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पुस्तक। समीक्षा पर्यावरण संरक्षण की सीख देता:पेड़ लगाओ ◆ समीक्षक : हेमन्त यादव "शशि"

 

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कृति का नाम : "पेड़  लगाओ" ( बाल कविता )

रचनाकार :राजकुमार जैन राजन

प्रकाशक :  अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली -110030

मूल्य :₹.250/ (सजिल्द ), प्रथम संस्करण :2018

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      बाल साहित्यकार राजकुमार जैन 'राजन' की नवीनतम कृति'पेड़ लगाओ' बाल कविता-संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई है। इसकी समीक्षा करने के पूर्व बाल साहित्य के  बारे में  दो शब्द कहना चाहता हूँ। हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक डॉ नामवर सिंह का कहना था कि  बाल साहित्य लिखना एक दुष्कर कार्य है। बड़ों का साहित्य लिखना आसान है लेकिन छोटों के लिए छोटों की भाषा में लिखना बहुत कठिन कार्य  है। इसी तरह  मैथिलीशरण गुप्त का भी कथन था कि बाल साहित्य में केवल मनोरंजन  ही नहीं बल्कि उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए। यही बाल साहित्य की लोकप्रियता का आधार भी है।  समझदार बड़े बूढ़े और अभिभावक श्रेष्ठ बाल साहित्य को प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहे हैं।  प्रख्यात कवि डॉ हरिवंश राय बच्चन ने साहित्यकार निरंकार देव सेवक को एक पत्र लिख कर कहा था कि मुझे अपने नाती-पोतों के लिए कुछ बाल कविताएँ चाहिए। तुम ऐसी कुछ रचनाएँ और रचनाकारों के नाम मुझे भेज सको तो अच्छा होगा। ' सेवक जी ने उनको किस रचनाकार का नाम और  उनकी रचनाएँ भेजीं, यह तो मैं नहीं जनता। लेकिन मैं आपको यहाँ एक ऐसे रचनाकार के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिनकी रचनाएँ बच्चों के लिए बहुत जरुरी हैं।


              'बाल साहित्य संवर्धन' में वर्षों से सक्रिय राजकुमार जैन,राजन' बाल साहित्य जगत में एक सुपरिचित नाम है।   बाल साहित्य के उन्नयन के लिए वे  तन, मन,धन से समर्पित हैं।  राजस्थान के आकोला में 24 जून 1969 को इनका जन्म हुआ है। इतनी कम उम्र में इन्होनें न केवल बाल साहित्य के उन्नयन के लिए पूरी ईमानदारी और परिश्रम से कार्य किया है, बल्कि बाल साहित्यकारों के साहित्य को प्रकाशित करने के लिए एक प्रकाशन संस्थान 'चित्रा प्रकाशन' भी चला रहे हैं। साहित्यिक सम्मानों के संस्थापक भी हैं। पिछले 12 वर्षो से ' सोहनलाल द्विवेदी बाल साहित्य पुरस्कार, 'डॉ राष्ट्रबंधु स्मृति बाल साहित्य सम्मान,' डॉ श्रीप्रसाद स्मृति बाल साहित्य सम्मान, ' बालशौरि रेड्डी स्मृति साहित्य सम्मान, ' चंद्र सिंह बिरकाली राजस्थानी बाल साहित्य सम्मान आदि प्रदान कर बाल साहित्यकारों का उत्साह वर्धन भी कर रहे हैं।


               राजन जी स्वयं भी न केवल बाल साहित्य बल्कि बड़ों के लिए भी उतनी ही ऊर्जा के साथ लेखन करते आ रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी हजारों रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे कई पत्र पत्रिकाओं का संपादन भी कर रहे हैं। बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न राजन जी को बावल साहित्य के उन्नयन और लेखन के लिए प्रादेशिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों बार सम्मानित किया जा चुका है।


              राजन जी की अबतक तीन दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में एक नवीनतम पुस्तक"पेड़ लगाओ",  अयन प्रकाशन ,नई दिल्ली से , बाल कविताओं के संग्रह के रूप में आई है। इस संग्रह में कुल 85 कविताएँ हैं। राजन जी के शब्दों में कहें तो, 'इस संकलन में आपको जंगल भी मिलेगा तो पशु पक्षी भी दिखाई देंगे। भैया के प्रति दुलार है तो दादा के प्रति असीम प्रेम भी। रोबोट की चाह है तो कम्प्यूटर की मांग भी है। ' हम कह सकते हैं कि बाल पाठकों की रूचि के विभिन्न विषयो, पेड़ पौधे, पानी, पशु पक्षी, नदी पहाड़,चाँद, कम्प्यूटर, पतंग आदि को लेकर सारी कविताएँ लिखी गईं हैं। सारे विषय और कथ्य बच्चे की बुद्धि के अनुसार ही लिए गए हैं। हालाँकि इसमें कुछ सामान्य कविताएँ भी हैं तो कुछ हास्य का पुट लिए हुए भी हैं।किन्तु भाषा बड़ी सरल और आसानी से समझ में आने वाली हैं। आइये,इस संग्रह की कुछ नायाब कविताओं पर दृष्टि डालें, जिनमें पर्यावरण की चिंता, ग्राम्य जीवन की झलक, जीवन जीने की कला आदि को बड़ी ही ख़ूबसूरती से पिरोया गया है।


