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दीपू ने भी खेली होली - बाल कहानी-गुडविन मसीह

दीपू ने भी खेली होली

कहानी-गुडविन मसीह

रंगों से सराबोर रंग-बिरंगे कपड़ों और लाल, पीले, नीले, काले रंगों में रंगे-पुते बन्दर जैसे दिखाई देने वाले कॉलोनी के सभी बच्चों को साथ मिलकर होली खेलते और ही..ही...ही...हा....हा....हा करके शोर मचाते, एक-दूसरे के पीछे पिचकारी लेकर भागते देख कमला रोमांचित हो गयी और मन में सोचने लगी, काश! फूलों की तरह हँसते-खिलखिलाते और रंग-बिरंगी तितलियों की तरह इतराते-इठलाते इन बच्चों के साथ अगर उसका बेटा दीपू भी होली खेलता, तो कितना अच्छा होता।

लेकिन दीपू तो पता नहीं किस मिट्टी का बना है। वह तो शुरू से ही दब्बू किस्म का है, उसे न तो ज्यादा खेलना‘-कूदना पसंद है और न ही दोस्तों के साथ रहना पसंद है, जब देखो कमरे में अकेला बैठा अपने स्कूल का होम वर्क करता रहता है। और बच्चों की तरह उसे टी.वी पर कार्टून देखने का भी शौक नहीं है। होली के रंगों से तो उसे बहुत डर लगता है, कोई सूखे गुलाल का टीका भी उसे लगाना चाहे, तो नहीं लगा सकता।

एक तो दीपू की ज्यादा बच्चों से दोस्ती नहीं है और जो दो-चार दोस्त हैं भी वो हर बार होली के दिन दीपू से मिलने घर आते हैं। सबके हाथों में रंग-बिरंगी पिचकारियाँ होती हैं। खुद भी वो सब लाल-पीले रंगों से रंगे-पुते होते हैं। सब आकर दीपू को अपने साथ चलने और उनके साथ होली खेलने के लिए उकसाते, पर दीपू होली खेलने के लिए साफ मना कर देता है और अपने कमरे में जाकर बन्द हो जाता है ताकि उसके दोस्त उसे अपने साथ न ले जा सकें। आखिरकार उसके दोस्तों को निराश मन लिये उसके घर से वापस जाना पड़ता है। हर बार होली पर वह दीपू के लिए ढेर सारे रंग और खूबसूरत-सी पिचकारी लाकर देती है, लेकिन दीपू है कि रंग और पिचकारी को हाथ भी नहीं लगाता है।

कितनी बार उसने दीपू को समझाया भी कि होली सबको खेलना चाहिए, क्योंकि होली के रंग प्रेम, सद्भाव और सौहार्द के प्रतीक होते हैं। एक-दूसरे को रंग लगाकर लोग एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम को दर्शाते हैं पर कमला के इतना समझाने के बाद भी दीपू के ऊपर कोई असर नहीं होता और कमला की लायी पिचकारी और रंग बेकार जाते।

‘‘आण्टी! पड़ोस के बिट्टू ने कमला से कहा।

बिट्टू की आवाज सुनकर कमला की विचार शृंखला टूट गयी। उसने पीछे घूमकर देखा। बिट्टू अपने हाथ में बहुत प्यारी-सी पिचकारी लिये खड़ा मुस्कुरा रहा था। बिट्टू की पिचकारी की बनावट बिल्कुल बन्दूक जैसी थी।

कमला बिट्टू से उसकी पिचकारी की तारीफ में कुछ कह पाती इससे पहले ही बिट्टू ने उसके ऊपर निशाना साध कर पिचाकारी का स्प्रिंग बन्दूक के स्ट्राइगर की तरह दबा दिया। उसकी पिचकारी से एक लाल रंग की लम्बी धार निकलकर कमला तक पहुँची, जिससे उसकी सफेद दूधिया साड़ी पर लाल रंग की लम्बी रेखा खिंचती चली गयी। यह सब देखकर कमला अवाक रह गयी, बिट्टू जोर से हँसा और हो...हो....हो....करता हुआ वहां से भाग खड़ा हुआ।

