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रतन लाल जाट की लघुकथाएँ

 

 

लघुकथा-

कीमती चीज़

रतन लाल जाट

वह अपनी होने वाली पत्नी के साथ ट्रेन में बैठे हुए कह रहा था- "तुझे पता है, जब मैं स्कूल जाता था। तो केवल एक ही ड्रेस थी। जो गन्दी हो जाती थी। तब उसके अगले दिन रंग-बिरंगे दूसरे कपड़े पहनकर जाता था। वो भी फटेहाल ही होते थे।"

यह कहते हुए वह हँसा और फिर थोड़ा रूक गया। तो लड़की ने मुस्कुराते हुए आगे सुनने की जिज्ञासा प्रकट की। फिर आगे उसने कहा- "तुझे पता है? तब मुझे गुरूजी बहुत मारते थे और कपड़े बदलने के लिए वापस घर भेज देते थे। वो सब मुझे अब भी याद है। उन्होंने बहुत कोशिश की। लेकिन मैं नहीं सुधरा और न ही पढ़ पाया।"

यह कहते हुए वह कुछ उदास हो गया।

तो इस पर लड़की ने मीठी गुड़की के साथ डाटते हुए कहा- यदि गुरूजी की बात मान लेते, तो अच्छा रहता। अभी तुम कुछ और ही होते।

यह सुनकर उसे लगा, जैसे उसने कोई कीमती चीज़ खो दी हो।

इस कीमती चीज़ का अन्दाज़ एम ए कर रही उमा को तुरंत लग गया था। तब उसने यह कहते हुए उसे सांत्वना देने के साथ-साथ विश्वास दिलाते हुए कहा- "दीपक, तुम एकबार वापस अपने गुरूजी के पास जाओ और उनसे कहो कि आप मेरी गलतियाँ माफ करके मुझे कोई रास्ता बताइये। इससे निश्चित रूप से तुम्हारी तकदीर बदल जायेगी।"

जब दूसरे ही दिन दीपक ने जाकर गुरूजी के चरण-स्पर्श किये और अपनी पीड़ा प्रकट की। तब गुरूजी ने उसे स्टेट ओपन परीक्षा देकर आगे पढ़ने की सीख दी थी।

इसका नतीजा यह निकला कि उसने बारहवीं उत्तीर्ण करके कॉलेज तक कर लिया और अब पत्नी के साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने लगा था।

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लघुकथा-

शहर की गाय

रतन लाल जाट

मैं अपनी बुआ को लेकर शहर के बड़े अस्पताल में गया था। क्योंकि उनको महीने में एक बार डॉक्टर को दिखाना जरूरी था। जब हम रेलवे स्टेशन पर ही बैठकर खाना खा रहे थे। तब वहाँ इधर-उधर घुमती हुई एक गाय दिखाई दी। तो अचानक बुआ शेष बची हुई रोटी गाय को देने के लिए उठ खड़ी हुई और अपने हाथ से ही उसे देने लगी। तो गाय डर के मारे दूर चलने लगी। तब बुआ ने रोटी उसके मुँह के आगे डाल दी थी। लेकिन गाय ने वह रोटी को नहीं खायी थी। केवल मात्र सूंघकर अपना मुँह मोड़ लिया था।

यह सब देखकर हमारे पास खड़े एक बुजुर्ग ने कहा- यह शहर की गाय है। जो रोटी नहीं, पॉलीथिन खाती है और यहाँ कौन गाय को रोटी देता है? यहाँ तो कुत्तों को पाला जाता है और उन्हें चाय के साथ ब्रेड खिलाये जाते हैं। इसमें गाय का कोई दोष नहीं है। -

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लघुकथा-

समझौता

रतन लाल जाट

मैंने एकदिन उसको कहा- तुम्हारे बारे में उसने ऐसा-वैसा कहा है। उल्टे काम मत करो और अपनी इज्जत का ख्याल रखो।

यह सुनते ही उसका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया और कहने लगा- वह कैसा है? क्या मुझे नहीं पता है? उस जैसा घटिया इन्सान नहीं देखा होगा। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि उसने मेरे बारे में ऐसा कैसे बोल दिया है? अब उसका चेहरा देखना भी पाप है मेरे लिए।

इस प्रकार दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप सुनने के बाद मैं खुद इस उलझन में पड़ गया कि आखिर कौन सही है और कौन नहीं?

तभी एकदिन अचानक ही मुझे वह तीसरा व्यक्ति मिल ही गया था। तो मैंने उस दूसरे के द्वारा कही गयी सारी बातें कह दी। उस वक्त उसके हाव-भाव भी देखने लायक थे। उसके पैरों तले की जमीन खिसक गयी थी और उस दूसरे की तरह ही मन की गुबार निकाला।

इसके बाद मैंने इस मामले में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया था। लेकिन उस दिन सारी दुविधा खत्म हो गयी। जब उन दोनों को साथ-साथ चलते हुए कुछ बातें करते हुए और खिलखिलाते-हँसते देखा था। दोनों एक-दूसरे की तारीफ़ों के पूल बाँध रहे थे। शायद उन दोनों ने एक-दूसरे की पोल खोलने के बजाय कच्चे चिठ्ठे अब कभी न खोलने की बात पर समझौता कर लिया था।

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लेखक-परिचय

रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट

जन्म दिनांक- 10-07-1989

गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया

तहसील- कपासन, जिला- चित्तौड़गढ़ (राज.)

पदनाम- व्याख्याता (हिंदी)

कार्यालय- रा. उ. मा. वि. डिण्डोली

प्रकाशन- मंडाण, शिविरा और रचनाकार आदि में

शिक्षा- बी. ए., बी. एड. और एम. ए. (हिंदी) के साथ नेट-स्लेट (हिंदी)


ईमेल- ratanlaljathindi3@gmail.in

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