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नाथ गोरखपुरी की काव्य रचनाएँ

1

वजन बातों में रखो ,किरदार संभल जायेगा
सच दबा तो झूठ का, बाजार संभल जायेगा

जरा सी चूक जो होगी, वतन के हिफाज़त में
बड़ा शातिर है वो गद्दार संभल जायेगा

किस हक से कहते हो , दिल तोड़ के सनम
बहुत काबिल है वो ,मेरा यार संभल जायेगा

जिसे सलीके से संभाला था तूने मोहब्बत में
तुम्ही बताओ कैसे वो प्यार संभल जायेगा

ग़र मुल्क की आवाम लड़ती रही बेखौफ
यकींनन नाथ शत्रु सिपहसलार संभल जायेगा

02 गज़ल

तुमको सनम है जाना,उस यार की गली में
सच है वहाँ बताना , उस यार की गली में

बच ले यहाँ भले ही, छुप छुप पाप करके
मुश्किल है मुँह छुपाना ,उस यार की गली में

जो भी किया है तूने , खुद ही बयां होगा
ना है कोई बहाना, उस यार की गली में

जी भरके तूने लूटा , माया के खजाने
ना है ये काम आता, उस यार की गली में

माँ बाप खुश जो तेरे , होगा ना बाल बांका
तुमको दुआ बचाता , उस यार की गली में

03 गज़ल
इस कदर आप सताया ना कीजिए
गैर हैं हम तो याद आया ना कीजिए

क्या कहें हम तो इश्क में मारे गये जनाब़
आप भी इश्क में ,वक्त ज़ाया ना कीजिए

वो महफिल लूट लेते हैं , लफ्ज़ों से हुजुर
मस्त होके आप ताली, बजाया ना कीजिए

जो वादे तोड़ चुके हैं , उसे याद तो करिये
बेशर्मी की चादर तले , शरमाया ना कीजिए

'नाथ' निगाहों से ही ,निगाहें पढ़ भी लेते हैं
शर्त है ये कि निगाहें, झुकाया ना कीजिए

04 गीत

वो गुरु है वो गुरु है वो गुरु
वो गुरु है वो गुरु है वो गुरु

कर्म करने के लिये प्रेरित करे
धर्म करने के लिये प्रेरित करे
सबको सपने सच्चे साकार दे
ना असंभव है कुछ एतबार दे
काम तो कोई तू प्यारे कर शुरू
वो गुरु है वो गुरु है वो गुरु

जो कहे मर मर के जीना छोड़ दे
मौत से डर डर के जीना छोड़ दे
जिंदगी जैसी है तूं स्वीकार ले
यम से लड़ जा हाथ में तलवार ले
मौत के आगे ना घुटने टेक तूं
वो गुरु है वो गुरु है वो गुरु

ज्ञान की गंगा हृदय से निकाल के
सत्य पथ पर ले चले संभाल के
मोह के सारे भरम जो तोड़ दे
'नाथ' से नाता जो मन का जोड़ दे
मैं भी तनमन से उसे नमन करुं
वो गुरु है वो गुरु है वो गुरु