            आज के भौतिक युग में जब पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करते हुए पेड़ों को बड़ी बेरहमी से काटा जा रहा है, पानी को बर्बाद किया जा रहा है, खनिज सामग्रियों का दोहन किया जा रहा है, इसे बचाने की आवश्यकता है। यह बात कविताओं के माध्यम से बच्चों को बताया गया है।  "पेड़ लगाओ" कविता के माध्य्म से बच्चों को पेड़ के महत्व को बताया है,' बात पते की खुद भी समझो/ और सभी को समझाओ/ अगर चाहिए शुद्ध हवा तो/इस धरती पर पेड़ लगाओ। इसी तरह पानी बचाने की सीख देती हुई इस कविता को बच्चे शायद ही भूल पाएंगे," पानी को सहेजें",  पानी अमृत जीवन का क्यों/ करते हम नादानी/ कैसे बीतेगा भू का कल/ बचा नहीं यदि पानी। बच्चों के स्कूली बस्ते का बोझ कम करने की जरुरत पर खूब चर्चा होती है। इसी को प्रतिपादित करते हुए ,"बस्ते का बोझ" में बच्चे की मनोदशा दिखाते हैं, ' तुम्हीं बताओ मुझको/ कैसे विद्यालय मैं जाऊं/ बोझा बस्ते का है भारी/ उठा नहीं मैं पाऊं। आज बच्चे कम्प्यूटर और मोबाईल चलाने में दक्ष हैं किन्तु जीवन जीने की कला में वे फिसड्डी होते जा रहे हैं। इस संग्रह में जीवन जीने की कला सिखाने वाली कविता है,"ऐसा काम न करना", हंसना और हँसाना अपना/जीवन का आदर्श हो/ देश हित मर मिटें हम/ चाहे जितना संघर्ष हो। एक और कविता की बानगी देखिये जिसमे बच्चों को भगवान महावीर के बारे में बताया गया है। कविता का शीर्षक है,"वर्धमान से महावीर", ' बचपन बीता राजमहल में/ पलकर बने फ़कीर/कठिन तपस्या करके जिसने/बदली अपनी तकदीर।  बच्चों को संत महात्माओं के बारे में बताना उतना ही जरुरी है, जितना विज्ञानं के बारे में बताना। महापुरुषों के बारे में बताने से बच्चे अपनी संस्कृति से परिचित होते हैं।  आजकल तो वैसे ही पाठ्यपुस्तकों से महापुरुषों की जीवनी को हटाया जा रहा है।


         राजन जी की कविता बच्चों को ग्राम्य जीवन से भी जोड़ती हैं। इसकी बानगी,"प्यारे गांव" में देखी जा सकती है, आँगन में पीपल की छावं/ हमको प्यारे लगते गाँव/ अमवा पर कौआ की काँव/हमको प्यारे लगते गांव। इसी तरह"शहर से अच्छा गांव" कविता में राजन जी बच्चों को गाँव के लोगो के आपसी भाईचारे के बारे में बताते हैं,'प्यारा अपना गांव जहाँ पर/खुश है हर बूढ़ा और बच्चा/कोलाहल से दूर हमारा/गाँव शहर से कितना अच्छा। आज बच्चे अपनी दादी नानी से कहानी सुनने की बजाय मोबाईल पर गेम खेलने में मस्त रहते हैं।  राजन जी की "सुनाओ कहानी"में एक बच्चा अपनी नानी से मीठी मनुहार करके कहानी सुनना चाहता है,' मेरी नानी प्यारी-प्यारी/मुझे सुनाओ एक कहानी/ सुन्दर महलों, दुर्गों वाली/ अच्छी-अच्छी वही पुरानी। इस कविता को पढ़कर बच्चे कहानी सुनने को प्रेरित होंगे।  
             संग्रह  में "अक्षर की कहानी", कविता का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूँगा क्योंकि इसमें बच्चों को हिंदी वर्णमाला के अ से लेकर ज्ञ अक्षर तक की पूरी जानकारी दी गई है,' अ से अनार और आ से आम/ पढ़ने के नहीं लगते दाम/इ से इमली, ई से ईख/ पढ़ा-लिखा ना मांगे भीख। छोटे बच्चों को यह कविता बहुत पसंद आएगी।


              संग्रह में सारी कविताओं के साथ चित्र भी दिए गए हैं जो कविता के आकर्षण को बढ़ाता है।इस संग्रह का मुद्रणऔर कलेवर शानदार है जो पहली ही नजर में आकर्षित कर लेता है।    कुल मिलाकर कह सकते हैं कि बाल साहित्य के पुरोधा स्मृतिशेष, डॉ श्रीप्रसाद जी एवं डॉ राष्ट्रबंधु जी को समर्पित, राजकुमार जैन'राजन' का यह संग्रह बहुत ही मनोरंजक , ज्ञानवर्धक  और प्रेरक है। बाल पाठको के लिए इसी तरह की पुस्तकों का प्रकाशन होना चाहिए। बच्चों और बड़ो,सभी को यह बहुत पसंद आयेगा। राजन जी को इस सुन्दर-सी कृति के लिए बहुत बहुत बधाई।◆

★ समीक्षक बाल साहित्य के क्षेत्र के ख्यातनाम वरिष्ठ रचनाकार हैं★
                              ◆ समीक्षक: हेमंत यादव'शशि'                             
                                हाई स्कूल रोड, पो.फारबिसगंज, जिला-अररिया
                                पिन-854318 (बिहार)

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