवहार के यथार्थ की थाती एक मां अपनी संतान को सौंपती है ताकि उसकी संतान की संतानों में जीवन को आत्मसात करने का आत्मबल प्राप्त हो। वास्तव में माता-पिता के संतान के प्रति व्यवहार से उनके जीवन में सुधार होता है, कविता सही संदेश देती है।

‘कीड़े’ इस संग्रह की बहुत ही गहराई से बात कहने वाली एक कविता है। दादी के बाद पिताजी और फिर खुद कवि जीवन के इस यथार्थ को समझता है कि झूठ बोलने वाले लोग कीड़े बन जाते हैं। यह कविता जिस प्रतीक को पेश करती है, वह बड़ा ही मारक है। इस सच को समझने वाले लोग भी इस मानने को तैयार नहीं होते हैं। देश के विभिन्न शहरों के झूठ बोलने वाले ऐसे लोग अब हर गांव-मुहल्ले तक पहुंच गये हैं। यही बात एक बालिका भी समझ जाती है और अपने पिता को उसके दरवाजे पर पहुंचे कीड़ों के बारे में बताकर एक कड़वी सच्चाई का संकेत देती है।

‘पानी का पेड़’ इस संग्रह की शीर्षक कविता है। पानी जीवन है और पेड़ भी जीवन है। दोनों के बचे रहने पर ही आदमी के जीवन का सफर आगे बढ़ सकता है। यही संवेदना है और जीवन की गति है। इसकी उपस्थिति से ही आंखों में सपने पलते हैं और सभी में थरथराहट की अनुभूति होती है। यह कविता जीवन को एक सकारात्मक संदेश देती है जिसे अपनाना बहुत जरूरी है।

इस संग्रह में ‘कविता हूं मैं’ अन्य कविताओं की तरह सीधे आदमी से संवाद करती है। यहां यह साफ दिखाई पड़ता है कि कविता भी जीवन का दूसरा रूप है, कहा जाये तो पर्याय है। कविता जगने से जीवन जगता है। कविता जब मनुष्य को छूती है तो उसमें समाहित अमानवीय भावना स्वतः ही समाप्त हो जाती है। कविता में वह क्षमता है जो मनुष्य को देवताओं-सा अमर बना दे। ‘नकली दृश्य’ कविता पढ़ते हुए आज के तकनीकी विकास में मनुष्य के पिछड़ने की सच्चाई सामने आती है। इसके कारण धीरे-धीरे मानवीय संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है लेकिन हमें इसका पता ही नहीं चल रहा है। यह कविता छद्म जीवन की कड़वी सच्चाई के साथ ही विकट भविष्य को हमारे सामने पेश करती है। यह मनुष्य के असली बनाम नकली जीवन की शल्य क्रिया करती हुई हमें एक ऐसे आईने के सामने खड़ी करती है जहां हमें अपना भयानक चेहरा नजर आता है।

‘फिर’ कविता में कवि दिनेश कुमार ने मनुष्य के जीवन की विभिन्न परिस्थितियों, इच्छा, विवशता, संघर्ष और यथार्थ का बेहतरीन चित्रण किया है। ‘एक कविता भर जीवन’ में कवि जीवन को जिस रूप में देख रहा है, वह सृजन का संदेश देता दिखाई दे रहा है। यह सच है कि कविता सिर्फ कागज पर ही लिखी नहीं जाती, वे तो हमारी अनुभूतियों ओर किसी न किसी माध्यम से अभिव्यक्ति के रूप में अपनी आत्मीय संवेदना से हमें गतिशील और संवेदनशील रखती है।

दिनेश कुमार की कविताओं को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात मन में उभरती है, वह यह कि बहुत बड़ी बातें कहने के लिए बहुत बड़ी जगह की जरूरत नहीं पड़ती। एक समर्थ रचनाकार एक छोटी जगह या कहें तो सीमित दायरे में भी दुनिया की संवेदनाओं और यथार्थ को प्रस्तुत कर सकता है। कथन में संवेदना की गहराई और संतुलन हो तो यह सहज ही संभव है।

दिनेश कुमार की कविताओं में उतरने के बाद निश्चय ही एक संवेदनशील व्यक्ति जीवन की विभिन्न संवेदनाओं से दो-चार होता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए कवि की दर्शन दृष्टि का भी साफ आभास होता है जो हमें हर जगह सच्चाई को लेकर गहराई से सोचने को बाध्य करती है। यह सही है कि इन कविताओं में उतरते हुए कवि की काव्य यात्रा की सीमा और सामर्थ्य का तटस्थ आकलन भी किया जा सकता है जो आज के समय में बेहद आवश्यक है। ‘पानी का पेड़’ संग्रह की कविताओं में कहीं-कहीं हल्का-सा लय का टूटना भले ही महसूस किया जा सकता हो लेकिन कविताओं के भाव का प्रभाव हमेशा ही पाठक को बांधे रखने में पूर्ण रूप से सफल है।

एक कविता की गुंजाइश

हमेशा रहती है हर एक के जीवन में

कविता के बिना जीवन का

होना क्या या जीवन का खोना क्या ?


पुस्तक - पानी का पेड़ (कविता संग्रह)

लेखक - दिनेश कुमार

मूल्य - 150 रुपये, पृष्ठ - 132

प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, नाला रोड

जयपुर - 302 006

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विजय शंकर विकुज

द्वारा - देवाशीष चटर्जी

ईस्माइल (पश्चिम), आर. के. राय रोड

बरफकल, कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के निकट

आसनसोल - 713301

ई-मेल - bbikuj@gmail.com

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