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सुख अमृत मिले - गीता द्विवेदी की काव्य रचनाएँ

सुख अमृत मिले --(01)

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सुख अमृत मिले सभी को ,

दुख गरल न दृश्यमान हो ,

उत्साहित , उल्लासित सभी ,

प्रगति पथ पर गतिमान हों ,

ऐसा हो नववर्ष सभी के लिए ,

पग - पग पर दीप दिव्यमान हो ।

शुभ बसंत सम दिवस बीते ,

तो क्षण तृप्ति अशेष समाहित ,

उषा अलौकिक करे स्वागत ,

संध्या अपूर्व शांति अर्पित ,

एकता- सूत्र अटूट रहे सदा ,

सर्वत्र प्रेम प्रवाहमान हो ।

घर - घर, सीता - राम की छवि ,

घट - घट, राधे -श्याम हों ,

हाँ आनेवाला वर्ष मेरे प्रिय ,

भारत देश के नाम रहे

सारे यश विभुतियों का

बस यहीं विश्राम हो ।

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हरा सोना  (02)

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धरती माँ पहनती हैं ,

गहने...हरे सोने के ,

सभी गहने सुन्दरता बढ़ाते हैं ।

छोटे , बड़े सभी आकार के ,

सुगंध प्रदायक ,

वायु शुद्ध करनेवाले ।

दूब , तुलसी ,नीम ,पीपल ।

नागफनी और बबूल भी ।

विचित्र बात है न!

हम धरती माँ की ,

इन्हीं हरे गहनों के बीच

जन्म लेते और जीवन बिताते हैं ।

फिर भी इन्हें समझने में ,

कितनी देर लगाते हैं ।

धरती माँ के निर्दोष हरे गहने ,

निर्दयतापूर्वक तोड़ते  , नोचते ,

काटते , छाँटते , टुकड़े - टुकड़े कर देते हैं ।

इतने से भी जी नहीं भरता तो ,

जला कर संतुष्ट होना चाहते  हैं ।

पर नहीं , अभी तो इन्हें समूल नष्ट करना है ।

और सभ्य होने का भ्रम पालना है ।

दिखने दो धरती माँ को ,

कुरूप ..... पीड़ित ,

हम तो प्रसन्न रहेंगें ।

नष्ट कर गहने ,

हरे सोने के गहने ।

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चौपाई:--- मित्रता (03)

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राम ने मित्र की आन बचाई ।

बालि हनन कर राज दिलाई ।।

हम पर भी प्रभु कृपा कीजै ।

भक्ति वर दे शरण अब लीजै ।।1।।

कृष्ण सुदामा की प्रिय है जोड़ी ।

मित्रता ये जाए न तोड़ी ।।

निर्धन मित को कण्ठ लगाया ।

अतूल धन दे कष्ट मिटाया ।।2।।

वो नर जग में है बड़भागा ।

जिसके हृदय प्रेम है जागा ।।

मित्र की महिमा वरणी न जाई ।

इसमें जल सी है शीतलाई ।।3।।

छल बल कपट मोही न भावे ।

स्वारथ त्याग परम पद पावे ।।

संकट में जो साथ न छोड़े ।

मित है जो नाता हित जोड़े ।।4।।

सुख के क्षण का साथी बनता ।

जो संकट में देख पलटता ।।

उनसे न मित्रता निभाओ ।

जीवन से भी दूर हटाओ ।।5।।

माखन चोरी कान्हा करते ।

इत उत देखें भाग निकलते ।।

मित्रों के संग खेलें होली ।

ले गुलाल भर भर के झोली ।।6।।

सच्चा साथी राह दिखाता ।

आगे बढ़ के दीप जलाता ।।

उससे नहीं किनारा करना ।

दुख म़े पड़े सहारा बनना ।।7।।

हिय संताप हरे प्रिय बोले ।

राज कभी न मित्र का खोले ।।

निभती है कब छल से यारी ।

है विश्वास पर रिश्तेदारी ।।8।।

कंटक मध्य पुष्प हैं  रहते  ।

पर भयभीत न खुलकर खिलते ।।

संगत ऐसी करना भाई ।

सदगुण वृद्धि जग में बड़ाई ।।9।।

जल अग्नि की कैसी मिताई ।

एक जारे दूजा बुझाई ।।

विपरीत गुण वालों को जानो ।

पुरब और पश्चिम है मानो ।।10।।

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ऊन के गोले   (04)

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एक सुहाना दौर था वो ,

जब घर की महिलाएँ ,

रोजमर्रा के काम से निवृत हो ,

ठण्ड के मौसम में ,

धूप में बैठकर ,

ऊन सुलझाती थी ,

हँसते , चुहल करते ,

स्वैटर , टोपी , मफलर , मोजे ,

बुनती भी जाती थी ।

नयीं डिजाइनें सीखने को ,

होड़ मची रहती थी ,

अपने नन्हें - मुन्नों को पहना कर ,

अतीव आनंद का अनुभव करती थीं ।

अब अतीत बन गया

सलाइयों का आपस में टकराकर ,

प्रेम और अपनत्व बिखेरना ,

रंग - बिरंगे गोलों का ,

आँगन में लुढ़ककर ।

खुशियाँ समेटना ।

अब सिर्फ़ यादें बची हैं ,

उस सुहाने दौर की ,

वे भी धीरे - धीरे शायद ,

लुप्त हो जाएँगीं ।

क्या जिंदगी भी ?