05 नायिका

ये अनसुलझे लट, मदमत्त निगाहें
लरस़ते लब ,बहकती अदायें

दरिया सी उफनती जवानी
बयां कर रही हैं तेरी कहानी

तुहिं इस घड़ी घनी खूबसूरत
सूरज की लाली को तेरी जरूरत

शशि भी शरम से उझपें नाहि ताके
उदधि तरंगें ना गर्वित होके झांके

कली कोमल ना लागै अब तो तेरे सम
नयन ज्यों ही चमकै है भाग दिखै तम

कोयल ना कुकै सुनै तेरी बोली
माथै कि कुमकुम से फिकी रंगोली

हो नभ में राका सम तेरी बिंदिया
जाये उचट अब तो जग की निंदिया

लबो की वो लाली श्रौन की वो बाली
तु ज्यों ना दिखै तो लगे सब है खाली

तिरछे निगाहें तके तुझको चंदा
केशपास करें कत्ल लगायौ है फंदा

कनक सी कलाई है ज्युं छुई मुई
धवल उरोज हैं लागै कपासी सी रूई

कटि बांस पल्लव लचकता है जैसे
जिन्हें ताड़ कामी बच सकता है कैसे

सैंबल फुल सा अधर सुर्ख मानो
या प्रात:रवि बाल खिलता हो जानो

तुझे जो निरेखे अब मरे तब मरे है
ना उसका ठिकाना वो पल पल मरे है

रुप माया है दल-दल कोई तो बचाले
इस रईसी बला से "नाथ" तू ही बचाले

06 किसान
रहते हैं सुल्तान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में
फिर मारे गए किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में

किसानों के बलबूते ही
शासन पाई, शासन पाई
उन्हीं किसानों की फिर तुमने
करी पिटाई, करी पिटाई

कुछ नेता हैं बेईमान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में
मारे गए किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में

शोषण हुआ किसानों का
हाँ भाई हाँ, भाई हाँ
शास्त्री जी के अरमानों का
हाँ भाई हाँ, हाँ भाई हाँ
मिट्टी के भगवानों का
हाँ भाई हाँ, हाँ भाई हाँ

लूट रही पहचान हमारी
दिल्ली में दिल्ली में
मारे गए किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में


देख लो अब तो"नाथ" तमाशा
दिल्ली में दिल्ली में
कितने तोड़ रहें हैं सांसा
दिल्ली में दिल्ली में

जब तेरा ही शासन है
शासन है शासन है
जब तेरा ही प्रशासन है
प्रशासन है प्रशासन है
बात करो तुम किसानों से
बात करो बात करो
मुलाकात करो किसानों से
मुलाकात करो मुलाकात करो

टूटे क्यों हैं किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में
मारे गए किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में

सत्ता में तुम बैठे हो
बैठे हो बैठे हो
क्या उस मद में ऐंठै हो
ऐंठै हो ऐंठै हो
तुम को सबक सिखायेंगे
सिखायेंगे सिखायेंगे
सत्ता को तरसायेंगें
तरसायेंगें तरसायेंगें

जो तरसेगें किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में
मारे गए किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में

जी हां रहते हैं सुल्तान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में
मारे गए किसान हमारे
दिल्ली में दिल्ली में

07
गांधी जयंती

हमें गर्व है गांधी तुम पर,
तुम मानवता के रक्षक थे
तुमने उनको पाठ पढ़ाया,
जो मानवता के भक्षक थे

तेरी बुद्धि ने भारत का,
विश्व में डंका बजवाया
फूल से पत्थर भी कटते हैं,
ये साबित करके दिखलाया

हम बंधन में जकड़े थे ,
गैरों की हम पर हुकूमत थी
तब एक राष्ट्र समर्पित,
योग्य व्यक्ति की हमें जरूरत थी

हाहाकार मचा था हम पर ,
था जुल्म हो रहा जोरों से
कुछ अपने भी दुश्मन थे
अब कौन बचाए चोरों से

जाति पांति और भेदभाव का ,
परचम लहराया जाता था
ऊंच-नीच के चक्कर में ,
मानवता का घर भहराया जाता था

मानवता के नाश की खातिर ,
जब कदम बढ़ाया आंधी ने
"नाथ" कृपा जब हुई तुम्हारी ,
तब जन्म लिया उस गांधी ने

पाठ पढ़ाया अहिंसा का ,
मानवता का उपदेश दिया
सत्य अहिंसा त्याग तपोबल,
विश्व को यह संदेश दिया

हिंसा को भी अहिंसा से ,
डसने वाले काले तक्षक थे
हमें गर्व है गांधी तुम पर
तुम मानवता के रक्षक थे

