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सिरफिरों की अब कहानी क्या लिखूँ, आग पर दो बून्द पानी क्या लिखूँ। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की कुछ ग़ज़लें


-एक-

सिरफिरों की अब कहानी क्या लिखूँ,

आग पर दो बून्द पानी क्या लिखूँ।

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दहशत-पसंदों के सियासी शहर में,

जल रही है राजधानी क्या लिखूँ।

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पत्थर हुई आबादियों की आँख में,

आँसुओं की बाग़बानी क्या लिखूँ।

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उम्र से पहले ही जो चुक्ता हुई,

ऐसी कली को रातरानी क्या लिखूँ।

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आवारगी के इस अनूठे शहर में,

ज़िन्दगानी की निशानी क्या लिखूँ।

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-दो-

वक्त के अलाव में,

धुन्ध पगी छाँव में।

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पल रही है जिन्दगी,

हादसों के गाँव में।

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काम आए रात-दिन,

उम्र के भराव में।

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गुजर गई नज़र-नज़र,

रार से बचाव में।

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पड़ गई हैं बेड़ियां,

हौसलों के पाँव में।

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-तीन-

कि मानवता के मानी लिखना,

ख़त में तनिक जवानी लिखना।

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धरती के सूखे आँचल पर,

खुशबू- भरी कहानी लिखना।

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शब्द अकेले ना-काफी हैं,

कुछ दाना कुछ पानी लिखना।

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चेहरा-चेहरा चाँद सरीखा,

चूनर का रंग धानी लिखना।

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ख़ूने-दिल से ‘तेज’ आखिरिश,

दुनिया आनी- जानी लिखना।

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-चार-

वक्त में इतनी बनावट आ गई,

उम्र से पहले नज़ाकत आ गई।

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धूप ओसारे चढ़ी, परबत हुई,

छाँव में फिर-फिर नफ़ासत आ गई।

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रूठना–रोना असल कुछ भी नहीं,

दरअसल उनको सियासत आ गई।

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इस क़दर कुछ दर्द सीने में उठा,

होंठ पर उनके इबादत आ गई।

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उनके आने पर मुझे लगता है कि,

फिर कोई जिन्दा क़यामत आ गई।

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-पांच-

कोई बिचारा ख़त लिखता है,

ख़त में अपना क़द लिखता है।

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धरती को लिखता है अम्बर,

अम्बर को सरहद लिखता है।

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खेतों खलियानों को जंगल,

बस्ती को मरघट लिखता है।

फूलों के बिस्तर को पत्थर,

काँटों को मसनद लिखता है।

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मस्जिद को लिखता है मन्दिर,

मन्दिर को मस्जिद लिखता है।

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चन्दा को लिखता है रोटी,

रोटी को मक़सद लिखता है।

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-छ:-

कि बहुत तन्हा हूँ सदा दो मुझको,

अब तो आँचल से हवा दो मुझको।

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मर ही न जाऊँ ना तेरी चाहत में,

कुछ तो जीने की दवा दो मुझको।

​​

ताकि जी भरके नज़ारा कर लूँ,

अपनी रातों का पता दो मुझको।

​​

बहुत प्यासा हूँ समन्दर की तरह,

अबकी आँखों से पिला दो मुझको।

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बहते दलिया के किनारों की तरह,

साथ चलने की दुआ दो मुझको।

​​

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-सात-

मेरे आँगन में महक रहने दो,

मेरी धरती पे फ़लक रहने दो।

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ताकि अधरों पे ग़ज़ल हो निकले,

मेरे सीने में कसक रहने दो।

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सोने-चाँदी का तर्जुमा न करो,

बसकि पायल में खनक रहने दो।

​​

जिनको जीने की तमन्ना है अभी,

उनकी बातों में लचक रहने दो।

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चलते रहने का हुनर है जिनमें,

उनमें चलने की ललक रहने दो।

​​

जिनके अंदर का सफ़ा खाली है,

उनके चेहरों पे चमक रहने दो।

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-आठ-

अपनेपन की कोई बात कर,

घर को बेशक हवालात कर।

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उत्तर की चाहत है गर तो,

छोटे- छोटे सवालात कर।

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सूरज की नजरें हैं हरसू,

शब होने पर मुलाकात कर।

​​

जिसकी सज़ा प्रेम-बन्धन हो,

कुछ–कुछ ऐसी वारदात कर।

​​

‘तेज’ मृत्यू से क्या घबराना,

मृत्यु को कुछ आत्मसात कर।

​​

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-नौ-

जब भी लिखना हो शहादत लिखना,

अबकि उलफ़त की रिवायत लिखना।

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कि जिनकी आँखों में मौत बसती है,

उनकी आंखों में मोहब्बत लिखना।

​​

कि मेरी दुनिया के हुक्मराँ छोड़ो,

दाल-रोटी पे सियासत लिखना।

​​

घुटके जीने से तो बेहतर होगा,

जर्रे-जर्रे पे बग़ावत लिखना।

​​

‘तेज’ दुनिया की सलमती के लिए,

अपने खाते में मलामत लिखना।

​​

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-दस-

ताज़ा-ताज़ा हवा चली है,

चुप रहने से आह भली है।

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अनुबन्धों की रजधानी में,

संबंधों की तंग गली है।

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कौन दिशा में उड़े चिरैया,

अंबर-अंबर आग पली है।

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दानवता पर चढ़ी जवानी,

मानवता की उम्र ढली है।

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मौन विरक्ति रचूँ मैं क्यूंकर,

जब उड़ने की बात चली है।

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तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

सम्पर्क :

E-mail — tejpaltej@gmail.com

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