कमला को बिट्टू की यह शरारत बहुत अच्छी लगी। उसे ऐसा लगा, जैसे उस पर रंग बिट्टू ने नहीं, बल्कि दीपू ने डाला हो। इतना सोचते ही उसे यकायक दीपू का खयाल आया। उसने खिड़की से कमरे में झांक कर देखा। दीपू डरा और सहमा हुआ-सा चुपचाप अन्दर कमरे में बैठा हुआ था। उसका कमरा अभी भी अन्दर से बन्द था।

उसे देखकर कमला को ना जाने क्या सूझी वह झटपट बाजार गयी और वहां से बिट्टू की तरह बन्दूक वाली एक पिचाकारी और रंग खरीद कर ले आयी।

घर आकर उसने जल्दी-जल्दी रंग को पानी में घोला और पिचकारी में भरकर दीपू के कमरे के दरवाजे पर जाकर आवाज लगायी, ‘‘दीपू बेटा, बाहर रंग फिकना बन्द हो गया है, सब बच्चे नये-नये कपड़े पहन कर घूम रहे हैं। तुम्हारे दोस्त भी नये-नये कपड़े पहन कर बाहर घूम रहे हैं। अब तुम भी बाहर आकर अपने नये कपड़े पहन लो।’’

नये कपड़ों का नाम सुनकर दीपू सबकुछ भूल गया और जल्दी से दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर आया, तो उसकी नजर कमला के हाथ में थमी बन्दूक पर पड़ी। बन्दूक को देखकर वह उत्सकुकता से बोला, ‘‘अरे वाह मम्मी, यह बन्दूक किसके लिए लायी हो?’’

‘‘तुम्हारे लिए लायी हूँ। कमला ने कहा और बन्दूक उसके हाथ में थमाकर बोली, ‘‘लो, चलाकर देखो कैसी है?’’

दीपू ने कमला के हाथ से बन्दूक ली और उसी की तरफ निशाना साध कर उसने बन्दूक का घोड़ा दबा दिया। घोड़ा दबते ही बन्दूक में से लाल रंग की एक तेज धार निकली और कमला को रंगती चली गयी। वो सब देखकर दीपू को बड़ा मजा आया फिर उसने कई बार ऐसा ही किया, जिससे कमला की साड़ी पूरी तरह रंग कर लाल हो गयी। उसने फिर कमला के ऊपर निशाना साधा तो कमला हँस कर उससे बचने का अभिनय करने लगी। वह उससे बचकर इधर-उधर भागने लगी। कमला को डर से इधर-उधर भागते देख दीपू को बड़ा मजा आ रहा था । वह खूब जोर से खिलखिलाकर कर हँस रहा था और खुद भी बन्दूक लेकर अपनी मम्मी के पीछे-पीछे भाग रहा था और उन्हें रंग से भिगो रहा था। उसकी मम्मी भाग कर जिधर जा रही थीं दीपू भी उनके पीछे-पीछे उधर ही जा रहा था।

ऐसा करते हुए दीपू और उसकी मम्मी दोनों को बड़ा मजा आ रहा था। इस खेल और दौड़-भाग में दीपू के अन्दर से रंग का डर पूरी तरह निकल चुका था। उसकी पिचकारी में जब रंग खत्म हो गया, तो उसने अपनी मम्मी से रंग घुलवा कर पिचकारी में भरा और अपनी मम्मी से बोला, ‘‘मम्मी, मैं बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ होली खेलूं?’’