08 गज़ल

जमीं का इक परिंदा बड़े गुरुर में रहने लगा
उड़ता अच्छा है जब जमाना उसे कहने लगा

अभी तो पंख निकले थे, उसके चार दिन से
पर वह परबाजों की धारा में बहने लगा

मदमस्त होकर ढूंढा वो परबाजों की शोहबत
मैं उड़ता हूं तुम्हारे जितना ही, ये कहने लगा

रौब में परबाजों के संग, वो उड़ा कुछ दूर
पर अनुभव हीन था बेसुध होकर ढहने लगा

गिरा अपनी नजरों में गलतियों के कारण
हताश निराश वह घुट घुट के दहने लगा

"नाथ" को एहसास है अपनी हदों का
तभी वो जमाने की हरकतों को सहने लगा

09
थको मत ! थको मत !! थको मत !!!
बढ़ चलो ! बढ़ चलो !! बढ़ चलो !!!

लहरों से अभी लड़ना है
तूफानों से टकराना है
सांसो के उखड़ने से पहले
तुम्हें दरिया पार कर जाना है

दरिया में जब उतरोगे
तो पहले डर जागेगा
डुबेंगे कि बच जायेंगे
मन शंकित हो कांपेगा

उस शंकित कंपित मन से
तुमको दृढ़ता से टकराना है
सांसो के उखड़ने से पहले
तुम्हें दरिया पार कर जाना है

लहरें मगन करेंगी मन को
मय सा जल तुम्हें लागेगा
थोड़ा सा आराम करें
पांव शिथिल हो थाकेगा

मयजल का तो काम है ये बस
मंजिल से तुमको भटकाना है
सांसो के उखड़ने से पहले
तुम्हें दरिया पार कर जाना है

10-

कब जाना है कब आना है
ये कब किसने जाना है
इस दुनिया में कब गम है
कब किसने पहचाना है

खड़े खड़े ही गुजरेंगे पल
या बैठे रह जायेंगे
मस्ती में फिर होगी सुबह कि
सोये ही रह जायेंगे

सूर्य सुर्ख सा दिखता है कभी
कभी चाँदी सा है चाँद दिखे
केहरी कभी माँद में दिखता
कभी केहरी को माँद दिखे

बुध्दि तुझमें बहुत है बन्दे
पर वक्त बड़ा बलवाना है
इस दुनिया में कब गम है
ये किसने पहचाना है

11-

हिन्दी तुम आबाद रहो
हम अंग्रेजी वाले हैं
हिन्दी दिवस के दिन भी
मुँह पे लटके, अंग्रेजी ताले हैं

हिन्द ! हिन्दी की हालत देखो
हिन्द में ही हकलाती है,
हिन्दवासीयों जुबां पे तेरे
अंग्रेजी इठलाती है

हम लोगों के मन में ही
हिन्दी का सम्मान नहीं
भाग रहें अंग्रेजी के पीछे
हिन्दी का है ध्यान नहीं

हिन्दू हिन्दी हिन्द हैं रटते
पर अंग्रेजी दिल वाले हैं
हिन्दी तुम आबाद रहो
हम अंग्रेजी वाले हैं

अंग्रेजी को कर्म मानते
हैं आधुनिक हिन्दूस्तानी
बचपन बीता अंग्रेजी में
अब बीत रही है जवानी

है हिन्दी का कद्र नहीं
हिन्दूस्तानी कार्यालय में
अंग्रेजी में पूजा होती
है हिन्दी देवालय में

घर घर में अंग्रेजी छायी
हिन्दी पे छाये बादल काले हैं
हिन्दी तुम आबाद रहो
हम अंग्रेजी वाले हैं

हिन्दी को रोजगार नहीं
व्यस्त हुई अंग्रेजी है
इसी लिये तो हिन्द की जनता
अंग्रेजी की क्रेजी है

दाने खाने का खैर नहीं
अंग्रेजी में खांसी आती है
हिन्दी की बाते होती जहां
वहां उबासी आती है

वाह!रे हिन्द की जनता
तेरे खेल निराले है
अंग्रेजी तुम आबाद रहो
"नाथ" तो हिन्दी वाले हैं

12- खबर

आज की ताजा खबर
क्या जानता है शहर?
मार डाला ! मार डाला !!
मार डाला !!!