ऊन को गोलों सी ,

लुढ़कती नहीं है , कभी - कभी ,

उलझती भी है ।

हम समेट लेते हैं ,

सुलझा भी लेते हैं ।

उलझे पल , उलझे रिश्ते ।

और बुनने लगते हैं ,

आनंद और उल्लास ।

रंग - बिरंगे ऊन की तरह ,

ऊन के गोलों की तरह

    -----000----

तू मुझे देख मैं तुझे देखूँ   (05)

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तू मुझे देख मैं तुझे देखूँ ,

तू मुझे सोच मैं तुझे सोचूँ ,

जनम सफल हो जाए कान्हा ,

तेरे हृदय में जो जगह ले लूँ ।

तेरे चरण जहाँ भी पड़ें ,

वहाँ मैं अपना शीश रखूँ ,

रहे प्रसन्न मुझपर सदा ,

ऐसे सारे जतन करूँ ।

अपनी मुरली परे रखकर ,

कभी मेरी सुध भी ले लेना ,

छोड़ कभी ब्रजधाम कन्हैया ,

मेरी कुटिया में रह लेना ।

पर अकेले नहीं क्योंकि ,

राधा भी मुझे प्यारी हैं ,

श्याम साँवरे उनको मेरा ,

ये संदेश दे देना ।

धन्य - धन्य वे लोग हैं ,

जो तुझे नित ध्याते हैं ,

मैं मूरख जड़ अज्ञानी ,

दया कर दर्शन दे देना ।

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मुझे भी जीना है   (06)

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इस संसार में आनेवाला हर जीव जीना चाहता है । वह कभी मृत्यु की कामना नहीं करता । जब तक कि उसे किसी असहनीय पीड़ा से न गुजरना पड़े । पर मानसिक पीड़ा ही अधिक कष्टदायी होती है ,शारीरिक पीडा़ से । एक स्त्री शिशु -जन्म के समय, घण्टों असहनीय पीड़ा से गुजरती है । पर उसके  बाद शिशु का मुँह देख , सारा कष्ट भूल जाती है । वो अलौकिक आनंद  में डूब जाती है । कोई फर्क नहीं पड़ता ......शिशु पुत्र है या पुत्री । पर सदियों से ये मान्यता भी चली आ रही है कि बेटा ही कुल का दीपक है । बुढ़ापे का सहारा है । और भी बहुत कुछ ....... । पर इस वजह से बेटियों के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाना कतई उचित नहीं । क्योंकि बेटियों के बिना भी घर , घर नहीं रह जाता । बेटियाँ भी माता - पिता को सुख देती हैं , उनका नाम रौशन करती हैं । फिर भी  आज के सभ्य समाज में , उन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए अनवरत संघर्ष करना पड़ता है । ये सोंचकर ही हृदय दहल उठता है कि जिसने अभी जन्म भी नहीं लिया , उसके अंत की तैयारी हो जाती है। तब मानवता कहाँ खो जाती है । तब धर्म कहाँ तिरोहित हो जाता है । आइये , हम सब चिंतन करें । समाज की इस दुषित मानसिकता को दूर करने को , दृढ़ संकल्प हों । तभी , बेटी का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा और उसे कभी कहना नहीं पड़ेगा । मुझे भी जीना है ...... माँ मुझे भी जीना है ।

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क्या नाम दूँ उसे (07)

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एक शक्स कल मेरे पास ,

मुस्कुराते हुए आया,

थोडी़ देर में उल्टे पाँव ,

उसे जाते हुए पाया ।

जल्दी से आईना देखा ,

चेहरा तो ठीक -ठाक था ,

शायद उसने अपने जैसा ,

स्वभाव नहीं था पाया ।

न टीका न  टोपी थी ,

जो आकर्षित कर जाते ,

भारतीयता का क्या करूँ ,

जो जन्म से ओढ़े आया ।

मैने भीे उसे रोका नहीं ,

नहीं वो अपना भाई था ,

पर जेहन में अटका रहा ,

कैसा उन्माद था छाया ?

मेरे जैसे ही दो हाथ ,

दो पाँव उसके भी थे ,

पर गंध नफरत की थी ,

जिसे वो त्याग न पाया ।

दो - चार पत्थर चलाता ,

या गोलियाँ बरसा लेता ,

तभी उसे मिलती शांति ,

था आतंक का जाया ।

चाहता हूँ ऐसे लोगों का ,

अंत करूँ चुन - चुन कर ,

उन्हें जलाने को दिल में ,

अनल धधकता पाया ।

सोने जैसे मेरे देश में ,

ऐसे लोगों का काम नहीं ,

सच कहूँ तो उसका जाना,

मुझे रास बहुत है आया ।

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मनहरण घनाक्षरी (08)

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मेरे घर आओ कान्हा , होली खेल जाओ कान्हा ,

आना  ना  अकेले पर , राधा प्यारी साथ हों ।

मन  में उमंग  भर , सातों  रंग  सजाकर ,

नीली -पीली  पगड़िया , तुम्हरे  ही  माथ हो ।

अबीर - गुलाल लिये , खड़ी हूँ मैं द्वार पर ,

होली का आनंद तभी , जब तेरा साथ हो ।

ऐसा  क्षण  नित  रहे , गहरी  ये  प्रीत रहे ,

जानती हूँ श्याम तुम , सबके ही नाथ हो ।

--

गीता द्विवेदी

C/o अनुज पान्डेय

अन्नपूर्णा जनरल स्टोर

भठ्ठीरोड़ केदारपुर अम्बिकापुर

सरगुजा (छत्तीसगढ़)

कविता 8862114645173491374

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