कमला तो यही चाहती थी कि दीपू कॉलोनी के सभी बच्चों के साथ मिलकर होली खेले पर वह दीपू के मुँह से यह बात सुनना चाहती थी। दीपू के मुँह से बाहर जाकर होली खेलने की बात सुनकर कमला को बहुत प्रसन्नता हुई।

उसने दीपू से कहा, ‘‘हाँ, क्यों नहीं बेटा, तुम बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ तब तक होली खेलो, जब तक तुम्हारा मन करे पर बेटा, किसी के साथ लड़ाई-झगड़ा मत करना और न ही किसी के मुँह पर रंग लगाना। और तुम भी रंग खेलते समय सावधानी बरतना। अपने चेहरे और आँखों को रंगों से बचाना। आँखों के लिए रंग नुकसान पहुँचा सकता है। चेहरा भी खराब हो सकता है।’’

‘‘ठीक है मम्मी, आप परेशान मत होना। मैं समझ गया मुझे रंग कैसे और किसके साथ खेलना है।’’ कहता हुआ दीपू हो....हो...हो...करके घर से बाहर भाग गया और अपने दोस्तों के साथ भाग-भाग कर शोर मचाकर होली खेलने लगा ।

दीपू के अन्दर से रंग का डर निकलते और उसको होली खेलते देख कमला भाव विभोर होकर मन-ही-मन कहने लगी, काश, मैं भी दीपू के साथ होली खेल पाती तो कितना अच्छा होता।

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चर्च के सामने, वीर भट्टी, सुभाषनगर,

बरेली 243001 (उत्तर प्रदेश)

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संक्षिप्त विवरण

नाम : गुडविन मसीह

पिता : श्री आर. एन. सी. लाल

माता : स्वर्गीय चन्द्रा

जन्म स्थान : बरेली उत्तर प्रदेश

जन्मतिथि : 8 अगस्त 1966

बतौर बाल साहित्यकार वर्ष उन्नीस सौ नवासी (1989) लगभग तीस वर्षों से निरन्तर बाल कहानियाँ, बाल उपन्यास, यात्रा वृतान्त संस्मरण बाल नाटक एवं बाल गीतों का सृजन ।

* ऑल इण्डिया रेडियो व दूरदर्शन के कई केन्द्रों से बाल कहानियाँ एवं बाल नाटकों का प्रसारण ।

'मंच पर मंचित होने वाले बाल नाटक

* गाड़ी (सामाजिक सद्‌भाव पर आधारित) माँ (मानवीय रिश्तों पर आधारित) हमारी दुनिया हमारे सपने (समाज की मुख्य धारा से अलग हुये बच्चों पर आधारित) आदि ।

रेडियो से प्रसारित बाल नाटक

* बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम, नेता जी का भाषण, प्रमोशन का चक्कर, चोर-चोर मौसेरे भाई,.... .और दांत उखड़ गये, सुनहरा कल, बैठे-बिठाये, किस्सा शान्ति का, कहो कैसी रही, खट्‌टा-मीठा (सभी हास्य नाटक) आदि ।

बाल साहित्य के अनेक संस्थानों द्वारा आयोजित बाल कहानी प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत कहानियों

* प्रायश्चित, शिक्षा का धन, अनोखा जन्म दिन, अनोखा उपहार, समय का सदुपयोग, गलती का अहसास, अंकित का साहस, अंगूठी का चमत्कार, सच्चा कर्तव्य, सबसे बड़ी जीत, पुरस्कार, सुनहरे कल की कामना, एक और एक ग्यारह, रोशनी, सदबुद्धि और हृदय परिवर्तन । 'बिखरते सपने और 'छूना है आकाश' बाल उपन्यास, गुलाटीबाज तथा सुहानी आदि ।

प्रकाशित बाल कथा संग्रह

* बयालीस बाल कथाएँ, आधुनिक बाल कहानियाँ, इक्कीसवीं सदी की बाल कहानियाँ, इक्यावन हास्य बाल कहानियाँ एवं बाल साहित्य कोष; सभी संयुक्त संग्रह) एवं रेडियो नाटक की पुस्तक, ''गुडविन मसीह के नौ हास्य रेडियो नाटक'' ।