काम को बेकारी ने
समझ को समझदारी ने
दुकान को उधारी ने
मार डाला !!

जनता को नेता ने
दर्शक को अभिनेता ने
तथ्य को प्रणेता ने
मार डाला !!

महबूब को महबूबा ने
सादगी को अजूबा ने
ताज को तनुजा ने
मार डाला !!

सच्चाई को खबर ने
पर्यावरण को शहर ने
सुबह को दोपहर ने
मार डाला !!

इच्छा को कमजोरी ने
साहूकार को सुदखोरी ने
सही को सीनाजोरी ने
मार डाला !!

शिक्षा को शिक्षक ने
शील को शिष्या ने
गुरूकुल को ईर्ष्या ने
मार डाला !!

राजनीति को राजा ने
राज को प्रजा ने
जुर्म को सजा ने
मार डाला !!

दोस्त को दगाबाजी ने
आचरण को रंगबाजी ने
पड़ोसी को खुशमिजाजी ने
मार डाला !!

स्वाद को परहेज ने
बिटिया को दहेज ने
नवेली को सूनी सेज ने
मार डाला !!

भूख को खबिश़ों ने
समय को गर्द़िशों ने
"नाथ" को बंदिशो ने
मार डाला !!

13- गज़ल

हमें कुछ लोगों की औकात अच्छी लगती है
तभी तो उनकी हर बात अच्छी लगती है

जिस शाम साथी के साथ हों सैर पे
हमें उस शाम की बरसात अच्छी लगती है

आग मिलन की हो ग़र दोनों तरफ तो
यकीन मानो वो मुलाकात अच्छी लगती है

वक्त के साथ जो बदल जाते हो तुम
हमें वो हर वारदात अच्छी लगती है

नसीहत देता है, ना पीने का जो मयकश
हमें उसकी भी शुरूआत अच्छी लगती है

नाथ' खुद के गिरेवां में जो झांक लेते हैं
हमें उनकी हर जज्बात अच्छी लगती है

14-
कोई समझदार ये काम कर गया
मुझे मैखाने की तरफ देखा, बदनाम कर गया

मै मैखाने तक जाता था, मयकश को देखने
आज खुद के अन्दर भी, कई जाम कर गया

मैं पीता नहीं तो लोग, पीने को पुछते
आज पीया तो पैमाना, भी एतराम कर गया

जिस मय ने राज रखे, रोजे मे मेरा दर्द
आज वो भी मेरा दर्द ,सरेआम कर गया

नाथ' अक्सर मुझसे रूठे, रहते राम व रहीम
रम में रमा तो रावन भी ,सलाम कर गया

15-
कौन कहता है कि मैं थक गया हूँ
मुझ परिन्दे को तो आसमान चाहिये

मंजिले दर्द दें जख्म दें कोई गम नहीं
मुझको तो मेरे लबों पे मुस्कान चाहिये

वो और होंगें जिन्हें भीड़ से शिकायत थी
मुझको तो बस इक निशान चाहिये

फ़रेबों से मकान बनाते बहुतों को देखा है
मुझे तो मेरे मेहनत का मकान चाहिये

गलियां जो चीखती हैं दरिंदों के वजह से
मुझको बस वो गलियां सुनसान चाहिये

वर्षों से धर्म व राजनीति लड़ाते मुल्क को
'नाथ' अब तो मुझे प्यारा हिन्दुस्तान चाहिये


  नाथ गोरखपुरी
एम एड्-प्रथमवर्ष
दी द उ गो वि वि गोरखपुर

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