समाचार-पत्र एवं बाल पत्रिकायें जिनमें गत तीस वर्षों से निरन्तर बाल कहानी. बाल गीत. बाल नाटक एवं बाल उपन्यासों का प्रकाशन हो रहा है ।

* बालवाणी, नन्दन, बाल भारती, देव पुत्र, बाल हंस, चंपक, लोटपोट, नन्हें सम्राट एवं अमर उजाला, दैनिक जागरण, नेशनल दुनिया बाल भास्कर, शब्दरंग, पंजाब केसरी, जनसत्ता व वेब पत्र-पत्रिकाओं आदि में बाल रचनाएँ कहानियाँ कविताएँ एवं गीतों का निरन्तर प्रकाशन हो रहा है ।

पुरस्कार एव सम्मान

* सृजनात्मक बाल साहित्य के लिये अनेक स्थानीय एवं राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत ।

प्रकाशनाधीन बाल कथा एवं बाल गीत संग्रह

* बच्चों की प्रेरक कहानियाँ, बालिकाओं की प्रेरक कहानियाँ, किशोरों की मनभावन कहानियाँ एवं दादा जी के दाँत निराले, बाल गीत संग्रह का शीघ्र प्रकाशन ।

अन्य उपलब्धियाँ

* पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के कविता संग्रह 'जंग न होने देंगे' का नाट्‌य रूपान्तर ।

पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के यूपी. के बदायूँ शहर आगमन पर दूरदर्शन के लिए वॉइस ओवर राइटिंग ।

* विश्व की महान समाज सेविका मदर टेरेसा के जीवन पर 300 पृष्ठ की किताब ।

व्यस्कों के लिए रेडियो नाटक

* गलत फहमी, जब बस ने सर्वे किया, ग्रहों का चक्कर, जुनून, जियो तो जमाने के साथ जियो, आशिक मियां दीवाने, पति बुराई अभियान, किस्सा शान्ति का, कहो कैसी रही, एक थी दीपिका, डायरी का पन्ना, खट्‌टा-मीठा, आई हेट यू मरने की भी फुर्सत नहीं (सब हास्य व्यंग्य) आदि ।

रेडियो एवं टीवी. धारावाहिक

* जहाज का पंछी 'नाट्‌य रूपान्तर' (मूल लेखक-इलाचन्द्र जोशी); संकल्प, चुभन, जीवन संघर्ष एवं एक टुकड़ा आसमान का ।

रेडियो रूपक

* बरेली की जूरी जरदोजी, साम्प्रदायिक सौहार्द का प्रतीक चुन्ना मियाँ का मन्दिर एवं बरेली का सुरमा ।

बतौर कथा. पटकथा एवं संवाद लेखक फीचर फिल्म

*: बाँसुरी एक प्रेमकथा, पारो मेरी जान, राज बिहारी, अपाहिज, तुमसे कितना प्यार है, फॉरगेट मी नाउ, दर्द अपना-अपना, नासूर, ऐट्रक्शन आदि ।

प्रकाशाधीन पुस्तकें

१: रेडियो एवं टी.वी. लेखन, पटकथा लेखन, बच्चों के लिए कहानियां (कथा संग्रह), कतरा भर जिंदगी (कहानी संग्रह) -अमन प्रकाशन, दिल्ली ।

१: वर्तमान में उपरोक्त सभी गतिविधियों में सक्रिय होने के साथ-साथ रेडियो, टीवी. एवं फिल्मों के लिए कथा, पटकथा एवं संवाद लेखन कार्य ।

सम्प्रति

१: 'खुशबू मेरे देश की' (हिन्दी मासिक साहित्यिक पत्रिका) में कार्यकारी संपादक ।

सम्पर्क हेतु-

चर्च के सामने, वीर भद्‌टी, सुभाषनगर, बरेली उप्र-) पिनकोड-243 001

ईमेल - scriptwritergm8@gmail.com

(गुडविल मसीह)

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